24 सितंबर 2012
नेपाल में इन दिनों एक बड़ा दिलचस्प तजुर्बा हुआ है। मीडिया से जुड़े एक संगठन ने इसी पखवाड़े वहां मीडिया-गुफा नाम का एक प्रयोग किया जिसमें वहां के कुछ चुने हुए पत्रकार शामिल किए गए। इंटरनेट और कम्प्यूटर पर काम करने के आदी पांच पत्रकार 72 घंटों के लिए बिना किसी टेलीफोन के एक कमरे में बंद कर दिए गए। उनको सिर्फ इंटरनेट पर खबरों को देखकर इंटरनेट पर ही लिखना था और उनकी रिपोर्ट्स ग्रामीण इलाकों के आम सरोकारों से जुड़ी हुई बहुत अच्छी रिपोर्ट होने की शर्त भी थी। इस दौरान तैयार की गई रिपोर्ट कुछ समय में सामने रखी भी जाएंगी।
इस बारे में छपी खबर के मुताबिक, आयोजकों का कहना है कि वह केवल इंटरनेट के जरिये मिली जानकारियों से स्टोरी तैयार करने की संभावनाओं का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे कि ग्रामीण नेपाल को मीडिया में ज्यादा कवरेज दिलाई जा सके। इन पत्रकारों को सिर्फ इंटरनेट की सहूलियत दी गई है और खबरों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए वो उसका हर तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन उन्हें अपना मुंह बंद रखना होगा।
'इन लोगों को लैपटॉप कंप्यूटर जैसे उपकरण तो दिए गए हैं लेकिन न तो उन्हें फोन पर किसी से बात करने की इजाजत है न ही आपस में। कैंप में शामिल गुनराज लुइतेल ने बताया, नेपाली में गुफा का मतलब पहाड़ की कंदरा होता है। हमारे इतिहास में बुद्घिमान लोग अकसर ज्ञान के लिए गुफाओं में जाकर वक्त बिताया करते थे, अब नई मीडिया के बारे में जानकारी जुटाने की हमारी बारी है।Ó
'इन पत्रकारों से उम्मीद लगाई गई है कि ये लोग स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु में बदलाव, स्त्री पुरुषों और बच्चों से जुड़ी ग्रामीण खबरें तैयार करेंगे। इसका विचार उन्हें फ्रांस में इसी तरह के एक आयोजन से मिला जिसके बारे में उन्होंने इंटरनेट पर पढ़ा था।Ó
'रिपोर्ट में एक पत्रकार ने कहा-यह सीखने को मिलेगा कि सोशल मीडिया को एक उपकरण की तरह कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है। केवल इंटरनेट के जरिये खबर ढूंढना और सारे इंटरव्यू इंटरनेट के जरिए करना एक कठिन काम है क्योंकि नेपाल में इंटरनेट का इस्तेमाल उतना नहीं होता, लेकिन एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए यह एक शानदार अनुभव होगा।Ó
'पत्रकारों के साथ तीन रिसर्चरों की एक टीम भी है जो उनके कामकाज और व्यवहार पर नजर रखेगी और उन्हें दर्ज करेगी। इन शोधकर्ताओं का कहना है-हम उनके मानसिक तनाव पर नजर रखेंगे और साथ ही उनकी आदतों में होने वाले बदलाव पर भी। इन जानकारियों का बाद में इस्तेमाल होगा।Ó
अब इस प्रयोग पर अगर आज बात करें तो दुनिया में मीडिया की शक्ल इंटरनेट से दो किस्म से बदल गई है। एक तो यह कि खुद अखबारनवीसों के लिए दुनिया अब बहुत बड़ी हो गई है, पल भर में वे दुनिया भर की बातों को वे जान जाते हैं, और अंगे्रजी के साथ-साथ हिन्दी, दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं या बोलियां जिस तरह से इंटरनेट पर पहुंच चुकी हैं उससे इन भाषाओं-बोलियों वाले लोग भी इंटरनेट को पढऩे लगे हैं और इंटरनेट पर लिखने लगे हैं। लेकिन बात यहीं तक नहीं रह गई है। सिर्फ पाना और देना होता तो भी उसकी एक सीमा होती। इंटरनेट पर तमाम किस्म की वेबसाईटों पर जिस तरह से लोगों के बीच अंतरसंबंध बढ़ रहे हैं, उससे भी लोगों का दायरा अपने शहर और अपने दोस्तों से निकलकर पूरी दुनिया तक पहुंच चुका है।
