बेहतर सरकार, फिर भी बदहाल बिहार के गांव


संपादकीय
24 सितंबर 2012
देश में कुछ दूसरे राज्यों से बेहतर माने जाने वाले बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार के पिछले लालू राज से बेहतर सरकार चलाने वाला भी माना जाता है। लालू-राबड़ी का राज वहां खासा लंबा चला था, और उस दौरान न सिर्फ जानवरों का चारा खा लिया गया, बल्कि अपने-आपको समाजवादी कहने वाले लालू यादव ने कुनबापरस्ती का वह हाल दिखाया जो कि गांधी-नेहरू परिवार कुनबापरस्ती के लिए बदनाम रहने के बावजूद नहीं दिखा पाया था। अदालती कार्रवाई के चलते जब लालू को सरकार छोडऩी पड़ी थी तो उन्होंने अपनी घरेलू पत्नी को पल भर में मुख्यमंत्री बनाकर कार की पिछली सीट से स्टीयरिंग संभालने की एक नई मिसाल पेश की थी। उसके बाद वहां पर उनकी पत्नी के भाई से लेकर और लोगों तक सरकार जिस तरह बिछी रही, वह भी इतिहास में दर्ज है। 
लेकिन आज यहां लालू पर चर्चा का कोई मौका नहीं है। मौजूदा मुख्यमंत्री वहां पर एक अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं और इसकी शुरूआत में एक विरोध हुआ है जिसे उन्होंने लालू यादव पर जड़ दिया है। हो सकता है कि यह विरोध सही हो, और यह भी हो सकता है कि नीतीश का कहना सही हो। लेकिन इससे भी इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पांच बरसों में भी बिहार का हाल बहुत बेहतर नहीं हो पाया है। अभी किसी ने राज्य का दौरा करके बीबीसी पर इसके बारे में लिखा है कि विकास और संपन्नता की चकाचौंध वहां पटना से आगे नहीं निकल पाई है। जैसे-जैसे राजधानी से दूर जाएं, वैसे-वैसे जिंदगी के हर दायरे में अंधेरा बढ़ते चलता है। कल ही जब हमने असम और उत्तर-पूर्व के बारे में लिखा, तो वहां भी दिल्ली में बैठी सरकार की नजर पहुंचते हुए बहुत धुंधली हो जाती है। यह हाल हमने अविभाजित मध्यप्रदेश में भोपाल की सरकार का छत्तीसगढ़ को लेकर रूख देखते हुए भी देखा था। अब छत्तीसगढ़ में कुछ लोगों को लगता है कि बस्तर के दूर के इलाके राजधानी रायपुर से अनदेखे रह जाते हैं। 
प्रशासन या शासन, इसके लिए एक व्यवहारिक आकार की जरूरत होती है। एक छोटा राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ ने जो तरक्की की है, उसी के आसपास की तरक्की शायद झारखंड की भी हुई होती अगर वहां पर सरकारें लूटपाट में न लगी होतीं। मुख्यमंत्रियों से लेकर राज्यपाल तक जिस कदर कमाई में और जुर्म में लगे रहे, वैसा तो शायद देश के किसी दूसरे राज्य में कभी दर्ज नहीं हुआ। इसलिए झारखंड को एक छोटे राज्य के रूप में असफल मानना ठीक नहीं है, जब बाड़ ही खेत खाने लगे, तो फसल के कीड़ों को क्या रोना। इसलिए उत्तरप्रदेश हो या बिहार, बहुत बड़े राज्यों के दिन अब नहीं रह गए हैं। छोटे राज्य अस्तित्व में आने के बाद से बेहतर बनने की संभावना रखते हैं। नीतीश कुमार बहुत से मामलों में भले लगते हैं। उनका निजी जीवन शायद लालू यादव के मुकाबले अधिक समाजवादी है, सादगी से भरा है। एनडीए के भीतर रहते हुए भी वे साम्प्रदायिकता के गुलगुले से परहेज करते दिखते हैं। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए वे यह भी कह चुके हैं कि वे 2014 में केंद्र में ऐसी किसी भी पार्टी को सरकार बनाने में साथ देंगे, जो कि बिहार को विशेष दर्जा देगी। 
विशेष दर्जे की ऐसी नौबत ठीक नहीं है। और बिहार के गांवों के बारे में जो खबरें आती हैं, वे कुछ उसी तरह की हैं जैसी कि उत्तरप्रदेश के गांवों के बारे में है। और यह बात भी जाहिर है कि भौगोलिक रूप से देश के बीचों-बीच होने के बावजूद अगर उत्तरप्रदेश और बिहार में उद्योग और व्यापार नहीं पनप पाए हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह देश-विदेश के कारोबारियों का वहां पर भरोसा नहीं पनप पाना भी है। उत्तरप्रदेश को बांटने की मांग लंबे समय से चल ही रही है, बिहार का आकार भी विकराल है। और पहले के मुकाबले पिछले पांच बरस की बेहतर सरकार भी अगर बिहार के गांवों की हालत नहीं सुधार पाई है, तो यह नौबत बदलने के लिए शायद पटना के अलावा एक और राजधानी की जरूरत है। 

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