बरगद की शाखाएं, और दूब

संपादकीय
13 जून 2013

लालकृष्ण अडवानी के मामले को लेकर देश में एक बहस शुरू हुई है कि उम्रदराज नेता कब नए लोगों के लिए रास्ता साफ करें। इसके अलावा यह भी कि राजनीति, सरकार, या सार्वजनिक जीवन के दूसरे पहलुओं में बुजुर्ग और जवानों का कैसा अनुपात या मेल होना चाहिए। लोकतंत्र में कोई कानून बनाकर सरकारी नौकरियों से परे, अधिक उम्र की सीमा तो तय नहीं की जा सकती लेकिन इस पर देश के लोगों की सोच तो ढाली ही जा सकती है। 
कल रात एक टीवी चैनल एनडीटीवी पर इस मुद्दे पर बहस चल रही थी तो उसमें मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट जैसे बहुत से कम उम्र के सांसदों के चेहरे दिखाए जा रहे थे कि राजनीति में कुछ नौजवान चेहरे भी हैं। इस फेहरिस्त में दूसरी पार्टियों के लोग भी थे। लेकिन अधिकतर चेहरे ऐसे थे जो कि अपनी खानदानी विरासत में संसद की एक सीट को पाकर दूसरी पीढ़ी या तीसरी पीढ़ी के सांसद-विधायक थे। सवाल यह उठता है कि ऐसे लोगों को कैसे युवा नेता माना जाए? कहने को तो राजीव गांधी इस देश के सबसे नौजवान प्रधानमंत्री थे, लेकिन वे कुछ विपरीत परिस्थितियों में उस जगह पहुंचे थे, और अगर वे इंदिराजी की हत्या के बिना भी प्रधानमंत्री बने होते तो भी वे अपने कुनबे के तीसरी पीढ़ी के प्रधानमंत्री होते, और उनकी कम उम्र उनके आड़े नहीं आती, ठीक उसी तरह जिस तरह की आज उनके बेटे राहुल गांधी के आड़े उम्र नहीं आने वाली है।
लेकिन आज की बात हम जवानों पर नहीं, बूढ़ों पर, बुजुर्गों पर रखना चाहते हैं। इंसानी मिजाज को अगर देखें तो अस्सी बरस के जवान और अठारह बरस के बूढ़े दोनों ही दिखते हैं। जो सरकारी नौकरी जिंदा लोगों को मुर्दा बना देने के लिए बदनाम रहती है, उसमें सबसे ऊंची कुर्सियों पर बैठे कई ऐसे जवान आला-अफसर दिखते हैं जो उतना ही काम करते हैं, जितना कि अस्पताल में वेंटिलेटर पर सांस ले रहा कोई मरीज करता हो। दूसरी तरफ बहुत से ऐसे अफसर रहते हैं जो कि रिटायर हो जाने के बाद भी, पांच-दस बरस बाद भी दिन में बारह घंटे काम करने की अपनी आदत से बाज नहीं आते। ऐसा ही हाल राजनीति के लोगों का है, जिनमें बहुत से लोग जवानी में अजगर की तरह पड़े रहते हैं, और कुछ लोग मोतीलाल वोरा की तरह रहते हैं जिनको सोनिया-राहुल के साथ कदम से कदम मिलाकर रफ्तार से चलते हुए देखकर लोग हक्का-बक्का रह जाते हैं, और इन लोगों को यह भी अंदाज नहीं रहता कि कमरे के भीतर भी वे किसी भी जवान के मुकाबले दुगुने घंटे काम करते हैं। इसलिए देह का उम्र से काम को लेकर बहुत अधिक रिश्ता नहीं रहता। 
लेकिन बात देह तक सीमित नहीं रहती। बात तजुर्बे और सोच की भी रहती है, और इस बात की भी रहती है कि यह तन और मन आने वाले कितने कल के लिए अपने को देखते हैं। कुछ ही हफ्ते पहले इसी पन्ने पर एक कॉलम में पश्चिम के एक अर्थशास्त्री की सोच का जिक्र किया गया था कि किस तरह समलैंगिक लोग दीर्घकालीन नीतियों की नहीं सोच पाते क्योंकि वे लोग आने वाली अपनी किसी पीढ़ी की कल्पना नहीं करते। अब भारतीय राजनीति या सार्वजनिक जीवन को देखें, तो ऐसा लगता है कि लोग अपनी देह के आखिरी दिन तक देश को अपनी लीडरशिप देना चाहते हैं, और उसके ठीक अगले ही दिन अपने वारिसों को उस कुर्सी पर देखकर ही अस्थियों का विसर्जन चाहते हैं। सार्वजनिक जीवन में कुनबापरस्ती का ऐसा कब्जा बुढ़ापे को बदनाम और जवानी को मिली कुर्सी को नाजायज ठहराता है। और आज अगर हिन्दुस्तान की राजनीति में कोई यह सोचे कि बुजुर्ग और जवान का अनुपात क्या रहे, तो उनको यह भी सोचना चाहिए कि अपने कुनबे के बुजुर्ग से विरासत में जवान को मिली सत्ता को जवान गिना जाएगा, या बुढ़ापे की सत्ता की निरंतरता? जहां तक जवानी के सोच की बात है, तो अपने कुनबे के बूढ़े-सयाने से मिली विरासत के साथ-साथ वह बूढ़ी सोच भी तो नए जवान को ढोनी पड़ती है। इसलिए ऐसे जवान सांसद या विधायक पता नहीं कितनी नई सोच लेकर आ पाते होंगे जिनको खानदानी सोच को भी ढोना पड़ता है। 