ऐसे में जब कुछ पत्रकार जब यह तय करते हैं कि वे टीवी और टेलीफोन से दूर रहकर इंटरनेट पर ही पढ़कर और लिखकर अखबारनवीसी करेंगे, तो यह कुछ उसी किस्म की बात लगती है जैसी कि कहानियों में किसी पहाड़ पर तपस्या करते हुए किसी ऋषि के बारे में कहा जाता है कि वहां आंखें बंद करके ध्यान करते हुए भी वे पूरी दुनिया की खबर रख लेते थे। कुछ लोगों को त्रिकालदर्शी जो कहा जाता था, वे भी कुछ इसी किस्म की खूबी वाले रहे होंगे और उनके पास टेलीफोन-इंटरनेट के बिना भी गूगल रहा होगा।
आज इस मुद्दे पर मैं इसलिए लिख रहा हूं कि न सिर्फ इस दायरे में, बल्कि दुनिया के हर दायरे में लोग कभी-कभी एक कसरत के लिए ऐसा कर सकते हैं। लोग अपने बदन को एक कसौटी पर कसने के लिए कभी उपवास करते हैं, तो कभी कई किस्म के योग करते हैं। कुछ लोग कुछ समय के लिए मौनव्रत रखते हैं। कुछ लोग साल के किसी एक पखवाड़े हजामत नहीं बनाते। इन दिनों ऐसे लोग भी मिल रहे हैं जो कि फेसबुक जैसी यारी-दोस्ती और सामाजिक अंतरसंबंधों वाली वेबसाईट पर न जाने के दिन या घंटे तय कर लेते हैं कि इनके बिना किस तरह रहा जा सकता है।
मेरे जैसे कुछ लोग साल में कभी-कभी यह कोशिश भी कर देखते हैं कि पान-सुपारी के बिना कितने दिन रहा जा सकता है।
फिर से मीडिया गुफा की तरफ लौटें तो यह प्रयोग बड़ा दिलचस्प लगता है। देखने, सुनने, चखने, सूंघने और छूने की शारीरिक क्षमताओं में से मानो एक दो को कुछ देर के लिए पट्टी बांधकर अलग कर दिया गया, और बाकी क्षमताओं को मौका दिया गया कि वे अपने बूते किस तरह काम चला सकती हैं। यह कुछ वैसा ही जैसा कि न देख पाने वाले कुछ लोग अपनी बाकी क्षमताओं में तेज हो जाते हैं।
तजुर्बे के लिए अगर एक बंद कमरे में बैठकर सिर्फ इंटरनेट पर अगर लोग अपने देश, अपने इलाके और अपने कस्बे को जानना चाहते हैं, और बताना चाहते हैं, तो इससे सिर्फ उनके अपने हुनर की धार की परख नहीं होती बल्कि उनके इलाके की इंटरनेट तक पहुंच, उन इलाकों की इंटरनेट तक पहुंच, उनकी जिंदगी के मुद्दों की इंटरनेट पर जगह, जैसे बहुत से पहलू ऐसे प्रयोग में परखे जाते हैं।
आज लोग चाहें तो अपने बच्चों को किसी एक ऐसे प्रोजेक्ट का काम दे सकते हैं जिसमें उनके पास इंटरनेट और किताबों की सहूलियत न हो। ऐसे में वे आसपास के जानकार ढूंढ़ेंगे, उनसे मिलेंगे, उनसे कुछ हासिल करने के लिए उनसे बर्ताव सीखेंगे, और यह तजुर्बा उनको दूर तक काम आएगा। आज बच्चे इंटरनेट की अपनी जिंदगी को ही एक पूरी हकीकत सा मान लेते हैं, और बच्चे ही क्यों बड़े भी ऐसा मान लेते हैं इसलिए कोई तो ऐसा प्रयोग हो जिसमें लोगों को इन दिनों चलन में बढ़ चुकी साइबर जिंदगी से लौटकर असल जिंदगी की गुफा में थोड़ा सा वक्त गुजारने मिले। कुछ समय पहले मैंने कहीं पर यह भी लिखा था कि क्या हफ्ते या महीने में कोई एक दिन या कुछ घंटे कुछ लोग बिना फोन और टीवी के भी गुजार सकते हैं।
जहां-जहां सीमाएं तय कर दी जाती हैं, जहां लोगों को सीमित साधनों से काम चलाना होता है, वहां उन्हें वह अनुभव उनको असीमित साधनों के भी बेहतर इस्तेमाल में मदद करता है। मीडिया गुफा की तरह लोग अपनी जिंदगी के किसी दायरे में कुछ वक्त के लिए ऐसी गुफा बनाकर किसी ऋषि या तपस्वी की तरह एकाग्रता की कोशिश कर सकते हैं, और उसके नफे-नुकसान भी देख सकते हैं।

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