10 सितंबर 2012
कल उत्तरप्रदेश के एक कार्टूनिस्ट को राजचिन्हों के अपमान और शायद संसद के अपमान के मामले में भी, गिरफ्तार किया गया है। यह कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के हिस्सेदार के रूप में काम कर रहा था, और जाहिर है कि भारत के भ्रष्टाचार के खिलाफ उसके काम में खासी तल्खी थी। उसने देश की हालत को लेकर राजचिन्हों का मजाक भी अपने कार्टून में बनाया था और संसद को लेकर भी उसका कार्टून किसी एक नजरिए से देखने पर संसद का अपमान लग सकता था। इसलिए इस गिरफ्तारी को हो सकता है कि तकनीकी रूप से गलत करार देना तुरंत आसान नहीं होगा, लेकिन लोकतंत्र क्या तकनीकी आड़ को ढाल बनाकर गलत कामों को बचाने की व्यवस्था है?
अधिक दिन नहीं हुए जब बंगाल में केंद्र की यूपीए सरकार की एक बड़ी भागीदार तृणमूल कांगे्रस की ममता बैनर्जी ने बहुत बुरे तानाशाह अंदाज में कार्टून के खिलाफ गिरफ्तारी करवाई, तकलीफजदा गरीब के सवाल पर उसकी गिरफ्तारी करवाई, एक गंभीर किताब पर रोक लगाई, और बलात्कार की शिकार महिला की शिकायत को पल भर में ही अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दे दिया। इस पूरे रूख पर कांगे्रस पार्टी या यूपीए सरकार मोटे तौर पर चुप ही बने रहे। और जब देश के लिए जिम्मेदार पार्टी और सरकार का यह हाल होता है, तो वह प्रदेशों के लिए या बाकी दूसरी पार्टियों के लिए एक राह दिखाने सरीखा भी होता है।
पिछले कुछ महीनों में भारत ने स्कूलों की किताबों से कार्टून हटते देखे हैं क्योंकि आधी सदी पहले आंबेडकर जिस बात का हंसते-हंसते मजा लेते थे, वह बात अब उनके नामलेवा लोगों को बर्दाश्त नहीं है। लेकिन ऐसा सिर्फ दलितों के साथ नहीं है, सैकड़ों बरस पुराना जो इतिहास लिखा हुआ है, वह भी धीरे-धीरे करके अलग-अलग तबकों को अब नामंजूर हो चला है, और इतिहास और बीता हुआ कल मानो पेंसिल से लिखे हुए कोई शब्द हैं, जिनको कि आज मिटाने वाले एक रबर से मिटा दिया जा रहा है। ऐसे में यह हैरानी की बात नहीं है कि एक कार्टूनिस्ट को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया है क्योंकि उसने भारत के राजचिन्हों का मजाक बनाते हुए कार्टून बनाए और संसद या सरकार के कामकाज की आलोचना की।
अंगे्रजों के वक्त के बनाए हुए दर्जनों कानून कूड़ेदान के ही हकदार हैं। उन्होंने तो समलैंगिकता के खिलाफ सजा का कानून रखा था क्योंकि उनके ईसाई धर्म में ऐसे किसी सेक्स को गलत माना जाता है जिससे कि नया जीवन पैदा न हो सके। उन अंगे्रज देशों में तो समलैंगिकता कब की कानूनी हो गई, हिंदुस्तान में अभी पिछले बरस सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में एक फैसला सुनाना पड़ा। अंगे्रज आत्महत्या की कोशिश को एक जुर्म बनाकर गए थे, और आज भी कदम-कदम पर पुलिस थाने किसी भी अनशनकारी को आत्महत्या की कोशिश के जुर्म में जेल भेजते हैं। पिछले दिनों अरविंद केजरीवाल ने उनके अनशन के बीच उनकी गिरफ्तारी के आसार सामने आने पर केंद्र सरकार को याद दिलाया था कि 19वीं सदी का अंगे्रज कानून कभी गांधी के अनशन पर उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया गया था। लेकिन आज हर गली-मुहल्ले में इस कानून को कोई थानेदार भी किसी भी आंदोलनकारी का उपवास तुड़वाने के लिए इस्तेमाल करता है।