जिन बूढ़े या बुजुर्ग लोगों को यह लगता है कि उनके बिना यह दुनिया नहीं चल सकती, पार्टी नहीं चल सकती, उनकी संस्थाएं नहीं चल सकतीं, उनके बारे में बहुत पहले किसी समझदार ने एक कब्रिस्तान पर एक तख्ती लगाई थी कि यहां पर ऐसे बहुत से लोग दफन हैं, जिनको यह खुशफहमी थी कि उनके बिना दुनिया नहीं चल सकेगी। दुनिया का इतिहास, और इंसानों से पहले का, कुदरत का इतिहास इस बात का गवाह है कि हर पेड़ और पौधे के पत्ते और फल झड़कर नए पत्तों और फलों के लिए जगह बनाते हैं। और कुदरत से यह नसीहत लेने की भी जरूरत है कि कोई पेड़ अपने खुद के अगले पेड़ों के लिए, अपनी अगली पीढ़ी के लिए फल बचाकर नहीं रखते, छांह बचाकर नहीं रखते। उनके फलों के बीज पंछियों के मार्फत दूर-दूर तक सफर करते हैं और कड़ी मिट्टी या चट्टानों में जगह निकालकर अपनी जिंदगी खुद बनाते हैं। राजनीति में भी अमरीका की मिसाल बहुत ताजा और सामने है। वहां के कामयाब, लोकप्रिय या बेहतर राष्ट्रपति बिना किसी कुनबे के इतिहास के, पहली पीढ़ी के रहे हैं। दूसरी तरफ बूढ़े राष्ट्रपति बुश के जवान राष्ट्रपति बेटे बुश ने अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी बदनामी दर्ज कराई है, और अमरीका के सबसे बेवकूफ राष्ट्रपति के रूप में इतिहास में जगह पाई है। दूसरी तरफ ओबामा जैसे ऐसे राष्ट्रपति हैं जो भुखमरी की झोपड़ी से निकलकर यहां तक पहुंचे, और बुशों के मुकाबले बेहतर साबित हुए। 
भारत की राजनीति में जवान बेहतर हों, और बूढ़े खराब, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सत्ता के आने-जाने की बात कहते हुए नौजवान पीढ़ी को अधिक मौका देने की बात वे लोग अधिक करते हैं जिनके पास अपनी सारी काबिलीयत महज उम्र है, कम उम्र। नई पीढ़ी के मायने अगर नया ज्ञान और नई कल्पनाएं हैं, तब तो ठीक है, नई पीढ़ी का मतलब अगर अधिक मजबूत बदन है, तो उससे किसी राजनीति, या लोकतंत्र, या समाज का कोई भला नहीं होने वाला। अच्छे हों या बुरे, काम और मेहनत के मामले में मनमोहन सिंह आज भी हिन्दुस्तान के नब्बे फीसदी जवानों के मुकाबले रोज अधिक घंटे और साल में अधिक दिन काम करते हैं। वे 16-365 से अधिक काम करते हैं। इसलिए उम्र हर किसी के आड़े आती हो यह जरूरी नहीं है, लेकिन नए लोगों के आने से जो नई सोच आ सकती है, नया फेरबदल आ सकता है, उसका एक फायदा अलग रहता है। लेकिन ऐसी नई पीढ़ी के लोगों की एक सोच तो हो! 
इसलिए पीढिय़ों का यह टकराव दरअसल अधिक मौकों पर काबिज रहने की, या अधिक मौकों को पाने की नीयत अधिक लगती है, और इस नीयत से हमको कोई भला होते नहीं दिखता। अडवानी को हटाकर उनसे एक पीढ़ी कम के मोदी को लाना चुनावी राजनीति में वोटों के हिसाब से फायदे का हो सकता है, लेकिन जहां तक सोच और काम की बात है, तो 2014 के बाद के बरसों में भी शायद अडवानी मोदी के मुकाबले बहुत बेहतर काम करने वाले, और काम की जरूरत के लिए खासे तन्दरूस्त रहेंगे, उनकी पेट की गड़बड़ी और दस्त के शायद अब दूर हो ही चुके हैं।
पीढिय़ों के फर्क पर बहस का यह सिलसिला सिर्फ उम्र को लेकर चलना फिजूल का है, अपने आसपास अगर हम देखें तो अनगिनत जवान मुर्दे दिखते हैं, और अनगिनत साठे पर पाठे भी दिखते हैं। दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के जो बुजुर्ग और दिग्गज नेता विद्याचरण शुक्ल गुजरे, वे अस्सी के हो जाने के बाद भी अपनी आत्मकथा पूरी करने को लेकर किसी हड़बड़ी में नहीं थे, और यह कहते रहे कि बुढ़ापे में उसे पूरा करेंगे। सोच जवान होनी चाहिए, सपने जवान होने चाहिए, इन्हीं पंखों पर बदन उड़ता है, और उम्र का बोझ उसे रोक भी नहीं पाता। जो लोग यह मानते हैं कि बरगद सिर्फ अपनी शाखाओं को फैलाते हैं, और अपने तले किसी दूसरी किस्म की घास को भी नहीं पनपने देते, उनकी बात कुछ हद तक ठीक हो सकती है, लेकिन कुदरत को अगर देखें, तो वह बरगद से परे भी पनपती है, और तकरीबन सारी की सारी कुदरत बरगदों के साये से परे पनपी है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें