लोकतंत्र में सूचना का अधिकार नहीं, सूचना की जिम्मेदारी होनी चाहिए...


संपादकीय
25 सितंबर
प्रधानमंत्री के सलाहकार सैम पित्रोदा आज दोपहर बाद ट्विटर पर एक प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे हैं जिसमें कोई भी उनसे सवाल-जवाब कर सकेंगे। वे भारतीय प्रधानमंत्री के जनसूचना ढांचे और नई मौलिक सोच जैसे मामलों में सलाहकार हैं, और लोग उनके नाम से जानकार भी हैं कि वे राजीव गांधी के समय से दूरसंचार सलाहकार भी रहे और केन्द्र सरकार के कई तरह के मिशनों पर भी उन्होंने काम किया। आज की उनकी प्रेस कांफ्रेंस सूचना के लोकतंत्रीकरण पर है और उन्होंने लोगों से इस पर सवाल बुलवाए भी हैं। मोटे तौर पर यह मामला देश में बहुत चर्चित एक कानून, सूचना के अधिकार (आरटीआई) से जुड़ा हुआ है। 
आज भारत में देश-प्रदेश में जितने किस्म के भांडाफोड़ हो रहे हैं उनमें से अनगिनत के पीछे सूचना के अधिकार के तहत मिली हुई जानकारी है। आरटीआई देश के सामाजिक आंदोलनों के भीतर एक बहुत आक्रामक अंदाज वाला आंदोलन बन गया है, मीडिया के भीतर आरटीआई का इस्तेमाल एक सबसे बड़ा औजार बन गया है, और सरकार या दूसरे किसी भी संवैधानिक ढांचे, जनता के पैसों पर होने वाले किसी भी काम को लेकर आरटीआई ने घपलों का तौलिया खींच देने जैसा काम किया है। कई प्रदेशों में आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या भी हुई, और बहुत अधिक जगहों पर उन पर हमले भी हुए। यह कानून इसी यूपीए सरकार के पिछले कार्यकाल में बना और इस सरकार की करतूतों और कारनामों को उजागर करने में इसी से सबसे अधिक मदद मिली। जानकार लोगों का यह भी कहना है कि सोनिया गांधी के जिन गैरसरकारी सलाहकारों ने इस कानून की सोच को सामने रखा, आगे बढ़ाया, और ढांचा भी बनाकर दे दिया, उनके खड़े किए हुए इस खतरे की समझ सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं थी, इसलिए वे इसके खिलाफ समय रहते कोई अड़ंगा नहीं लगा पाए, और आज कदम-कदम पर वे लोग फंस रहे हैं। 
खैर, हम आज इस पर यह चर्चा करना चाहते हैं कि सूचना पाने के इस अधिकार को बदलकर सूचना देने की जिम्मेदारी बनाना चाहिए। आज एक जानकारी पाने के लिए लोगों को महीनों तक सरकारी दफ्तरों में धक्के खाने पड़ते हैं। इतनी मेहनत वे ही लोग कर पाते हैं जो खरे आंदोलनकारी होते हैं, पेशे से अखबारनवीस होते हैं, या मेहनतकश-ब्लैकमेलर होते हैं। इनसे परे अगर कोई आम इंसान सूचना पाने की कोशिश करे तो इतने महीनों के धक्के झेलना मुश्किल होता है। और सत्ता चाहे वह सरकार की हो, संसद की हो, या सुप्रीम कोर्ट की हो, उसके मिजाज में आज भी वह पुराना सामंती अंदाज हावी है जो कि किसी भी सूचना को देने से उसे रोकता है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जब जजों के बारे में वह सूचना देने से मना कर देते हैं जो कि छोटे से छोटे सरकारी कर्मचारी को भी देने की मजबूरी है, तो वे इस अधिकार के खिलाफ काम करते हैं। और मजे की बात यह कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इस प्रशासनिक फैसले के खिलाफ आदेश दिया कि जजों के बारे में आरटीआई के तहत जानकारी नहीं दी जाएगी। जिस अदालत का आदेश इस देश में संसद द्वारा पलट देने के पहले तक कानून का दर्जा रखता है, उसका प्रशासनिक फैसला सूचना के अधिकार पर इस कदर बेइंसाफी का था। 
सरकार राजधानियों और जिला मुख्यालयों में हर फाईल, हर कागज को सीधे इंटरनेट पर डाल देने का काम बिना अधिक लागत बहुत आसानी से कर सकती है। जिससे लोग घर बैठे आधी रात को भी किसी भी फाईल को पढ़ सकेंगे और उसमें गड़बड़ी का खतरा घटते चले जाएगा। आज के कम्प्यूटर और संचार तकनीक के जमाने में यह काम आरटीआई इस्तेमाल करने वाले लोगों के धक्के खाने और कागज बर्बाद करने के मुकाबले सस्ता पड़ेगा। सरकार चाहे तो इसकी लागत निकालने के लिए इस पर उसी तरह की मामूली फीस लगा सकती है, जैसी फीस आज भी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वालों को देनी पड़ती है। इसकी शुरुआत सारे गैरगोपनीय कागजों को लेकर सैम पित्रोदा प्रधानमंत्री के कार्यालय से ही शुरू कर सकते हैं और फिर धीरे-धीरे यह पूरे देश तक फैलने वाली जिम्मेदारी बन सकती है। हमारा तो यह भी सोचना था कि सूचना के अधिकार को लेकर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक जितने मामले जाते रहते हैं, उन पर से किसी पर फैसला देते हुए अदालतें ही शायद खुद होकर इस अधिकार को जिम्मेदारी करार देंगी। लेकिन अदालतों के रूख से भी जाहिर है कि वे खुद बहुत सी बातों को छुपाकर रखना चाहती हैं इसलिए उनसे भी ऐसी उम्मीद शायद कभी पूरी नहीं हो पाएगी।
इसलिए हमारा यह मानना है कि इस देश में पद की गोपनीयता की जो शपथ दिलाई जाती है, उसे बदलकर पद की पारदर्शिता की शपथ बना देना चाहिए। जो गोपनीय बातें हैं वे आज भी सूचना के अधिकार में अलग से दर्ज की गई हैं, और सरकार या दूसरी एजेंसियों को, संवैधानिक संस्थाओं को उनको छुपाए रखने की छूट है। लेकिन इससे परे की जो बातें हैं, उनको लेकर गोपनीयता की शपथ शब्द ही सूचना के अधिकार की लोकतांत्रिक-पारदर्शिता की भावना के खिलाफ है। इसलिए आज जब प्रधानमंत्री के सलाहकार इस मुद्दे पर दुनिया से खुली बातचीत करने जा रहे हैं, तो हमारी सलाह यह है कि अब भारतीय लोकतंत्र को सूचना के अधिकार के तहत हासिल हो सकने वाली हर जानकारी को खुद होकर सामने रख देने की जिम्मेदारी का कानून बना देना चाहिए।

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