मॉल की रौशनी में भी अंधेरा


संपादकीय
26 सितंबर
अभी तीन मिनट पहले हरियाणा से एक खबर आई है कि जिंद इलाके के एक गांव में एक दलित महिला से तीन लोगों ने बलात्कार किया है। अभी रोजाना यह खबर आ ही रही है कि किस तरह एक दलित लड़की के साथ कुछ लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार करने के बाद उस लड़की के पिता ने आत्महत्या कर ली। उसके बाद बड़ी मुश्किल से पुलिस इस मामले में कुछ लोगों की गिरफ्तारी के लिए तैयार हुई है। 
जिस भारत में आज लोगों को जाति के आधार पर आरक्षण गैरजरूरी लगता है, उनको तकरीबन हर दिन के अखबारों में कहीं न कहीं, किसी न किसी दलित से, आदिवासी से गैरदलित-आदिवासी द्वारा बलात्कार की खबरें भी पढऩे जरूर मिलती होंगी। कहीं किसी सार्वजनिक कुएं से पानी लेने पर दलित के हाथ काट दिए जा रहे हैं तो कहीं इसी तरह की कोई दूसरी ज्यादती हो रही है। कुल मिलाकर भारत के हिन्दू समाज के भीतर का हाल यह है कि सवर्ण तबका न तो दलित आदिवासी को उसका हक देने तैयार है और न ही उसे किसी दूसरे धर्म में वह जाने देना चाहता है। छत्तीसगढ़ से लगे हुए मध्यप्रदेश में ऊंची कही जाने वाली जातियों का दबदबा इतना है कि दबंग सवर्ण रोज ही किसी दलित से ज्यादती करते हैं, और वहां का सामाजिक वातावरण सुधर नहीं पा रहा है। इसकी कुछ वजहों में से एक यह भी है कि सत्ता पर सवर्ण हावी हैं, और दूसरी बात यह कि जो दलित-आदिवासी सत्ता पर पहुंचते हैं, वे अपने तबके के हितों को अपने खुद के आगे बढऩे के लिए इस्तेमाल करते हैं, और तबका धरे रह जाता है। 
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की बेइंसाफी को हजारों बरसों से चल ही रही है, सभी तरह के कमजोर तबकों के खिलाफ भारत के ताकतवर तबकों के मन में न सिर्फ भारी हिकारत है, बल्कि उन पर जुल्म रात-दिन जारी रहते हैं। दलित-आदिवासी, अल्पसंख्यक, बुजुर्ग, गरीब, महिलाएं, बच्चे, विकलांग, सभी तरह के कमजोर, या कमजोर रखे गए लोगों पर तरह-तरह की ज्यादती चलती रहती है। इन दिनों भारत के बहुत बड़े हिस्से में गणेशोत्सव चल रहा है। गणेश की आरती को अगर ध्यान से सुनें, तो उसके शब्द हैं- ...बांझन को पुत्र दे...। अब इसके शब्दों पर ध्यान दें तो महिला को संतान न होने पर इस तरह से बांझ करार दे दिया जाता है मानो बच्चे पैदा करने के लिए वह अकेली जिम्मेदार है, और ऐसे मामलों में पुरूष में कोई कमी मानो हो ही नहीं सकती। और फिर गणेशजी की आशीर्वाद से अगर संतान हो भी जाए, तो उसका पुत्र होना ही आरती में माना गया है। 
जिन कमजोर तबकों का हमने ऊपर जिक्र किया है, उनको भारत का असभ्य समाज अपनी हिंसा के साथ कमजोर रखते चलता है, तुलसीदास से लेकर, उनके भी पहले के वेदों तक की बात दलितों को याद रहती है कि शूद्र के कानों में वेद के शब्द भी अगर पड़ जाएं तो उनमें पिघला हुआ सीसा भर देना चाहिए। यह दौर आज तक चल रहा है, और हमने इस आरती का जिक्र इसलिए किया है कि धर्म कदम-कदम पर कमजोर तबकों पर हिंसा सुझाते चलता है। उसका सारा साथ ताकतवर तबकों के लिए होता है, वह राजा भी रह सकता है, सेठ हो सकता है, और मर्द तो होता ही है। एक गैरबराबरी वाले समाज में जिस तरह दलित लड़कियों और महिलाओं के साथ रोजाना सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं, उसी तरह के हादसे बाकी कमजोर तबकों के साथ भी जगह-जगह होते हैं। कुछ दिन पहले ही नागपुर में पुलिस ने एक आईआरएस अफसर को गिरफ्तार किया जिसने अपनी आईआरएस अफसर बीबी की अश्लील फिल्म बनाकर, उसे ब्लैकमेल करके दहेज वसूलने की कोशिश की थी। अब अगर केन्द्र सरकार की एक बड़ी अफसर के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर देश की बाकी महिलाओं के साथ क्या नहीं हो सकता, क्या नहीं होता होगा, क्या नहीं हो रहा है। 
कोई देश सड़कों और पुलों से, जगमगाती रौशनी और लदे हुए बाजारों से बड़ा और महान देश नहीं बनता। जब तक किसी प्रदेश में बराबरी की बात नहीं होती, बेइंसाफी खत्म नहीं होती, तब तक हरियाणा के सारे मॉल मिलकर भी उस प्रदेश को सम्मान नहीं दिला सकते। 

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