संपादकीय
4 मई 2014
कहा जा रहा है कि भारत एक ऐतिहासिक चुनाव से गुजर रहा है। हर दल, और उसके नेता इसे अपने अपने तरीके से ऐतिहासिक बना रहे हैं। विरोधी दल यूपीए से उसके दस सालों के कामकाज का जवाब मांग रहे हंै, तो कांग्रेस समेत यूपीए गठबंधन के तमाम घटक दल मोदी की कथित सांप्रदायिकता को चुनावों का सबसे बड़ा मुद्दा बता रहे हंै। इन सबके बीच, नेताओं की निजी जिंदगी के चटाखेदार किस्से भी खबरों में अपने अपने तरीकों से उछाले जा रहे हंै। एक दिन कोई नेता जब किसी के बारे में कोई निहायत ही घटिया बयान देता है, तो लगता है बयानों का स्तर इससे ज्यादा क्या गिर सकता है। लेकिन नहीं, विकास के लिए देश की उम्मीदों को अपेक्षा से कम साबित करने की बजाय, नेता राजनीति की स्तरहीनता, खोखलेपन के स्तर के बारे में जनता के डर को कम साबित कर रहे हंै। जैसे, रोज घटियापन की एक और मिसाल पेश करके कह रहे हों कि फेंकू और पप्पू जैसे जुमलों के इस्तेमाल पर अफसोस करने वालो- तुम बदजुबानी, मुद्दे से खाली बातें करने की भारत के नेताओं की काबीलियत को कम मत आंको! जनता भी माथे पर हाथ रखकर सोच रही है कि क्या उसे ऐसा ही ऐतिहासिक चुनाव चाहिए था?
देखने लायक बात यह है कि चुनावों के लिए जनता अपने हिस्से का काम पूरा कर रही है। भारी गर्मी में वह नेताओं के भाषण सुनने जाती है, उसने 16 वीं लोकसभा के लिए रिकार्ड तोड़ मतदान किया है। लेकिन राजनीतिक दलों, और नेताओं का बर्ताव आम तौर पर बहुत निराशाजनक है। एक दूसरे के लिए तल्ख और भद्दी जुबान इस्तेमाल कर तंग आ चुके ज्यादातर नेता अब एक दूसरे के चरित्र पर छींटे उछालने पर उतर आए हैं- किसी की निजी जिंदगी के बारे में छींटाकशी करने से लेकर, नेताओं के एक दूसरे से रिश्ते जोडऩे तक, सारी गंदगी हो रही है। अखिलेश, मुलायम और माया की जुबानी जंग देखकर जनता सोच सकती है कि, इनके मुकाबले नारायण दत्त तिवारी क्या बुरे हैं, जो बुढ़ापे में अपनी प्रेमिका की मौजूदगी में भी देशभक्ति के गीत गा रहे हंै। मजाक से परे, यह हालात बहुत अफसोसनाक इसलिए है कि पिछले चुनाव के बाद से आज तक राजनीतिक दलों, और नेताओं के पास, जनता के सामने बयान करने के लिए अपना किया हुआ काम नहीं है, इसलिए उन्हें उसे मुद्दों से भटकाने इस तरह की स्तरहीन बातें करनी पड़ रही है।
ऐसी बदजुबानी की एक वजह जाहिर तौर पर यह भी है कि सवा महीने जितने लंबे खिंचे चुनाव के लिए प्रचार करना नेताओं की मजबूरी है। ऐसे में उनके पास तीन ही रास्ते बचते हैं, या कि चिलचिलाती धूप में उनकी बात सुनने आई जनता को वह यह बताकर खुश करे कि, उन्होंने उसके लिए कोई ऐसा काम किया है, जिस पर वह खुश हो सकती है, और कोई ऐसा काम करने का इरादा रखते हैं, जिसकी तरफ वह उम्मीद से देख सकती है। दूसरा विकल्प यह है कि अगर कोई काम न किया हो, तो जनता का मनोरंजन करे, उसे अपने विरोधी नेताओं के निजी जीवन की बातें सुनाकर गुदगुदाने की कोशिश करे, या तीसरा यह कि उसकी जातिगत, धार्मिक भावनाएं भड़काए। यही वजह है कि चुनाव आयोग की फटकार खाकर भी बेनी प्रसाद बदजुबानी नहीं रोक रहे, आजम खान सुर्खियों में बने रहने