9 सितंबर 2012
संपादकीय
अभी दो-चार दिन पहले ही देश के सबसे अच्छे समझे जाने वाले कारोबारियों में से एक नारायण मूर्ति ने कहा था-एक सभ्य समाज वही है जो किसी के महत्वपूर्ण योगदान का आभार व्यक्त करे, अगर हमारा देश डॉ. कुरियन को भारत रत्न से सम्मानित नहीं करता तो मुझे नहीं समझ आता कि और कौन इस सम्मान के योग्य है?
गुजरात में आनंद के संस्थापक और इस देश में दुग्ध-क्रांति लाने वाले डॉ. वर्गीज कुरियन को तो कुदरत के तरीकों के हिसाब से अब गुजरना ही था, नब्बे बरस की उम्र कम नहीं थी, और खासकर तब जब एक जिंदगी में उन्होंने हजारों-लाखों लोगों जितना काम कर लिया था। और यह गुजरना ऐसा रहा कि कोई यह नहीं कह सकता कि वे अपने पीछे एक शून्य छोड़ गए हैं। वे अपने पीछे इस देश की सबसे बड़ी सहकारिता क्रांति छोड़ गए हैं, और गौसेवा की सबसे बड़ी मिसाल भी छोड़ गए हैं। वे दुनिया की सबसे बड़ी डेयरी भी छोड़ गए हैं, और वे एक सहकारिता आंदोलन की इतनी बड़ी कारोबारी-कामयाबी, अंतरिक्ष छूती कामयाबी भी छोड़ गए हैं। आनंद ने गाय पालने, दूध इक_ा करने, उसे ग्राहकों तक पहुंचाने, अमूल नाम का एक अद्भुत कामयाब ब्रांड खड़ा करने, और इन सबको इस भ्रष्ट देश में, भ्रष्ट व्यवस्था के बीच बचाकर रखने और इसके हर पहलू को किसी भी चतुर व्यापारी के मुकाबले अधिक कामयाबी से बढ़ाने का जो काम, एक गैरव्यापारी डॉ. कुरियन ने किया, वह पूरी दुनिया के सामने एक अभूतपूर्व मिसाल है। सच तो यह है कि देश में गौसेवा के लिए, कुपोषण दूर करने के लिए, रोजगार देने के लिए, कई बातों के लिए उन्हें अलग-अलग भारतरत्न दिया जाना चाहिए था, लेकिन शायद वोटरों के किसी एक बड़े तबके के खुश होने के आसार न होने से भारत सरकार ने अब तक ऐसा नहीं सोचा। लेकिन हमारा मानना है कि जो जाने वाला इतना विशाल इतिहास गढ़कर जाता है, जो रिटायर होने के बाद भी इतना बड़ा वर्तमान पूरी कामयाबी से चलते देख रहा था, और जिसकी मेहनत और कल्पना की कामयाबी भारत की आने वाली शायद सदियां भी देख पाएंगी, उसके सम्मान से भारतरत्न का भी सम्मान बढ़ा होता।
आज अगर गुजरात के एक कोने से चलकर अमूल का सामान देश के दूसरे कोने तक पहुंचता है, और स्थानीय दूध, दही, मक्खन और आईसक्रीम, चॉकलेट से मुकाबला करता है, तो कारोबार का यह मॉडल एक डेयरी से कहीं अधिक बड़ा है और आज देश में दसियों लाख लोग डॉ. कुरियन के काम को करते हुए, आगे बढ़ाते हुए अमूल के सहारे खड़े हैं। जिस बाजार में विदेशी कंपनियां चॉकलेट बेचने के लिए अमिताभ बच्चन जैसे बड़े सितारे के कंधों पर चढ़कर ग्राहकों तक पहुंचती हैं, वहीं अमूल के कार्टूननुमा, मजाकिया इश्तहारों की एक बच्ची दशकों से देश को लुभाते आ रही है, रिझाते आ रही है, और अनगिनत अमिताभों का मुंह भी चिढ़ाते आ रही है। हम अमूल के इस कारोबारी पहलू की भी यहां चर्चा करना चाहते हैं जिसने कि विज्ञापनों में कल्पनाशीलता का पूरी दुनिया की सबसे बड़ी मिसाल भी पेश की है। दुनिया में कहीं भी, कुछ भी महत्वपूर्ण होता है तो उस पर सबसे पहला मजाकिया इश्तहार अमूल का ही बनता है।
सारे के सारे जायज, इतने विशेषणों के बाद अब जो बात आज सोचने की है, वह यह कि इस देश में कामयाबी के इस मॉडल की नकल भी कोई दूसरा प्रदेश क्यों नहीं कर पा रहा? आज पानी और जमीन वाले कितने ही प्रदेश हैं जहां चारा हो सकता है और जहां मेहनत करने वाले लोग हैं। देश के सारे राज्यों को देखें तो अलग-अलग किस्म की विचारधाराओं वाली अनगिनत सरकारें आईं और चली गईं। अलग-अलग किस्म के अनगिनत मुख्यमंत्री या अफसर आए और चले गए। कहीं भी ऐसा कोई दूसरा मॉडल आनंद के अनुभव का फायदा लेकर भी खड़ा क्यों नहीं हो पाया? आनंद की सफलता पर दुनिया में पता नहीं कितने विशेषज्ञों ने कितने किस्म के अध्ययन किए होंगे, लेकिन इस खुली हुई किताब को दूसरे राज्य अपनी जमीन पर नकल करके अपने लोगों के दिन क्यों नहीं बदल पाए? हमको एक बात लगती है कि आनंद की कामयाबी पर तो शायद सैकड़ों पीएचडी हो चुकी होंगी, अब कुछ पीएचडी इस पर भी हो जानी चाहिए कि आनंद के पदचिन्हों पर चलकर कोई दूसरा कामयाबी के अंतरिक्ष तक क्यों नहीं पहुंच पाया? भारतरत्न तो उनके लिए गैरजरूरी है, लेकिन देश के लिए जरूरी यह है कि वह इस बात पर आत्मचिंतन करे कि कुरियन के पदचिन्हों पर बाकी लोगों का भला बाकी प्रदेश, बाकी नेता, बाकी अफसर क्यों नहीं कर पा रहे? उन्हें श्रद्धांजलि देने के बजाय आज इस बात पर प्रायश्चित करना अधिक जरूरी है।

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