संपादकीय
15 सितंबर 2012
देश का मीडिया कल से कहीं पर समाचारों के बीच में जोरों से कराह रहा है कि मार डाला, कहीं पर वह डीजल बम फोड़ रहा है। देश के विपक्ष की तरह मीडिया भी यह साबित करने में जुट गया है कि डीजल के दाम की बढ़ोतरी सरकार की ज्यादती है, और यह नहीं होना चाहिए था। अधिक में खरीदकर सरकारी रियायत की मदद से कम में बेचने का सिद्धांत गरीबों की मदद करने के लिए होता है। जब यह मदद बड़े लोग इस्तेमाल करने लगते हैं तो यह गरीबों के हक पर एक ऐसी मार होती है जो कि दिखने में गरीबों की मदद लगती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी-अभी एक गैस एजेंसी से करोड़ों की कालाबाजारी पकड़ाई है और यह पूरी की पूरी केंद्र सरकार से आई हुई रियायत थी। लेकिन अभी आज की बहस में हम रियायत की चोरी को छोड़ भी दें, और सिर्फ रियायत ऐसे इस्तेमाल को देखें, जो कि रियायत का हकदार नहीं है।
डीजल कहां-कहां इस्तेमाल होता है? सबसे बड़ा हिस्सा शायद ट्रकों में लगता है जो देश के आर-पार सामान लाते-ले जाते हैं। इन सामानों में गरीबों के इस्तेमाल का सामान होता है, और देश की आधी आबादी शायद ट्रकों में आने वाले सामान का पचीस किलो प्रति व्यक्ति, प्रति महीने से अधिक का इस्तेमाल नहीं करती। दूसरी तरफ संपन्न तबका है जिसके एसी से लेकर फर्नीचर और कालीन तक, फ्रिज और टीवी तक, मोटरसाइकिल और कारों तक, अनगिनत सामान की खपत है, और उसके भवन निर्माण जैसे कभी-कभी के कामों के ट्रक-इस्तेमाल को भी अगर जोड़ लें, तो उसकी ट्रांसपोर्ट की जरूरत शायद हर महीने पांच सौ किलो से अधिक बैठती है। ट्रांसपोर्ट का यह हिस्सा जो कि गैरगरीब के सामानों का है, उसे कोई रियायत क्यों मिलनी चाहिए?
बड़े कारखाने, बड़े दफ्तर, शॉपिंग मॉल, रेस्त्रां और बड़ी दूकानें, मोबाइल फोन के टावर जैसी बहुत सी जगहों पर जनरेटर का इस्तेमाल होता है। इनके डीजल को रियायत का हक क्यों होना चाहिए? इन दिनों बड़ी-बड़ी डीजल गाडिय़ों का चलन बढ़ते चल रहा है, दानवाकार गाडिय़ां सड़कों पर तो बहुत बड़ी जगह घेरती ही हैं, रियायती डीजल पर चलकर ये प्रदूषण भी फैलाती हैं। सिर्फ संपन्न तबके के इस्तेमाल की निजी डीजल गाडिय़ों को रियायत का हक क्यों होना चाहिए? कई जगहों पर कारखानों में भट्टियों में डीजल का इस्तेमाल होता है, यहां पर कोई रियायत क्यों दी जानी चाहिए? इसी तरह भवन निर्माण के काम में, कहीं-कहीं पर खेतों में, जिनमें संपन्न तबके के खेत भी हैं, वहां पर डीजल की महंगाई उनकी लागत में जुडऩी चाहिए, न कि देश के बाकी गरीबों के कंधों पर इसका बोझ आना चाहिए। जो तबके आयकरदाता हैं, उनको डीजल या रसोई गैस की रियायत क्यों मिलनी चाहिए? रसोई गैस के सिलेंडर भी दो अलग-अलग रंगों के बन जाने चाहिए, और सारे आयकरदाता तबके को इस रियायत से बाहर करके सरकार को सब्सिडी पर खर्च घटाना चाहिए। इसी तरह सरकारों और स्थानीय संस्थानों की गाडिय़ों में बहुत सा डीजल खर्च होता है, इसका बोझ केंद्र सरकार पर आने के बजाय इन्हीं संस्थाओं पर आना चाहिए ताकि इनको अपने बजट के भीतर उसका इंतजाम करना सीखना पड़े।
