संपादकीय
8 सितंबर 2012
ओडिशा में कांगे्रस के एक बहुत जबर्दस्त प्रदर्शन की अगुवाई करने के लिए दिल्ली से इस पार्टी के एक बड़े नेता जगदीश टाइटलर पहुंचे थे, वे पार्टी के मामलों कें ओडिशा के प्रभारी भी हैं और जैसा कि पूरे देश को याद है, वे आपातकाल की ज्यादतियों के दौर में, उस वक्त के बेताज तानाशाह संजय गांधी के बहुत करीबी थे, और 1984 के सिख विरोधी दंगों में उन पर लगे दाग अब तक अदालत में परखे जा रहे हैं। इसलिए अगर उनकी मौजूदगी में हुए प्रदर्शन में उनके आव्हान के बाद जब कांगे्रसियों ने एक महिला सिपाही पर बुरी तरह हमला किया, और ढेरों कैमरों की मौजूदगी में हमला किया, तो उसके पीछे की राजनीतिक संस्कृति पर किसी हैरानी की गुंजाइश नहीं थी। कांगे्रस पार्टी एक समय इतने लंबे समय तक इंदिरा गांधी के मातहत काम कर चुकी है, वह शायद दुनिया की किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के लिए एक इतिहास है। उनके बाद उनकी बहू सोनिया गांधी का इस पार्टी पर राज है। लेकिन इन महिलाओं की अगुवाई के बाद भी इस पार्टी का चरित्र महिलाओं पर जुल्म करने का बना हुआ है।
कदम-कदम पर यह पार्टी गुफा में जीती हुई लगती है, और हरियाणा की खाप पंचायतों को लेकर इस पार्टी के वहां के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा, और वहां के नौजवान, विदेश-शिक्षित, खिलाड़ी-उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल का तालिबानी रूख पिछले ही बरस रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है। महाराष्ट्र में इस पार्टी की मुखियाई वाली सरकार ने डांस बार पर हमले करके एक तंगनजरिए वाली संस्कृति को थोपने की कोशिश की, और दसियों हजार महिलाओं को बेरोजगार कर दिया, जिनमें से बहुत सी महिलाएं इस सुरक्षित वयस्क-मनोरंजन से शायद देह के धंधे की तरफ चली गई होंगी। इसी महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में पिछले कुछ महीनों से पुलिस का एक मंझले दर्जे का अफसर अपनी नीतियों के आधार पर पार्टियों और नौजवानों के नाच-गाने के खिलाफ एक संस्कृति को थोप रहा है, और उसका नतीजा पूरे देश भर में संकीर्णता की शक्ल में सामने आ रहा है। आज अगर छत्तीसगढ़ में लड़के-लड़कियों के बाग-बगीचे में मिलने पर भी रोक लग रही है, तो यहां के अफसरों के सामने मुंबई की एक मिसाल है। महिलाओं की लीडरशिप वाली इस पार्टी ने देश में महिला आरक्षण लाने के बजाय एक महिला को राष्ट्रपति बनाने को काफी मान लिया।
ओडिशा में एक महिला सिपाही पर भारी दरिंदगी के साथ कांगे्रसियों ने जो हमले किए, उन पर इस पार्टी को माफी मांगने में भी मीडिया में कई हजार तस्वीरों के आ जाने की जरूरत पड़ी, पुलिस कार्रवाई हो जाने की जरूरत पड़ी, तब जाकर इस पार्टी के अनगिनत प्रवक्ताओं में से किसी एक ने अभी घंटे भर पहले अफसोस जाहिर किया। यह पूरा सिलसिला सिर्फ एक बात सुझाता है कि इस पार्टी को गांधी और नेहरू की इज्जत बचाए रखने के लिए उनके नाम अब अपने से अलग कर देने चाहिए। एक नेहरू थे जिन्होंने आनंद भवन जैसी अपनी जायदाद देश के लिए दे दी थी, दूसरी तरफ आज इस पार्टी की लगभग तमाम लीडरशिप है जो कि देश को लूटकर अपना भवन और अपना आनंद बनाने पर भरोसा रखती है। जिस तरह कुछ साम्प्रदायिक ताकतें अपने मंच पर गांधी से लेकर भगत सिंह तक की तस्वीरें लगाकर एक किस्म की साख पाने की कोशिश करती हैं, कुछ उसी तरह की कोशिश कांगे्रस पार्टी आज भी अपने-आपको गांधी-नेहरू की पार्टी करार देकर करती है। गांधी और नेहरू भ्रष्टाचार के जुर्म में उन जेलों में कैद नहीं थे जहां पर आज इस पार्टी के बड़े-बड़े नेता या तो आ जा रहे हैं, या जाने की कगार पर हैं।
कांगे्रस की संस्कृति के इस पतन का एक दूसरा बड़ा नुकसान यह है कि देश की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते इसके हर कुकर्म देश की बाकी तमाम पार्टियों के सामने एक मिसाल की तरह सहूलियत खड़ी कर देते हैं। इसलिए कांगे्रस के गलत काम एक पार्टी के गलत कामों से कहीं अधिक बढ़कर, कहीं अधिक बड़ा खतरा इस देश की लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए बन रहे हैं। इस पार्टी को अपना घर तुरंत संभालने की जरूरत है और अपने चाल-चलन को ठीक रखने की जरूरत है। आज इस पार्टी के विचारकों में, नीति-निर्धारकों में प्रगतिशील विचारधारा, न्याय, समानता, ईमानदारी की सोचने वाले लोग लापता दिख रहे हैं। यह सिलसिला अगर सिर्फ कांगे्रस के लिए घातक होता, आत्मघाती होता, तो भी हमें कोई फिक्र नहीं होती। लेकिन यह सिलसिला देश के लोकतंत्र के लिए घातक साबित हो चुका है, क्या इसकी कोई फिक्र कल की गांधी-नेहरू की पार्टी आज करेगी?

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