के लिए विवादस्पद बयान दिए जा रहे हंै। अखिलेश, मुलायम, मायावती के बारे में, तो मायावती उनके बारे में ना कही जाने वाली बातें कह रही हंै। नरेन्द्र मोदी गांधी परिवार, और कांग्रेस पर वार करने रोज नए जुमले उछाल रहे हंै। प्रियंका, सोनिया और राहुल, कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद और चिदम्बरम जिस तेज़ाबी जुबान वाले नेताओं के साथ मिलकर मोदी पर हमले किए जा रहे हंै। इस बार के चुनाव इस हिसाब से वाकई ऐतिहासिक हंै कि इसके लिए चुनाव प्रचार करते हुए नेता बदजुबानी की मिसालें पेश करते नहीं थक रहे।
लेकिन सवाल यह है कि देश के चुनाव में वह ऐतिहासिक मोड़ कब आएगा, जब जनता नेताओं को बता देगी, कि उसे मुद्दों से भटकाया नहीं जा सकता, उसे उनकी निजी अदावत , दुश्मनी, पसंद-नापसंद से मतलब नहीं है। चुने हुए नेता उसके सेवक हैं, और उनसे काम का हिसाब मांगना, और पाना उसका हक। इसका हिसाब नहीं देने वालों को राजनीति से बाहर करने की ताकत उसमें है, और वह इसे दिखाने से नहीं चूकेगी। मतदान के आखिरी दो दौर अभी बाकी हैं। मतदाता अगर नेताओं को यह बता सके, कि उसे मूर्ख, वोट बैंक समझने की भूल उन्होंने की है तो उसका खामियाजा वही भुगते, तो यह इन चुनावों को सही मायनों में ऐतिहासिक बनाएगा.. टीवी पर अमेठी चुनाव क्षेत्र का एक बुजुर्ग, गरीब मतदाता वहा प्रियंका गांधी की लगातार मौजूदगी के बारे में जब यह कहता है, कि इस बार उन्हें वोट मांगने आना पड़ा है, तो इसमें यह कांग्रेस को एक राज परिवार की तरह समझने वालों के लिए एक ऐतिहासिक मौका है। छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, में पिछले तीन कार्यकालों से सरकार चला रही भाजपा ने,या उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में भारी जीत दर्ज करने वाली सपा, या तमिलनाडु में एकछत्रीय राज चला रही एआईएडीएमके के नेताओं ने, अगर जनता को अपनी जेब में पड़ा हुआ समझा, या प.बंगाल में मतदाताओं को अपने से डरा हुआ मान लिया तो नतीजे आने के बाद उन्हें पछताने का मौका देना ऐतिहासिक होगा। जब मतदाता का खयाल पांच साल में एक बार न आए, बल्कि आने वाले सालों में लगातार बना रहा, तो यह चुनाव ऐतिहासिक कहलाएंगे। जब चुनावी सभाओं में नेता बदजुबानी करने, या विरोधियों पर झूठे आरोप लगाने से डरेंगे, वह चुनाव ऐतिहासिक कहलाएंगे। यह दिन जल्द आए, इसकी कोशिश अपनी, और अपनी औलादों की खातिर इस देश की जनता को करनी होगी। ताकतवर नेताओं के सामने यह कोशिश करना आम जनता के लिए आसान नहीं, उसे ऐसे फैसले लेते समय नेताओं, और उनके चेलों चपाटों की दबंगई से, अपनी पूरी साधनहीनता के साथ जूझना पड़ता है। अजीत पवार जैसे बड़े नेता पर गांव के गरीब लोगों को वोट नहीं मिलने पर पानी बंद कर देने धमकी देने के आरोप की जांच अभी चल ही रही है। लेकिन जिंदा रहने के लिए पानी जितनी जरूरी चीज की भी परवाह न कर अपने हक के लिए वोट करना भारत के मतदाता के लिए आज हिम्मत की नहीं, जरूरत की बात बन चुकी है, यह अगर उसने समझा होगा, तब यह चुनाव ऐतिहासिक होंगे।

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