कुल मिलाकर देखें तो रियायत की एक ऐसी तस्वीर डीजल और रसोई गैस से बनती है जिसमें अपात्र तबके की खपत खासी है। सब्सिडी का यह मॉडल अब जानलेवा साबित हो रहा है और सरकार को एक कड़वी गोली का इस्तेमाल करके इस बीमारी से छुटकारा पाना चाहिए। जहां तक सबसे गरीब तबके की बात है तो उस तक इस सब्सिडी को पहुंचाने के दूसरे रास्ते निकलने चाहिए। रसोई गैस की रियायत के हकदार जो लोग हैं, उनकी पक्की शिनाख्त करके उनके खातों में यह सब्सिडी सीधे जाना चाहिए, न कि ऐसे सिलेंडरों के रास्ते जिनको कि काले बाजार में खुलकर इस्तेमाल किया जाता है और केंद्र सरकार का राज्यों की ऐसी लापरवाही पर कोई काबू भी नहीं रहता।
आज विपक्ष और मीडिया का लगभग तमाम हिस्सा चाहे जो कहे, डीजल, रसोई गैस या मिट्टी तेल की सारी सब्सिडी, अनाज पर दी जाने वाली सारी रियायत आखिर जनता के ही खजाने से आती है। इसमें जहां पर चोरी बेकाबू हो, गैरहकदार तबका जहां इसका इस्तेमाल करता हो, वहां पर इसे खत्म करके, गरीब तबके की ऐसी सीधी मदद के रास्ते निकालने चाहिए जहां पर दूसरा तबका उसका इस्तेमाल न कर सके। भारत की राजनीति और यहां के मीडिया की त्रासदी यह है कि लुभावने नारों को खड़ा करने के लिए सरकार या विपक्ष की किसी बात के खिलाफ आवाजें उठने लगती हैं। आज देश में विपक्ष की जो राज्य सरकारें केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ खड़ी हैं, उनमें से कितनी ऐसी हैं जिन्होंने पिछले आठ बरस में केंद्र सरकार के बढ़ाए हुए दाम के ऊपर अपने प्रदेश में बैठे-ठाले अधिक टैक्स पाने से परहेज किया हो? हम इसे सैद्धांतिक और राजनीतिक ईमानदारी नहीं मानते कि केंद्र के बढ़ाए दाम का तो विरोध करें, लेकिन उस बढ़े हुए दाम पर अपने प्रदेश की जनता से और अधिक टैक्स भी वसूल करें। राज्य यह तय कर सकते हैं कि वे केंद्र के बढ़ाए हुए दाम का विरोध करते हैं और इसलिए वे अपनी जनता पर इस बढ़े हुए दाम पर अधिक टैक्स का बोझ नहीं लादेंगे।
जिस तरह जाति-आधारित आरक्षण में मलाईदार तबके को बाहर करने की बात उठती है, उसी तरह सरकारी रियायत से भी मलाईदार तबके को फायदा पाने से दूर रखना चाहिए। और जहां पर दूर रखना आसान न हो, वहां पर रियायत को खत्म करके, आर्थिक रूप से कमजोर तबके को वैसी रियायत किसी दूसरे रास्ते से सीधे पहुंचाना चाहिए। डीजल की महंगाई को लेकर नारे और कार्टून तो ठीक हैं, लेकिन इस देश में जब बड़े-बड़े केंद्रीय मंत्री, बड़े-बड़े सांसद और खरबपति कारखानेदार रियायत गैस सिलेंडरों को सैकड़ों में इस्तेमाल करते हैं, तो वह रियायत जनता की जेब से क्यों जाए? केंद्र सरकार के ही आंकड़े आज पारदॢशता की वजह से पेट्रोलियम कंपनियों की वेबसाईटों पर मौजूद हैं जो बताते हैं कि दिल्ली में खरबपति कांगे्रस सांसद नवीन जिंदल के घर एक साल के तीन सौ पैंसठ दिनों में तीन सौ पैंसठ से अधिक रियायती रसोई गैस सिलेंडर पहुंचाए गए। ऐसी रियायत आखिरी उसी सरकारी बजट से जाती है जिसमें पैसों की कमी से देश की आधी आबादी कुपोषण की शिकार है।

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