ऐसी ही बात राजचिन्हों को लेकर है। भारत को आज यह समझने की जरूरत है कि वह राजतंत्र नहीं रह गया है, वह एक लोकतंत्र हो गया है और ऐसे में राजचिन्हों के ढकोसले खत्म किए जाने चाहिए। अगर इस देश में संसद से लेकर सरकार तक के बारे में जनता के एक खासे बड़े तबके के मन में यह बात है कि वे अपना काम जिम्मेदारी से नहीं कर रहीं, तो यह बात अलग-अलग कई शक्लों में सामने आएगी। कुछ लोग जो अधिक तल्खी से महसूस करते हैं, और अधिक तल्खी के साथ अपनी बात को सामने रखना चाहते हैं, वे राजचिन्हों के सिंह को भेडि़ए की तरह भी बना सकते हैं, और यह बात भी कार्टून में बता सकते हैं कि सत्ता के लोग भारत मां को पकड़कर उसके साथ बलात्कार की कोशिश कर रहे हैं।
गुजरात में मोदी ने जो किया, कर्नाटक में सत्ता पर काबिज भाजपाई मंत्री रेड्डी बंधुओं ने जो किया, झारखंड में मधु कोडा ने जो किया, दिल्ली में राजा से लेकर कलमाड़ी तक ने जो किया, और अब कोयले के मामले में देश के उद्योगपतियों ने, मंत्रियों ने, अफसरों ने, प्रधानमंत्री ने जो किया वह देश के साथ बलात्कार नहीं है तो और क्या है? और इस कार्टूनिस्ट ने आज अगर इस बलात्कार को दिखाने के लिए भारत मां को दिखाया है, तो देश के करोड़ों लोग आज ऐसा ही समझते और मानते हैं। भारत मां कोई एक ऐसी महिला नहीं है, जिसकी तस्वीर छपने पर उसकी निजी जिंदगी के लिए दिक्कतें खड़ी हों। भारत मां इस देश में मातृभूमि के एक प्रतीक के रूप में है, और इस मातृभूमि के साथ देश के लुटेरे बलात्कार से कम कुछ नहीं कर रहे जब वे दसियों लाख बच्चों के हर बरस कुपोषण से मरने के आंकड़े भी दर्ज करते हैं। भूखों मरते देश में लाखों करोड़ के घपले मातृभूमि के साथ बलात्कार के अलावा और क्या है?
राजचिन्हों की पवित्रता के जिन्हें ख्याल है, क्या वे देश के आज के माहौल की हकीकत को देख रहे हैं, जिसमें राजचिन्ह के सिंहों की खुराक की बोटियां सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग खा रहे हैं, और सिंह टुकुर-टुकुर देख रहे हैं? अब अगर इस राजचिन्ह को एक कार्टूनिस्ट ने अपने हिसाब से बदलकर उसे ही लुटेरी सत्ता के प्रतीक के रूप में भेडिय़ा बना दिया है, तो यह अभिव्यक्ति की एक बहुत साधारण सी स्वतंत्रता है, और इसके लिए एक मुर्दा अंगे्रज कानून की आड़ लेना शर्मनाक है।
असीम त्रिवेदी का एक कार्टून यह भी है जिसमें उन्होंने संसद को पखाने की कमोड सरीखा बनाया है। हो सकता है कि संसद इसे अपना अपमान माने और नोटिस दे। उस पर भी अभी चर्चा इसलिए की जा सकती है कि शायद पुलिस इस कार्टून को भी देश के अपमान की तरह दर्ज करे, या इस कार्टूनिस्ट को समझने के लिए इस कार्टून को भी चर्चा के लायक माना जाए। अब अगर देश के एक तबके की भावना अगर संसद के बारे में देखी जाए तो वहां सवाल पूछने के लिए बिकते हुए सांसद इतिहास में दर्ज हो चुके हैं, वोट देने के लिए नोट पाने वाले दर्ज हो चुके हैं, वहां कार्रवाई को टालने की साजिशें दर्ज हो चुकी हैं, और इसी संसद के भीतर यह अच्छी तरह दर्ज हो चुका है कि किस तरह ईमानदारी से चुनाव लड़कर यहां तक पहुंच पाना खासा मुश्किल है। कांगे्रस के ही एक बड़े सांसद ने कुछ समय पहले संसद पहुंचने के भ्रष्टाचार के बारे में टीवी कैमरे के सामने ही लंबा बयान दिया था।
