28 दिसंबर 2011
संपादकीय
लोकपाल और अब उसके बाद
लोकसभा में लोकपाल विधेयक जिस मामूली फेरबदल के साथ कल बहुमत से मंजूर हो गया वह एक किस्म से सरकारी की कामयाबी रही और दूसरे किस्म से वह इस मायने में भाजपा की अगुवाई वाले विपक्षी खेमे के लिए नाकामयाबी रही कि इस लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की यूपीए की पहल को विपक्ष ने खारिज कर दिया। एक तरफ यूपीए सरकार चार दशकों से चली आ रही लोकपाल चर्चा को एक किनारे तक पहुंचाने वाली दर्ज हो गई और दूसरी ओर यह भी दर्ज हो गया कि इन दशकों में चार बार गैरकांगे्रसी सरकार भी केंद्र पर काबिज रहीं लेकिन उस वक्त लोकपाल नहीं बन पाया। कल का दिन यूपीए के नाम इसलिए लिखा जाना है क्योंकि उसके खिलाफ एक राजनीतिक अभियान छेडऩे वाले अन्ना हजारे कल अपनी बीमार हालत के बावजूद अनशन में देश में अकेले से पड़ गए और मुंबई-दिल्ली में अनशन की मौजूदगी जनता के बदले हुए तेवर का एक संकेत भी है। कल का दिन यूपीए, और खासकर कांगे्रस के लिए राहत का रहा होगा क्योंकि कोई आधे-पौन बरस में शायद यह पहला मौका रहा जब यूपीए अपने किसी काम में इस तरह कामयाब हुई।
कल लोकसभा की कार्रवाई में जब लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने वाली बात को भाजपा की सुषमा स्वराज के संशोधन के साथ खारिज किया गया तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पल भर में इसे राहुल गांधी की शिकस्त के रूप में दर्ज किया और कुछ इस तरह की हवा बांधने की एक कोशिश हुई कि यह बहुत बुरी हार है। एक तरफ तो कांगे्रस को इस बात के लिए गुनहगार ठहराया जा रहा था कि वह मजबूत लोकपाल बनाना नहीं चाहती। दूसरी तरफ जब लोकपाल को, चुनाव आयोग की तरह, एक संवैधानिक दर्जा देने की बात हुई तो सबसे मुखर चल रहे भाजपाई और वामपंथी पीछे हट गए। इसमें कांगे्रस की भला क्या हार हुई, जिसके बारे में यह भी कहा जाता रहा है कि वह एक मजबूत या असरदार लोकपाल लाना ही नहीं चाहती। या तो उसकी यह नीयत कामयाब हो गई, या फिर मजबूती की मांग करता विपक्ष नाकामयाब हो गया। एक ही तस्वीर के आगे-पीछे के दो पहलू एक साथ चस्पा करके कांगे्रस की कमजोरी का सुबूत नहीं बताए जा सकते। हमारा बहुत साफ मानना है कि लोकपाल को अगर संवैधानिक दर्जा दिया जाता तो शायद वह अधिक ताकतवर, अधिक आजाद होता लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि इसके लिए कांगे्रस के पास लोकसभा में वोट कम थे और भाजपा सहित कुछ और विपक्षी दलों ने वोटों की अपनी ताकत से इस राय को खारिज कर दिया। यह तो ठीक है कि गिनती को जुटाना विधेयक लाने वाली सरकार का काम होता है, भाजपा ने यही तर्क दिया है, लेकिन विपक्ष के इस तर्क के साथ-साथ उसके नाम के साथ अब यह भी चस्पा हो गया है कि उसने लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का विरोध किया।
हम अभी तुरंत ही लोकपाल के मौजूदा ढांचे पर बात करना जरूरी इसलिए नहीं समझते क्योंकि अभी इसकी तकनीकी बारीकियां सामने आएंगी, विधेयक के पारित होने के बाद संशोधनों सहित एक नया मसौदा सामने आएगा और उसका अधिक जानकार लोग विश्लेषण करेंगे। फिर अभी राज्यसभा से इस विधेयक को गुजरना है और वहां पर हमारा ऐसा ख्याल है कि कांगे्रस के सामने इसके पक्ष में बहुमत जुटाना बड़ी चुनौती न रहकर, यह भाजपा के सामने बड़ी चुनौती रहेगी कि वह इसका समर्थन करे या इसका विरोध करे। इसका विरोध करने के बाद भाजपा जनता के बीच क्या जवाब दे सकेगी यह सोचना हमारे लिए कुछ मुश्किल है। इसलिए आज राज्यसभा से अगर यह विधेयक पास होकर कानून बन जाता है तो उसके बाद ही उन बारीकियों पर हमारा राय