बच्चों का यौन शोषण जारी समाज-सरकार की ढील भी

6 मई 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक गुरूकुल में आश्रम के अध्यक्ष रामानंद सरस्वती को पुलिस ढूंढ रही है। आश्रम के गरीब और नाबालिग बच्चों का देह शोषण करने के आरोप में धार्मिक-आध्यात्मिक लगते हुए नाम वाला यह अध्यक्ष बहुत सी शिकायतों के बाद पुलिस दखल होते ही भाग निकला। बच्चों की देह शोषण का यह मामला साल भर से चले आ रहा था, और खासकर इसलिए यह अधिक भयानक लगता है कि छत्तीसगढ़ में ही कुछ दूसरी आश्रम शालाओं में बच्चियों के साथ लंबे समय तक वहां के इंचार्ज कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा बलात्कार करने के और मामले सामने आ चुके हैं, और उसके बाद से सरकार के स्तर पर दर्जन भर कड़े आदेश भी जारी हो चुके हैं। ऐसे में राज्य में एक और आश्रम शाला में ऐसा देह शोषण बड़े पैमाने पर सामने आया है, और इसे भी हम पानी में तैरते हुए बर्फ की चट्टान के ऊपर दिखने वाले छोटे से हिस्से की तरह मानते हैं, जिसके नीचे कि पानी में डूबा हुआ बड़ा हिस्सा अभी दिख नहीं रहा है। छोटे-छोटे गरीब बच्चों, आदिवासी और ग्रामीण बच्चों के ऐसे यौन शोषण को लेकर राज्य में जो जागरूकता और चौकन्नापन सरकार और समाज दोनों में आना चाहिए, वह दोनों ही जगहों से गायब है। 
हिन्दुस्तान में एक बड़ी दिक्कत तो यह है कि बच्चों का देह शोषण एक विदेशी तस्वीर मान ली जाती है, और यह माना जाता है कि हिन्दुस्तान में लोग ऐसे मानसिक रोग से पीडि़त नहीं हैं। परिवार के बड़े लोग, आस-पड़ोस, रिश्तेदार, और पारिवारिक मित्रों के अलावा, शिक्षक-प्रशिक्षक, और बच्चों तक पहुंचने वाले किसी भी तरह के हाथों में से बहुत से हाथ यौन शोषण करने को उतारू रहते हैं, और बेताब रहते हैं। ऐसे जुर्म की यह हिंसक सोच इतनी आम है, जितनी कि हिन्दुस्तानी लोग कल्पना नहीं करते हैं। दूसरी बात यह कि पूरी दुनिया में यह माना जाता है कि बाल यौन शोषण की सोच रखने वाले लोग बच्चों को शिकार बनाने के फेर में ऐसी जगहों तक अपनी पहुंच बनाते हैं जहां पर कि कमजोर, गरीब, बेबस बच्चे रहते हों। अनाथाश्रम, रेल्वे प्लेटफार्म, गरीबों के हॉस्टल, आश्रम, ऐसी जगहों पर ऐसे मुजरिमों की खास नजर रहती है, और एक भयानक बात यह भी है कि बच्चों की मदद करने के लिए जो सामाजिक संगठन काम करते हैं, वहां भी ये लोग घुसपैठ कर लेते हैं। उन जगहों पर इनको मुसीबत में फंसे हुए, और परेशानहाल बच्चे मिल जाते हैं, और उनकी मदद करने के नाम पर, उनके साथ हमदर्दी दिखाते हुए ऐसे यौन-शोषकों के हाथ आगे बढऩे लगते हैं। 
हम एक बार फिर सिर्फ छत्तीसगढ़ को लेकर बात करें, तो यहां पर बच्चों के लिए सरकार का जो विभाग है, उसमें जो अफसर और मंत्री हैं, बच्चों की भलाई के लिए बनी हुई संवैधानिक संस्था है, मानवाधिकार आयोग है, और इन सबमें जनता के खर्च पर वेतन-भत्ता, और सुविधाएं पाते हुए अनगिनत लोग हैं। इनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि अपने-अपने इलाके में, अपनी जिम्मेदारी के दायरे में जाकर ऐसी नाजुक जगहों पर पहले से पता लगाते रहें, ताकि दर्जनों बलात्कार हो जाने के बाद मुजरिमों को ढूंढने की नौबत न आए, और बच्चों को बलात्कार के पहले ही बचाया जा सके। लेकिन हमारा यह अनुभव रहा है कि सरकार और संविधान की कुर्सियों पर जो लोग काबिज हैं, वे किसी तरह के बचाव में दिलचस्पी कम रखते हैं, और बहुत से मामलों में तो ऐसे जुर्म सामने आ जाने के बाद भी अफसर और मनोनीत लोग जिम्मेदारी को गेंद की तरह एक-दूसरे की तरफ फेंकते हैं। 
बस्तर में एक कन्या आश्रम में बलात्कार के ऐसे लंबे सिलसिले के बाद सरकार संभलकर बैठी थी, और मुख्यमंत्री ने खुद वहां का एक अघोषित दौरा करके उन बच्चियों से बात की थी, और पूरे प्रदेश में अफसरों को इंतजाम जांचने को कहा गया था। लेकिन उसके बाद भी कई जगहों पर ऐसे मामले सामने आए हैं, और ऐसे सेक्स-अपराध के शिकार अधिकतर नाबालिग बच्चे सबसे गरीब, ग्रामीण, और आदिवासियों जैसे कमजोर तबकों के मिले हैं। यह नौबत शर्मनाक है, और इस ताजा जुर्म को देखते हुए अब पूरे प्रदेश में बच्चों से जुड़े हुए तमाम इंतजाम एक बार फिर जांचने चाहिए, ऐसा न होने पर यह राज्य जनकल्याणकारी राज्य नहीं कहा जा सकेगा। 

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