संपादकीय
20 सितंबर 2012
खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को निवेश की छूट, और डीजल के दाम बढऩे के खिलाफ देश की बहुत सी राजनीतिक पार्टियों ने आज बंद करवाया है जिसका कम या अधिक असर चारों तरफ से सामने आ रहा है। ये दोनों मुद्दे पिछले कई महीनों से हवा में तैर रहे थे, और इन्हीं को लेकर भारत के सत्तारूढ़ गठबंधन यूपीए में दरार पड़ चुकी है, और कांगे्रस के बाद इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी, तृणमूल कांगे्रस सरकार और गठबंधन से बाहर आने की मुनादी कर चुकी है। लेकिन आज की यहां की बात यूपीए नहीं है, बल्कि देश है, और बंद है।
चाहे कोई भी राजनीतिक दल या संगठन बंद के पीछे हो, उसका नुकसान पूरे इलाके को झेलना पड़ता है। और भारत में कहने को चाहे पुलिस और स्थानीय सरकार लोगों की हिफाजत के लिए मौजूद हो, यह बात अपनी जगह तय है कि बंद के आतंक के चलते लोग अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए भी हौसला नहीं जुटा सकते। कहने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बंद के खिलाफ कई तरह के फैसले दिए हैं, लेकिन सड़कों पर हिंसा पर उतारू भीड़ के सामने ऐसे कोई फैसले काम नहीं आते। और राजनीतिक दलों की सरकारें भी ऐसे बंद को लेकर भीड़ से किसी टकराव की न ताकत रखतीं और न ही उनकी नीयत बंद के सिलसिले को बंद करने की रहती। लेकिन यह सिलसिला सबसे कमजोर तबके पर सबसे बुरी मार करता है। जो लोग रोज कमाते-खाते हैं, जो रोज बिकने वाले सामान बेचते हैं, उनके उस दिन के चाय-समोसे अगले दिन दुगुने तो बिकने से रहे। यही हाल रोज के काम वाले मजदूरों का होता है और गरीब फेरीवालों का भी होता है।
केंद्र सरकार के किसी फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की रेलगाडिय़ों को रोक देने से दिल्ली की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है, दिल्ली तो विमान से सफर करती है, और आज तक हिंदुस्तान का कोई बंद हवाई अड्डों को तो बंद करवा नहीं पाया। फर्क तो पड़ता है उन मुसाफिरों को जो इन रेलगाडिय़ों से सफर करते हैं, बसों से चलते हैं या किराए के रिक्शे-आटो से चलते हैं। बंद करवाते जो नेता घूमते हैं, उनके घरों के लिए निजी गाडिय़ां रहती हैं। लेकिन जो मुसाफिर सामान सहित स्टेशन या बस अड्डे पर फंस जाते हैं, जो घर से अस्पताल नहीं जा पाते, उन पर बंद का फर्क पड़ता है। बड़ी-बड़ी होटलों में ऐसे बंद के दिन रेस्त्रां भी चलते हैं और शराबखाने भी। लेकिन जो गरीब यहां नहीं जा पाते, उनको खाना भी नसीब नहीं हो पाता। गैरबराबरी का यह सिलसिला कारखानों तक जारी रहता है। आज के बंद में कोई कारखाना तो बंद है नहीं, बड़ी कंपनियों के दफ्तर भी बंद नहीं हैं, लेकिन सबसे गरीब तबके की जिंदगी बंद है। इससे सरकार की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है? अगर बंद करवाने वाले यह सोचते हैं कि इससे सरकार को एक दिन में टैक्स का इतना नुकसान हुआ है, तो यह सोच झांसा देने वाली है। टैक्स वाले सारे बड़े सामान तो अगले दिन भी बिक जाएंगे, जो नहीं बिकेगा वह छोटे लोगों का सड़क किनारे का सामान।
इसलिए हम सरकार का विरोध करने के लिए बंद का तरीका जनतांत्रिक नहीं मानते, जनता के हितों के खिलाफ मानते हैं। और भीड़ की ताकत के बल पर ऐसे किसी बंद को कामयाब बना लेने से कुछ भी साबित नहीं होता। चूंकि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता, इसलिए लोग भीड़ से उलझते नहीं हैं। आज शाम तक इस बंद के बारे में जनता का खुद होकर किया गया स्वस्फूर्त बंद जैसी बातें बयानों में जारी होने लगेंगी, यह सार्वजनिक बयानबाजी का फिर एक बड़ा झांसा होगा। कोई गरीब कभी बंद नहीं चाहते। इसलिए यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए और उस गरीब जनता को तकलीफ और नुकसान से बचाना चाहिए जिसे तकलीफ और नुकसान से बचाने के नाम पर यह ज्यादती की जाती है।

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