संपादकीय
23 सितंबर
असम में बाढ़ से बेघर होने वाले लोग सात लाख तक पहुंच गए हैं। और देश के बाकी हिस्से के लोग गैस सिलेंडरों को जिंदगी का अंत मानकर सड़कों पर हैं। किसी तरह की बात असम की इस हालत पर खबरों से परे सुनाई नहीं पड़ती। और पिछले कई हफ्तों से जिस असम में विदेशी नागरिकों पर देशभर में उबाल आया हुआ था, उस असम को आज डूबा हुआ देखकर भी किसी का मुंह नहीं खुल रहा है। यह तो बात हुई देश के सरहदी सूबों के लिए देश के बाकी बीच के हिस्से के मन की बेरूखी की। लेकिन इसके अलावा एक दूसरी बात यह भी सोचने की है कि क्या संपन्नता से लबालब इस देश के एक तबके के भीतर अपने ही देश के इतने मुसीबतजदा लोगों के लिए रहम का एक कतरा भी खड़ा नहीं होता? कुदरत की मार आज असम पर है कल हो सकता है देश के किसी भी दूसरी हिस्से में वह औरों पर भी हो जाए उस दिन यह संपन्न तबका क्या करेगा? आज अपने सिर पर मुसीबत नहीं है, इसलिए दूसरों के जख्मों पर अपने घर बेकार पड़ा मरहम भी लगाने का सिलसिला यहां दिखाई नहीं पड़ता।
अंग्रेजों के समय से भारत में ईसाई चर्च के लोग जब आए, तो वे पश्चिम के देशों से बहुत सा दान भी लेकर आए और भारत में उन्होंने इलाज और पढ़ाई पर खर्च किया, और यह भी एक बड़ी वजह रही कि इससे पूरी तरह अछूते चले आ रहे भारत के गरीबों में से कुछ लोग, हिन्दू धर्म की प्रताडऩा से बाहर निकलकर ईसाई बने। चर्च में दान देने का एक लंबा रिवाज है, और उस दान का धर्म से परे बहुत जरूरतमंद लोगों पर खर्च करने का भी लंबा सिलसिला दुनियाभर में दर्ज है। धर्म और चर्च की बाकी बहुत सी खामियां हो सकती हैं, हैं, लेकिन उससे परे अगर दान की बात करें तो वह दान चर्च में आने वाले लोगों के खाने-पीने से परे भी खर्च होता है। अब अगर असम में लाखों बेघर लोगों के लिए देश के हर मंदिर, हर गुरुद्वारे में एक दिन में आने वाला दान ही दे दिया जाए, तो हो सकता है उससे असम के लोगों के सिर पर एक चादर आ जाए, और उनके पेट में कुछ रोटी आ जाए। यह भी हो सकता है कि केन्द्र सरकार के पास इन तमाम बातों के लिए खासा इंतजाम हो, लेकिन भारत के लोगों के अपने भले के लिए, अपने बच्चों के सामने एक मिसाल के लिए यह जरूरी है कि वे देश और दुनिया के लोगों की मुसीबत में मदद करने का काम करें ताकि भलमनसाहत की बात भी दूर तक सफर करे।
आज नफरत की बात तो दूर-दूर तक चली जाती है, और नफरत से उपजी हिंसा बड़ी-बड़ी खबर भी बन जाती है। लेकिन एक-दूसरे के लिए हमदर्दी, मोहब्बत की कहानियां कभी-कभार इक्का-दुक्का सामने आती हैं। सवा करोड़ से अधिक आबादी का यह देश अगर दूसरे देशों, समाजों या धर्मों से दान की एक ऐसी परंपरा सीखे जो कि सीधे गरीबों के काम आए, तो उससे हिन्दुस्तान के लोगों के बीच आपस में भी रिश्ते मजबूत होंगे। आज भारत में धार्मिक स्थानों पर आने वाला दान करीब-करीब पूरी तरह या तो उन्हीं जगहों पर खर्च हो जाता है, या फिर वह पैसा उन्हीं धर्मों के लोगों पर खर्च होता है। अरबों की दौलत रखने वाले धर्मस्थान जालसाजी के शिकार होते हैं, मठों के महंत या वक्फ बोर्ड के लोग अपनी जायदाद को या तो खुद अफरा-तफरी में गंवाते हैं, या उसको बचाने की ताकत नहीं रखते। इसलिए देश में यह जागरूकता जरूरी है कि जो लोग ईश्वर को मानते हैं, उनके मुताबिक जो दूसरे लोग ईश्वर के ही बनाए हुए हैं, लेकिन आज मुसीबत में हैं, उनकी मदद से बड़ी कोई पूजा नहीं हो सकती। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए।

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