मीडिया मोदी के हाथों बिका नहीं, औरों को मोदी से सीखने की जरूरत

8 मई 2014
संपादकीय
भारत में चल रहे चुनाव के मीडिया कवरेज को लेकर एक विश्लेषण सामने आया है कि किस पार्टी को, और किस नेता को टीवी समाचार चैनलों के प्राईम टाईम ने किस अनुपात में कवरेज मिला है। इसके मुताबिक नरेन्द्र मोदी को सबसे अधिक महत्व मिला, और उन्हें जितने वक्त खबरों में, बहसों में जगह मिली, उतनी जगह उनके बाद के अगले नौ नेताओं को मिलाकर भी नहीं मिली। अब इसे लेकर दो तरह की बातें सोची जा सकती हैं, और कही जा रही हैं। एक तो यह कि भारत के कारोबारी घराने मोदी की शक्ल में पूंजीनिवेश कर रहे हैं, और उनके असर से भारतीय मीडिया मोदी को अगला प्रधानमंत्री तकरीबन बना ही चुका है। दूसरा यह कि मोदी खुद इतना समाचार-महत्व रखते हैं, कि उन्हें नामी गिनें, या बदनाम कहें, उनके बिना इस चुनाव की कोई खबर पूरी नहीं हो सकती। 
मोदी के महत्व की हकीकत ऊपर की इन दोनों बातों की मिलीजुली भी हो सकती है, या इन दोनों में से किसी एक तरह की भी हो सकती है। दरअसल बड़े चैनलों और बड़े अखबारों की वजह से भारत का मीडिया कारोबार अब इतना खर्चीला और इतना खतरनाक धंधा हो गया है कि उसे जिंदा रखने के लिए उसके मालिकों को कई तरह के कारोबारी समझौते करने पड़ते हैं, या वे खुद होकर खुशी-खुशी ऐसे समझौते करते हैं। दूसरी बात यह है कि २००२ के गुजरात दंगों के बाद से नरेन्द्र मोदी जिस तरह एक राष्ट्रीय खलनायक की तरह पेश किए जाते रहे, तो उससे उनका समाचार-महत्व बने रहा, और आज वे देश में किसी भी पार्टी या गठबंधन के अकेले घोषित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी हैं। अब देश में अगर ऐसे घोषित उम्मीदवार को भी खबरों में महत्व नहीं मिलेगा, तो और किसे मिलेगा। 
दूसरी कुछ बातें और भी हैं। मीडिया एक तरफ तो अपने मालिकों की विचारधारा, और अपने कारोबारी हितों की प्राथमिकता के तले काम करता है, तो दूसरी तरफ वह अपने पाठकों और दर्शकों की पसंद का ख्याल भी रखता है। और इन दोनों-तीनों बातों के बीच एक संतुलन बड़ी खूबी के साथ कायम करना होता है, वरना बड़े धंधे में सड़क पर आने में वक्त नहीं लगता। आज हिन्दुस्तान के दर्शकों और पाठकों में से अधिकतर ऐसे हैं जो कि मोदी या उनकी तरह की दमदार और नाटकीय बातें करने वालों को सुनना चाहते हैं। और ऐसे लोग राहुल गांधी को सुनकर निराश होते हैं, क्योंकि उनकी बातों में न तो उनकी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार की विश्वसनीयता का कोई दम होता है, और न ही उनकी बातों में चटपटी नाटकीयता होती है। इसलिए अगर मीडिया अपने खुद की हस्ती को बचाए रखने के लिए देखने लायक और पढऩे लायक बयानों और इंटरव्यू को जगह देता है, तो इसे हम मोदी की हिमायत में संतुलन खोना नहीं मानते। 
नरेन्द्र मोदी और बाकी पार्टियों के चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों में बहुत बड़ा बुनियादी फर्क भी है। राहुल गांधी की किसी सभा की एक तस्वीर भी घंटों तक, या दिनों तक इंटरनेट पर उनकी पार्टी नहीं डालती, दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के भाषणों का इंटरनेट पर जीवंत प्रसारण देखा जा सकता है, पल-पल पर उनके ट्वीट आते हैं, और उनकी वेबसाईट पर उनके भाषणों के कई भाषाओं में अनुवाद आनन-फानन डाल दिए जाते हैं। दूसरी तरफ दस बरस की सरकारी ताकत के बाद भी कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपलब्धियों के चार्ट और ग्राफ प्रधानमंत्री कार्यालय हिन्दी में नहीं डाल पाया, और हमारे जैसे लोगों को खुद अनुवाद करके उनको छापना पड़ता है। मोदी की अगुवाई में भाजपा ने जिस पेशेवर अंदाज में प्रचार किया है, और चुनावी इंतजाम किया है, वह देखने और सीखने लायक है। दूसरी तरफ दस बरसों की भ्रष्ट सत्ता के बाद यह तो हो नहीं सकता कि कांग्रेस पार्टी मोदी की टक्कर का खर्च करने के लायक न हो, उसका भी खर्च कम नहीं है, लेकिन एक तरफ तो वह बर्बाद हो रहा है, उसका बेअसर इस्तेमाल हो रहा है, और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव में हमारा यह देखा हुआ है कि किस तरह उसके नेताओं ने अखबारनवीसों को रिश्वत देने के नाम पर खुद ही रकम खा ली थी। जब किसी पार्टी के दिग्गज नेता चुनाव के खर्च को खाने में जुट जाते हैं, तो वे अपनी जीत की संभावना भी खोते हैं, और अपना अविश्वास भी अपनी पार्टी की संभावनाओं पर जाहिर कर देते हैं। 
कांग्रेस पार्टी को इस बार के चुनावी नतीजों के बाद बैठकर यह सीखना चाहिए कि मोदी की तरह का असरदार चुनाव संचालन कैसे किया जाता है। और दूसरी तरफ उसे यह आत्ममंथन भी करना चाहिए कि किसी पार्टी को सरकार कैसे नहीं चलानी चाहिए। इस नौबत को देखें, और यहां पर चर्चा की गई बाकी बातों को देखें, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होती कि मीडिया में मोदी को इतना कवरेज क्यों मिला। इसे हम अनुपातहीन नहीं मानते, क्योंकि अगर मीडिया को महज पैसों से खरीदा जा सकता होता, तो उसमें तो कांग्रेस भी बराबरी की ताकत रखती है। आज की नौबत ऐसी किसी खरीद-बिक्री से परे की है, और उसे अनदेखा करना कांग्रेस के लिए आत्मघाती होगा। हमारे बहुत से वामपंथी दोस्त आज के भारतीय मीडिया के रूख को सिर्फ बिका हुआ मीडिया मान रहे हैं, लेकिन ऐसा मानना भी देश में साम्प्रदायिकता-विरोधी ताकतों के लिए गलत होगा, क्योंकि इससे उनको अपने निकम्मेपन के साथ जीने का एक बहाना मिल जाएगा। देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों को यह समझने की जरूरत है कि धर्म और साम्प्रदायिकता के मोर्चों से परे सरकार और भ्रष्टाचार के मोर्चों पर जब लोगों की विश्वसनीयता खत्म होती है, तो उस खाली हुई जगह में, उस शून्य में कम साख वाला कोई इंसान भी आकर जगह बना सकता है। मोदी अच्छे हों या बुरे, उनके प्रचार के तरीकों से लोगों को सीखने की जरूरत है। 

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