पाखंडी पवित्रता तले कुचली हुई तन-मन की जरूरतें

7 मई 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में प्रेम-संबंधों को लेकर इतनी अधिक मौतें सामने आई हैं कि उनके बारे में लिखे बिना रहना अब ठीक नहीं होगा। इनमें शादी की इजाजत न मिलने पर मरने-मारने वाले मामले हैं, शादी से परे के रिश्तों को लेकर होने वाली हत्याएं हैं, और एकतरफा प्रेम-संबंधों की वजह से हुई हत्याएं भी हैं। समाज के भीतर जब इतना खून-खराबा सामने आ रहा है तो एक दूसरी बात यह है कि मौतों से कम तनाव के मामले जो सामने नहीं आ रहे हैं वे इनके मुकाबले हजारों गुना अधिक होंगे। 
समाज की ऐसी हालत पर सोचने-विचारने की जरूरत है जिसमें प्यार करने वालों को शादी की इजाजत नहीं मिलती, देह की जरूरत वालों को बाजार में सहूलियत नहीं मिलती, शादीशुदा जोड़ों को आपस में तसल्ली नहीं मिलती, और पति-पत्नी के बीच तनाव होने पर भी तलाक का हौसला नहीं मिलता। भारत के कस्बाई शहर इस किस्म के तनाव को लगातार झेल रहे हैं, और कई पीढिय़ां तरह-तरह की प्रेम और सेक्स से जुड़ी कुंठाओं की शिकार है। इन मौतों को पुलिस और अदालत का मामला मानकर खबर पढऩे के बाद उनको छोड़ देना किसी किस्म का सामाजिक इलाज नहीं है, और लोगों को समाज के भीतर अपने सदस्यों की शारीरिक और मानसिक, भावनात्मक और पारिवारिक जरूरतों को समझना होगा। 
भारतीय समाज आज जाति व्यवस्था टूट जाने के डर से प्रेम-संबंधों के खिलाफ बहुत ही हिंसक हो गया है और जगह-जगह निराश प्रेमी-प्रेमिका हत्या-आत्महत्या के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। सरकार में बैठे हुए नेताओं और अफसरों की सोच समाज की मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने की हिमायती रहती है, और यही वजह है कि नए साल के मौके पर या वेलेंटाइन डे जैसे दिन पर भी लड़के-लड़कियों को बाग-बगीचे में मिलने से रोकने के लिए पुलिस को फौज की तरह तैयारी के साथ तैनात कर दिया जाता है। ऐसे में न तो प्रेम-संबंधों की जगह रहती, और न ही प्रेम-विवाह की। नतीजा यह होता है कि नौजवान पीढ़ी की निराशा हिंसक होने लगती है, कभी अपने खुद के खिलाफ, तो कभी अपने जोड़ीदार के खिलाफ। 
इसी तरह भारतीय समाज में शादीशुदा जोड़ों के बीच भी सेक्स को एक बुरी बात की तरह देखा जाता है, और इस बुनियादी जरूरत को समाज और परिवार बुरी तरह अनदेखा करते हैं। नतीजा यह होता है कि अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए शादीशुदा लोग भी घर-परिवार से बाहर तन और मन के संबंध बनाने लग जाते हैं, और यही बात आगे चलकर, उजागर होने तक हत्या और आत्महत्या तक पहुंचने लगती है। यहां पर हम याद दिलाना चाहेंगे कि सैकड़ों बरस पहले जिस हिन्दुस्तान में वात्सायन ने सेक्स जीवन में विविधता के लिए एक विशाल ग्रंथ लिखा था, उसे अनदेखा करके, उसे खारिज करके, और उसे बुरा-भला कहकर आज का दकियानूसी और पाखंडी समाज शादीशुदा जोड़ों के बीच भी विविधता की संभावनाओं को खत्म कर देता है, और समाज को एक खतरे की कगार की तरफ धकेल देता है। 
आज जरूरत इस बात की है कि भारतीय समाज इस बात को माने कि वात्सायन से लेकर कालिदास तक, और कृष्ण की प्रेम कथाओं से लेकर दूसरी असली प्रेम कहानियों तक का एक महत्व था, और उनका अस्तित्व था। ऐसा न करके जीवन में इस प्राकृतिक जरूरत को भूखा रखा जा रहा है, और बेचैन तन और मन खतरे में पड़ रहे हैं, नौजवान पीढ़ी खतरे में पड़ रही है, शादीशुदा जिंदगी खतरे में पड़ रही है। समाज को कुछ बहुत ही फर्जी और फरेबी पवित्रतावादी नारों में जकड़कर तन और मन की जरूरतों को कुचल दिया जा रहा है, उन्हें भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया जा रहा है, इस वजह से हिंसा बढ़ रही है। आज भारतीय समाज में अपनी मर्जी से प्रेम करने, अपनी मर्जी से साथ रहने, अपनी मर्जी से शादी करने, और नौबत आए तो अपनी मर्जी से अलग होने की आजादी हर किसी को मिलनी चाहिए, उसके बिना यह समाज एक बीमार समाज रहेगा, जिसके बीमार नागरिकों की उत्पादकता कभी इस देश को पूरी नहीं मिल सकती। 

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