संपादकीय
21 सितंबर 2012
आज देश के सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन के खालिस हिंदुस्तानी मिजाज वाले मुखिया शरद यादव ने एक इंटरव्यू में कहा कि यह विपक्ष की गलती थी जिसने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध किया था। उन्होंने कहा-सोनिया गाँधी को पूरा देश (नेता) मान गया था। देश की सबसे बड़ी पार्टी सोनिया गाँधी को (नेता) मान गई थी। हम कौन होते हैं ये कहने वाले कि वो इस देश में कब आईं। वो बैठतीं तो ढाई या तीन साल रहतीं, अच्छी होती तो रहतीं, बुरी होती तो हट जातीं। देश की जनता ने उन्हें जनादेश दे दिया। ये सच है ना। सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री बनना चाहिए था। अगर वो प्रधानमंत्री होतीं तो आज ये स्थिति नहीं होती, क्योंकि उन्हें पार्टी चलानी है। मनमोहन सिंह ने एक बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और हार गए। उन्होंने तो कॉर्पोरेशन का चुनाव भी नहीं लड़ा। सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री होतीं तो बिल्कुल बेहतर होता। देश इस तरह गड्ढे में नहीं जाता। पी. चिदंबरम, मोंटेक सिंह और प्रधानमंत्री को हटाए बिना देश नहीं चल सकता। ये लोग देश को जानते ही नहीं हैं। ये लोग अमरीका और यूरोप के लोगों के अंदाज में अंग्रेजी बोलते हैं।
शरद यादव एनडीए के भीतर सबसे अधिक संतुलित और समझदार बातें करने के लिए जाने जाते हैं। उन्हें हम खालिस हिंदुस्तानी इस हिसाब से लिख रहे हैं कि वे जानते हुए भी अंगे्रजी का इस्तेमाल नहीं करते, विदेश नहीं जाते और अपने रहन-सहन में वे ठेठ देशी देहाती जैसे रहते हैं। एनडीए के भीतर रहते हुए भी वे साम्प्रदायिकता से दूर रहते हैं, और यही वजह है कि अपने कुछ साथी दलों की सोनिया गांधी से नफरत से दूर रहते हुए वे आज तथ्य और तर्क की बात कह रहे हैं, जिसे कि भारत के आज के विपक्ष के लिए कुछ असुविधा की बात भी लोग मान सकते हैं। हमारा भी यही मानना है कि लोकतंत्र में नेता का, और खासकर सरकार चला रहे नेता का निर्वाचित होकर आना जरूरी होता है। मतदाताओं के प्रति जवाबदेही बहुत सी बातें सिखा देती हैं। उत्तरप्रदेश के चुनावों में चाहे राहुल गांधी को एक बुरी शिकस्त मिली हो, या उम्मीद जितनी कामयाबी न मिली हो, हमारा यह मानना है कि चुनाव की आंच ने उनको तपाकर कुछ तो मजबूत किया ही होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर उनके सबसे बड़े सहयोगी योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया तक, जमीन से जुड़े हुए लोग ये लोग नहीं हैं। ऐसे में जो सोनिया गांधी कांगे्रस पार्टी और यूपीए को चलाती हैं, उनकी अपनी हादसों से भरी हुई निजी जिंदगी, उनकी जान पर मंडराता खतरा, और भारत की उनकी सीमित समझ के चलते उन्होंने प्रधानमंत्री निर्वाचित हो जाने के बाद भी दुनिया के लोकतंत्र का यह सबसे बड़ा पद संभालने से मनाही कर दी थी। हम शरद यादव के अंदाज पर कोई अंदाज नहीं लगा सकते कि सोनिया गांधी मनमोहन सिंह से अधिक कामयाब होतीं या नहीं, लेकिन हमारा यह मानना है कि इस विशाल देश का जो भी मुखिया हो, वह न सिर्फ जनता के बीच से चुनकर आए, बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जनता से मुखातिब होने का हौसला भी जिसके भीतर हो। आज मनमोहन सिंह क्या सोचते हैं, इसे शायद उनके आसपास के कुछ लोग जानते हों, बाकी देश को कुछ-कुछ महीनों के बाद कभी उसकी एक झलक मिलती है। यह सिलसिला इस देश की जनता में अपने खुद के लोकतंत्र के लिए भरोसा कायम रखने वाला नहीं है और लोग इसी वजह से प्रधानमंत्री को मजाक का सामान मानते हैं। सरकार के दूसरे कुछ ओहदे ऐसे हो सकते हैं जो सरकारी नौकरों से चल सकें, लेकिन इस लोकतंत्र का मुखिया जनता के प्रति अधिक जवाबदेह होना चाहिए, और जनता की नब्ज पर उसका हाथ सीधे टिका होना चाहिए।
सोनिया गांधी ने अपनी तरफ से जनता की नब्ज तक पहुंचने की एक कोशिश की थी, जो अब भी जारी है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनाकर उन्होंने जनता के बीच काम करने वाले कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपने आसपास रखा था और उनकी राय केंद्र सरकार की नीतियों को प्रभावित करते आ रही हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि अनगिनत घोटालों के मूकदर्शक बने रहे मनमोहन सिंह को अगर मतदाताओं के बीच आना-जाना होता, तो वे अपनी निजी ईमानदारी के दावे को काफी न मानते हुए, अपनी टोली को भी ईमानदार रखने की फिक्र करते। सोनिया गांधी की शोहरत और उनकी लोकप्रियता पर टिके हुए मनमोहन सिंह इस देश के प्रति जवाबदेह नहीं रह गए थे, नहीं रह गए हैं। ऐसे में उनके मुकाबले कम आर्थिक समझ रखने वाले कोई दूसरे लोग बेहतर हो सकते थे।
शरद यादव की बात गौर करने के लायक है, और आगे जाकर फिर कभी विदेशी मूल की बात अगर शरद यादव के साथी सोचें तो उन्हें इस बात पर भी सोचना चाहिए।

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