संपादकीय
12 सितंबर 12
अमरीका में आज जब न्यूयार्क-हमले की बरसी मनाई जा रही है, तब दुनिया की सबसे कामयाब कंपनी एप्पल अपना नया फोन बाजार में उतार रही है। एक तरफ तकलीफ भरी यादों से अमरीका का एक सिरा भीगा हुआ होगा, तो दूसरे सिरे पर यह कंपनी खुशी मना रही होगी। ये दोनों ही बातें आज ही होने जा रही है। बाजार दरअसल इतना ही बेरहम होता है। आज ही एक दूसरी खबर कि एप्पल के मुकाबले टेलीफोन बेचने में दूसरी सबसे बड़ी कंपनी सैमसंग पर यह तोहमत लगी है कि वह चीन में महिला कर्मचारियों से पुरूष कर्मचारियों के मुकाबले भेदभाव कर रही है।
बाजार के सरोकार अगर देखें तो छत्तीसगढ़ के एक बड़े उद्योगपति नवीन जिंदल को लेकर अब उनकी ही अपनी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश के बड़े नेता उनके खिलाफ कड़े बयान दे रहे हैं, कुछ का मानना है कि इस पार्टी के नेता जिंदल के विमान में मुफ्त सफर करते हुए उसे टैक्सी जैसा इस्तेमाल करते हैं, और इसके एवज में जिंदल के गलत कामों को अनदेखा करते हैं। जिस गरीब छत्तीसगढ़ के गरीब रायगढ़ जिले से जिंदल हजारों करोड़ की कमाई कर रहा है, वहां पर उसने छोटा-मोटा खर्च स्कूल के नाम पर किया है, और उसे अपनी वेबसाइट पर गिनाया भी है। दूसरी तरफ इस अखबार के पाठकों को याद होगा कि किस तरह जिंदल ने अमरीका में अपनी पढ़ाई वाले विश्वविद्यालय में एक मैनेजमेंट स्कूल का नाम अपने नाम पर रखने के लिए करीब साढ़े बारह करोड़ का दान दिया, और फिर उस दान का जिक्र करते हुए विश्वविद्यालय ने वह नामकरण नवीन जिंदल के नाम पर किया। लेकिन नवीन जिंदल की तरफ से जारी इसकी खबर में दान का कोई जिक्र नहीं था। और न ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस या भाजपा के नेताओं ने कभी यह सवाल उठाया कि अमरीका से लेकर हरियाणा तक बहुत बड़े-बड़े दान और खर्च करने वाले जिंदल ने छत्तीसगढ़ से कितना कमाया और समाजसेवा या स्थानीय विकास पर कितना खर्च किया? इस बारे में हमने जिंदल कंपनी से जानकारी पाने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। दूसरी तरफ इस कंपनी की वेबसाइट पर स्कूल और पढ़ाई जैसे बहुत छोटे और मामूली खर्च का जिक्र रायगढ़ को लेकर है, जिसे देखकर कोई भी यह समझ सकता है कि इसका कमाई से कोई अनुपात नहीं बैठ सकता। और आज पूरे देश में कारखानेदारों के बीच देश की दौलत और जनता के हक की जैसी बंदरबांट सामने आ रही है, खदान बांटने से लेकर रायल्टी के रेट तक जो अंधाधुंध भ्रष्टाचार और लूट-डकैती सामने आ रही है उसे अगर देखें तो यही लगेगा कि बड़ी-बड़ी कंपनियां समाजसेवा और स्थानीय विकास के नाम पर जो दिखाती हैं, वह हाथी की तरह खाने के बाद वहां छोड़ी गई लीद जितना भी नहीं होता।
बाजार की बेरहमी को छुपाने के तरीके बेशर्मी के होते हैं। मुंबई में जब हाजी मस्तान तस्करी से और माफिया-अपराधों से अरबों कमाता था, तब वह समाजसेवा के लिए दो-चार एम्बुलेंस चलाता था। दुनिया के कारोबार सीएसआर, कार्पोरेट सोशल रिस्पॉंसबिलिटी के नाम पर अपनी कमाई की लीद ही गरीबों में बांटती हैं। और अपने कारोबार को वे देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान भी गिनाती हैं। जिस तरह से दुनिया और भारत में पूंजीवाद का बोलबाला हो रहा है, उसके चलते बड़े कारोबार पहले सबसे छोटों को, और फिर उनसे बड़ों को खरीदते या कुचलते चले जाएंगे। छोटों के सामने यह आजादी रहेगी कि वे बिकेंगे या बंधुआ मजदूर हो जाएं। हमारे पाठकों को यह भी याद होगा कि करीब एक बरस पहले हमने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भारती-वालमार्ट के खुले हुए थोक बाजार के बारे में सुबूतों सहित एक रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह थोक का लाइसेंस लाकर यह देशी-विदेशी गठजोड़ यहां पर चिल्हर बिक्री कर रहा है। उस पर न केन्द्र सरकार ने ध्यान दिया, न राज्य सरकार ने ध्यान दिया, और न ही सैकड़ों सांसदों को उस रिपोर्ट की ईमेल जगा पाई। लेकिन अभी कुछ हफ्ते पहले रायपुर के व्यापारियों ने जाकर इस चिल्हर बिक्री के खिलाफ सरकार से शिकायत की हैं कि किस तरह भारती-वालमार्ट उसे मिले लाइसेंस के खिलाफ काम करके छोटे बाजार को खत्म कर रहा है। कमोबेश ऐसा ही हाल देश और दुनिया की तमाम कंपनियों का है, जो अपने दांतों को छुपाने के लिए बाहर रहमदिली की मुस्कुराहट का एक मुखौटा लगा लेती हैं।
चूंकि जिंदल छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा कारखानेदार है, इसलिए उसे हम यहां मिसाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बात का एक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए कि किसी कंपनी को सरकार से क्या-क्या रियायतें मिली हैं, और उसका सामाजिक योगदान क्या है? इस बारे में आंकड़े मांगे जाने चाहिए और उन आंकड़ों की हकीकत की जांच होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ को चरकर, यहां लीद गिराकर अमरीका में मैनेजमेंट स्कूल को दान देकर अपने नाम पर करवाना, आखिर यह प्रदेश कब तक झेले, और इस प्रदेश के नेताओं को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि अगर जनता उनसे कड़े और कड़वे सवाल करने लगेगी, तो वे जवाब देने रायगढ़ से रायपुर जिंदल के विमान से आएंगे, या फिर सड़क के रास्ते?
यह बात शुरू हुई थी अमरीका के राष्ट्रीय शोक के दिन वहां की सबसे चर्चित और कामयाब कंपनी के बाजारू जश्न से, और लुटे हुए भारत में बैठे हुए हम इसे चाहे-अनचाहे भारत के कारोबारियों तक ले आए।

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