ऐसे में जब संसद का यह पूरा सत्र एक निहायत नाजायज मांग को लेकर बिना कामकाज के खत्म कर दिया गया, तो इस पूरे दौर में वेतन, भत्ते और रियायती खाना पाने वाले सांसदों ने बिना विधेयक पास किए, बिना सौ करोड़ से अधिक की आबादी को उसके अटके हुए हक दिए जो किया वह क्या था? संसद में रियायती खाना खाना, और संसद से मिली कमोड पर बैठकर हग देना। अब इस बात को एक कार्टूनिस्ट ने अगर संसद की शक्ल का कार्टून बनाकर अपनी तल्खी के साथ सामने रखा है, तो उसने क्या गलत किया है?
संसद में काम न चलने देना जिन्होंने तय किया था, वे अगर यह तय करते कि कुपोषण से मरते हुए बच्चों के हक से उनको मिल रहे रियायती खाने से भी वे बहिष्कार के इन दिनों में परहेज करेंगे, उपवास करेंगे, तो भी एक बात समझ आती। काम नहीं करेंगे, गरीबों के हक वाले विधेयक पास नहीं होने देंगे, लेकिन कुपोषण के शिकार बच्चों के निवालों को छीनकर संसद की कैंटीन में दिए जाने वाले घोर रियायती खाने से जिनको परहेज न हो, उनको ऐसे कार्टून से क्यों परहेज होना चाहिए? जिस संसद का काम चर्चा करना, कानून बनाना है, वह अगर सिर्फ वेतन-भत्ते, सहूलियत और रियायती खाने को ही इजाजत देती है, और गरीब के हक पर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है, तो वह संसद खाने और निकाल देने वाली एक मशीन की तरह ही तो रह गई है। इसलिए कार्टून की तल्खी को मैं जायज मानता हूं।
इसी अखबार में रोजाना ही हम कई किस्म के कार्टून बनाते हैं, और वे किसी भी तरह से कम वजन के, या हल्के कार्टून नहीं होते। हम इसको अपना हक मानते हैं, और हमारा यह मानना है कि भारतीय लोकतंत्र में इसके लिए पूरी गुंजाइश रखी गई है। अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ इसी तरह का माहौल बनाया गया, और एक-एक थाने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तौलने के तराजू लगाए गए तो यह लोकतंत्र चोरी के कोयले को तौलने के लिए इस्तेमाल होने वाले लोहे के बाट से अधिक कुछ नहीं रह जाएगा। कार्टून हों या कि तीखी जुबान में लिखे गए विचार, इन सबकी एक जरूरत होती है लोकतंत्र को। अंगे्रजों के बनाए गए कानून के तहत तो इस देश में करोड़ों ऐसे जोड़ों को गिरफ्तार किया जा सकता है जो कि किसी एक किस्म से वर्जित सेक्स में दिलचस्पी रखते हों। आजादी के साठ बरस बाद भी यह देश अपने लोगों पर जुल्म करने के लिए दो सौ बरस पुराने कानून को थाने की मेज पर तैयार रखता है। यह नौबत किसी भी लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।


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