देना ठीक होगा जिनके बारे में अंगे्रजी जुबान में यह कहा जाता रहा है कि डेविल इज इन द डिटेल्स... (गड़बड़ी तो खुलासे में होती है)। लेकिन आज हम लिखना यह चाहते हैं कि पिछले कई महीनों से यूपीए सरकार जिस बात के लिए बाबा-अन्ना-श्रीश्री जैसे लोग कोसे चले जा रहे थे, और इन तीनों की राजनीतिक डिजाइनों से फायदा पाने वाली भाजपा बहुत खुश चल रही थी, आज उसके हाथ से लोकपाल का मुद्दा छिन गया और अब उसे उत्तरप्रदेश चुनाव के लिए भी एक नया मुद्दा ढूंढना होगा। दूसरी बात यह रही कि दिल्ली की मीडिया के बहुत से विश्लेषकों ने पिछले कुछ दिनों में यह बात लिखी, और कल भी संसद की कार्रवाई के बाद चल रहे विश्लेषण में यह बात कही कि लोकपाल के मुद्दे पर भाजपा का सरकारी रूख का अंधा विरोध करना कुछ ऐसा आभास पैदा करता है कि मानो अब भाजपा को दुबारा सत्ता में आने की फिक्र नहीं है। वह अन्ना-बाबा की फरमाईश पर इतने किस्म की अव्यवहारिक बातों को मानते और बढ़ावा देते हुए यहां तक पहुंच गई है कि सरकार चलाने की नौबत आने पर उसे खासी दिक्कत हो सकती है। और यह बात हम ऐसी किसी दिक्कत को ध्यान में रखकर नहीं छेड़ रहे। सुधार का कोई भी कानून किसी भी सरकार के लिए परेशानी खड़ी करता ही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि मौजूदा सरकार की परेशानी बढ़ाने के लिए सत्ता का अनुभवी विपक्ष कई ऐसी फरमाईशों को मानने को तैयार हो जाए जो कि लोकपाल को एक दानव सा ताकतवर बनाकर रख दे जो कि लोकतंत्र के बाकी पायों पर भारी पडऩे लगे। एक तरफ तो भाजपा और वामपंथी कुछ इस तरह की मांग करते हुए अन्ना के मंच पर चले गए, और दूसरी तरफ भाजपा के राज्य उत्तराखंड के लोकायुक्त विधेयक की कमजोरियां कल संसद में कांगे्रस ने उजागर कीं। कांगे्रस ने जब उत्तराखंड का लोकायुक्त कानून पढ़कर बताया तो भाजपा भी चुप रह गई क्योंकि उसमें मुख्यमंत्री के खिलाफ तभी कुछ हो सकता है जब उस पर सौ फीसदी सहमति हो। इसके अलावा भी बहुत सी बातें सत्ता की बेईमानी को बचाने के हिसाब से रखी गई हैं।
कुल मिलाकर हम यही कहेंगे कि भाजपा और वामपंथियों ने इस मोर्चे पर साझेदारी से जो कुछ किया उसका कोई फायदा उन्हें नहीं मिल पाएगा बल्कि उनके कहने और करने का फर्क स्थापित हो गया। दूसरी तरफ लोकपाल में आगे चलकर जितने किस्म के संशोधनों की जरूरत पड़ेगी वे होते चलेंगे जैसा कि इसके पहले के भी कई कानूनों में होते आया है। आज देश को जंतर-मंतर और रामलीला से खड़े किए गए इस हव्वे से उबरने की जरूरत है कि यह देश भ्रष्टाचार में डूब चुका है। ऐसी निराशा और ऐसी भड़ास के साथ कोई काम नहीं चलता। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई बहुत से मोर्चो पर बहुत किस्म से जारी रहनी चाहिए और उसके लिए देश के मौजूदा कानून और नए बनने जा रहे लोकपाल का पूरा इस्तेमाल लोगों को करना चाहिए, बजाय भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर एक तानाशाही को, एक अराजकता को स्थापित करने के।
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अन्ना टीम कुछ भी कहे, ये बात बहुत पहले से तय थी कि लोकपाल बी जे पी के लिऐ राजनैतिक फायदे का खेल था, टीम अन्ना इस लोकलुभावने नारे के साथ मोहरे का काम कर रही थी,खामियाजा हम आप विशेषकर गैरकाग्रेसी राज्यो के लोगो को उठाना पडा कि कि योजनाओ पर राज्यसरकार की बंदरबाट से हर किसी का ध्यान बंट गया,काग्रेस ने तो शायद कुछ हिम्मत भी दिखाई इस बिल को लेकर, पर बाकी लोग से फंसाऐ रखने में लगे रहेगें,जिसमें टीम अन्ना की भी मीडियापरस्त दुकानदारी शामिल हैं
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