17 सितंबर 2012
निर्वाचित सत्ता पर बैठे हुए लोग जब अपने मन, वचन या कर्म से लोगों को आहत करते हैं, तो हैरानी होती है। ऐसा करने वाले लोग कम नहीं होते, और किसी एक छापे वाले नहीं होते। अलग-अलग कई किस्म की पार्टियों के लोग, कई उम्र के लोग, कई जाति और धर्म वाले लोग ऐसा करते मिलते हैं और तब यह हैरानी होती है कि क्या इन्हें अपने खुद के अगले चुनाव की फिक्र नहीं है? और या फिर इन्हें जनता की याददाश्त पर सुशील कुमार शिंदे जितना ही भरोसा है?
एक बहुत ही लड़ाकू, और कमजोर लोगों की हिमायती ममता बैनर्जी को दशकों के कड़े संघर्ष के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता मिली, तो उन्हें बलात्कार की शिकार, शिकायत करती महिलाएं वामपंथी साजिश की भागीदारी लगने लगीं। दिल्ली में कांगे्रस की बुजुर्ग और आमतौर पर संवेदनशील रहने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दूसरे प्रदेशों से वहां आकर रहने वालों के बारे में कई बार निहायत गैरजरूरी और कड़वी बात कही जो कि दिल्ली को ढोने वाले मजदूरों और कामगारों पर हमले सरीखी भी थी। अभी सुशील कुमार शिंदे ने चाहे मजाक में ही सही, लेकिन जिस तरीके से जनता की याददाश्त पर मजाक किया है, वह भी राजनीतिक कमसमझी का सुबूत माना जाएगा, या फिर एक लापरवाह चूक। आज कांगे्रस और यूपीए के कोई मंत्री जनता के साथ मजाक का हक नहीं रखते, जिस तरह पूरी दुनिया में बलात्कार को लेकर बनने वाले लतीफे बहुत कू्रर और हिंसक माने जाते हैं, उसी तरह आज भारत की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां, केंद्र और राज्यों में अपने भ्रष्टाचार के बाद इस मजाक का हक खो बैठी हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह की अल्पसंख्यकों को लेकर किसी मजाक का हक इस जिंदगी में मोदी को नहीं मिल सकता, सरकारी फिजूलखर्ची को लेकर मजाक करने का हक मायावती को नहीं मिल सकता, कुनबापरस्ती को लेकर मजाक का हक सोनिया-राहुल को नहीं मिल सकता, टेलीफोन को लेकर मजाक का हक राजा को नहीं मिल सकता, खेलों को लेकर मजाक का हक कलमाडिय़ों को नहीं मिल सकता, सरकारी खदानों को लेकर मजाक का हक जिंदलों को नहीं मिल सकता, बच्चों के साथ प्यार करने के मजाक का हक निठारी कांड के बलात्कारियों को नहीं मिल सकता, और हिंदुस्तान को लेकर किसी तरह के मजाक का हक कसाब को नहीं मिल सकता।
देश भ्रष्टाचार की आग में झुलसा हुआ उसी तरह पड़ा हुआ है जिस तरह कि सिवकासी में पटाखा कारखानों की आग में झुलसे हुए लोग बिना दवाईयों के सरकारी अस्पताल में पड़े रहते हैं। ऐसे में किसी ओछी बात, हल्की बात या मजाक की जगह बस टीवी के लॉफ्टर कार्यक्रमों तक ठीक है, जनता के साथ ऐसे मजाक या ऐसी बातें जले पर नमक छिड़कने की तरह हैं। सुशील कुमार शिंदे एक विनम्र नेता हैं, इसलिए शिवसेना से लेकर शरद यादव तक ने उन्हें नरमी के साथ यह याद दिला दिया कि वे कुछ कम बोलें। आज जनता का बर्दाश्त खत्म हो गया है। जो लोग चीजों को बहुत गंभीरता से लेते हैं, सोचते हैं और चर्चा करते हैं, उनके बीच कहीं-कहीं यह बात भी सामने आ रही है कि क्या भारत में आज एक गृहयुद्ध जैसी नौबत नहीं आ सकती? नेताओं को और सत्ता चलाने वाले लोगों को हमारी सलाह यही है कि यह वक्त गैरजरूरी बयान देने का, लोगों को और अधिक बेइज्जत करने का, और मजाक करने का नहीं रह गया है। राजा और प्रजा के बीच मजाक का कोई रिश्ता नहीं हो सकता। और आज हिंदुस्तान की सत्ता जिस अंदाज में जनता के हक जिस हद तक लूट रही है, उसके बाद यह सत्ता जनता के द्वारा, जनता के लिए चुनी गई सत्ता नहीं है, यह कालेधन से खरीदी गई, कालेधन को कमाने के लिए बनी सत्ता है और इसका जनता के साथ मजाक का कोई हक नहीं है।
मीडिया को देखते ही मुंह खुल जाना किसी कानून के तहत अनिवार्य नहीं है। इसलिए जब तक किसी मुद्दे पर किसी हक के साथ बोलने का हक न लगे, तब तक लोग चुप क्यों नहीं रहते? एक पुरानी कहावत चली आ रही है कि समझदार इसलिए बोलते हैं कि उनके पास बोलने को कुछ है, और नासमझ इसलिए बोलते हैं कि वे कुछ बोलना चाहते हैं।

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