5 मई 14
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में जगह-जगह पीलिया से मौतें हो रही हैं, और इन मौतों के सामने आने वाले आंकड़ों से परे इनसे हजारों गुना अधिक लोग गंदे पानी और उससे होने वाली बीमारियों के शिकार होते रहते हैं, लेकिन खबर मौत की ही बनती है, इसलिए गरीबों की बीमारी चर्चा में नहीं आ पाती। इस बारे में हमने कुछ दिन पहले भी लिखा था, और उसके कुछ दूसरे पहलुओं पर फिर से लिखने की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ सहित हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्सों में पुराने शहरों में म्युनिसिपल के चले आ रहे पुराने इंतजाम दम तोड़ चुके हैं, और नाली और पानी जैसी दो बुनियादी जरूरतें मिलकर करीब-करीब एक हो चुकी हैं। कहां पर पीने का पानी नाली में जा रहा है, और कहां पर नाली का पानी पीने मिल रहा है, यह फर्क गायब हो गया है। इसकी एक वजह यह है कि स्थानीय संस्थाओं के जिम्मे जिन बुनियादी जरूरतों को सबसे अधिक अहमियत का माना जाता था, उन नाली, पानी, रौशनी, सफाई जैसी बातों को किनारे रखकर अब स्थानीय संस्थाएं, उनके निर्वाचित पदाधिकारी और अधिकारी, अपनी जमीन-जायदाद पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने को कामयाबी मानते हैं, और ऐसी सोच के पीछे की नीयत बहुत साफ भी रहती है।
हमारा मानना है कि स्थानीय संस्थाओं कारोबारी बनने से रोकना चाहिए, और उनको स्थानीय टैक्स लगाकर बेहतर जनसुविधाएं खड़ी करने के लायक बनाना चाहिए। लोकतंत्र में दरअसल स्थानीय संस्थाओं से बढ़कर अगर नेता ऊपर पहुंचते हैं, तो वे बेहतर विधायक और बेहतर सांसद भी हो सकते हैं, और लोकतंत्र का ऐसा ही ढांचा भारत में कागजों पर है। लेकिन जमीन पर इसका उल्टा हो रहा है, और मध्यप्रदेश के समय से स्थानीय संस्थाओं का ऐसा दीवाला निकलते आया है कि वहां पर तनख्वाह तक देने की नौबत नहीं रहती थी, और हर महीने निर्वाचित महापौर राज्य सरकार के सामने कटोरा लेकर खड़े होने को बेबस कर दिए जाते थे। छत्तीसगढ़ राज्य की बात करें तो यहां पर राज्य बनने के बाद से हालात सुधरे हैं, लेकिन स्थानीय संस्थाओं ने इतना अधिक पैसा देखा है, कि बड़े-बड़े कमाऊ प्रोजेक्ट, और कमाऊ ठेकों से परे, बुनियादी जरूरतों की तरफ से ध्यान हट गया है। यह नौबत खतरनाक है। क्योंकि आज नालियों से गुजरते हुए पीने के पानी के पाईप जितने सड़े हैं, आने वाले दिनों में वे कुछ और अधिक सड़ेंगे, न तो नालियों में बैक्टीरिया कम होंगे, और न ही पानी के लिए म्युनिसिपल के पाईपों पर लोगों की निर्भरता कम होगी। इसलिए नए शहरी ढांचों की तरह छत्तीसगढ़ के मौजूदा शहरों में एक नया इंतजाम करना पड़ेगा, क्योंकि साफ पानी न सिर्फ एक इंसानी हक है, सरकारी जिम्मेदारी है, बल्कि ऐसा इंतजाम सरकार के लिए इलाज के खर्च के मुकाबले सस्ता भी है।
दरअसल न सिर्फ सरकार में बैठा ताकतवर तबका, बल्कि समाज में किसी भी तरह की ताकत रखने वाला संपन्न या असरदार तबका अपने खुद के लिए साफ पानी जुटाने की ताकत रखता है। उसका नतीजा यह होता है कि समाज का जो कमजोर तबका ताकतवर लोगों के फैसलों का मोहताज रहता है, उस तबके के लिए साफ पानी जुटाना ताकतवर लोगों की निजी मजबूरी नहीं रहती। ऐसे में सत्ता का नजरिया गरीब के लिए अधिक फिक्र का नहीं रह जाता, और लोकतंत्र की बाकी संस्थाएं भी अपनी ताकत से अपने लिए साफ पानी पाती हैं, वक्त-बेवक्त इलाज की जरूरत पडऩे पर उसकी ताकत भी रखती हैं, और गरीब के लिए साफ पानी संसद और विधानसभा की प्राथमिकता पर नहीं आ पाता। हमने कुछ समय पहले इस बारे में लिखा था कि जिस देश का सचिन तेंदुलकर जैसा भारतरत्न एक महंगे वाटर फिल्टर की मॉडलिंग करने से परे, गरीबों के साफ पानी के हक के बारे में कभी मुंह भी न खोले, उस देश में आम जनता की फिक्र हो भी नहीं सकती।
साफ पानी एक काफी जटिल मसला है, और इस बारे में स्थानीय संस्थाओं के मार्फत शहरी ढांचे को सुधारने, और पंचायतों के रास्ते गांवों की हालत को सुधारने को सबसे बड़ी प्राथमिकता देनी चाहिए, और तब तक होना यह चाहिए कि बड़े नेता, अफसर, और पत्रकार भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में स्थानीय सादा पानी ही पियें, न कि बोतलबंद पानी।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें