अविश्वास के गहरे अंधेरे में डूबा हुआ देश...


संपादकीय
18 सितंबर 2012
आज एक खबर यह है कि एक नौजवान ने ठीक काम न मिलने की वजह से, और महंगाई की वजह से आत्महत्या कर ली। दूसरी खबर यह है कि एक युवती ने आत्महत्या कर ली जो कि शायद उसकी बेरोजगारी की वजह से है। तीसरी तस्वीर हमारे सामने है जिसमें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए गरीबों का समंदर सा दिख रहा है। इसके साथ-साथ पिछले कुछ हफ्तों की तरह आज भी यह खबर है कि किस तरह देश के बड़े-बड़े नेताओं और कारखानेदारों ने खदानों को लूटा, हजारों एकड़ जमीनें पाईं, और कैसे-कैसे वे अरबपति से खरबपति हुए। सरकारों ने तो अपनी तरफ से उनको यह सब कुछ दे ही दिया है, किसी के उठाए गए मुद्दे को लेकर अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है, सीबीआई तक पहुंच गया है तब जाकर सरकार इन खदानों पर दुबारा सोच-विचार कर रही है। 
इसी से जुड़े हुए मुद्दों पर रोज लिखना हमको अच्छा तो नहीं लगता है, लेकिन जब लाशें टंगी हुई रहें, और वे महंगाई-बेरोजगारी पर टंगी रहें, तो आज और किस मुद्दे पर लिखा जाए? देश की हालत भयानक है। ऐसी कोई वजह नहीं बची है कि देश के आम लोगों को सरकार पर, लोकतंत्र पर भरोसा रहे। नक्सली नेता ऐसे में जब सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई की बात करते हैं, तो उन्हें सरकार की खत्म हो चुकी साख का पूरा भरोसा रहता है, उन्हें लोकतंत्र की बदहाली पर पूरा भरोसा रहता है, उन्हें भारत में अमरीकी और गरीबी के बीच समंदर से फासले का पूरा भरोसा रहता है। हिंदुस्तान की जनता अगर इतनी अमनपसंद नहीं होती, उसे धर्म के मार्फत पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, यह जन्म और अगला जन्म गिनाते हुए संघर्ष से दूर नहीं रखा गया होता, तो वह सरकार और ताकतवर तबकों के खिलाफ आज उठ खड़ी हुई रहती। देश की हालत बहुत ही खराब है। एक तरफ कुपोषण से देश के बच्चों की हालत अफ्रीका के गरीब देशों के मुकाबले भी बहुत अधिक खराब है, और दूसरी तरफ सत्ता की मेहरबानी से देश को लूटना आसमान तक पहुंच गया है। सारी अदालतें, सारी जांच एजेंसियां मिलकर भी व्यक्तिगत रूप से सज्जनता का दावा करने वाले प्रधानमंत्री के मातहत हुए सारे भ्रष्टाचार को कैसे वापिस ले जा पाएंगी? कोयले की दिक्कत से आने वाले बरस इस देश के अंधेरे में डूब सकते हैं, लेकिन जनता के मन में आज ही इतना अंधेरा छाया हुआ है, कि उस अंधेरे के बीच घूमने-फिरने में, मोर्चा जमाने में हथियारबंद नक्सलियों को एक सहूलियत लगती है।
और अभी देश के अगले चुनाव दो साल दूर हैं। खरीदे गए, या तोड़े-मरोड़े गए, किसी भी तरह से जुटाए गए आंकड़ों से चलती यह जुगाड़ सरकार बनी रहने का इस सरकार को पूरा हक है। लेकिन यह हक देश को ले जा कहां रहा है? और जब दिल्ली की गंगोत्री से गंदा पानी बहकर निकलता है तो बाकी राज्यों को भी अपनी नीयत गंदी करने का हक सा मिल जाता है। इसलिए अब किसी राज्य में पचीस-पचास हजार करोड़ का लौह अयस्क घोटाला हो रहा है तो कहीं पन्द्रह-बीस हजार करोड़ का ग्रेनाइट घोटाला। और इनको देखते हुए म्युनिसिपलों या पंचायतों को कौन सी राह दिखती है? और इन सबको देखते हुए आम जनता को सिवाय भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अविश्वास करने के और कौन सी राह दिखती है? 
कुल मिलाकर सिलसिला बहुत खतरनाक कगार पर आकर खड़ा हुआ है। लोगों के मन में अनास्था और अविश्वास ने गहरे घर कर लिया है। और आज सरकार को किसी भी तरह का टैक्स देने के पहले लोगों के मन में यह बात आती है कि उसका कितना हिस्सा चोरी में चले जाएगा? और जब उसके दिए टैक्स की चोरी ही होनी है, तो फिर वह टैक्स दे ही क्यों? 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें