संपादकीय
19 जून 2013
उत्तराखंड में बारिश और बाढ़ के चलते जो भूस्खलन हुआ है, उससे तबाही के मंजर देखकर लोग हिल गए हैं। मौतों के आंकड़े आज अगर सहमा नहीं रहे हैं, तो भी आने वाले दिन बहुत से अधिक गुमनाम, बेनाम चेहरों की तस्वीरें ला सकते हैं, जो कि कमजोर तबकों के होने की वजह से अब तक मीडिया में दर्ज नहीं हो पाए हैं। एक आशंका ऐसी है कि मौतें हजार से अधिक भी हो सकती हैं। इस हादसे को लेकर कुछ पहलुओं पर बात होनी चाहिए, ताकि इससे जहां-जहां जो सबक लिया जा सके, इस बार के नुकसान के बाद बचाव के उस मौके को न खोया जाए।
पर्यावरण के नजरिए से बात करें तो धरती के लोगों ने धरती का जितना बेदिमाग नुकसान किया है, उसके चलते समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग हिस्से धरती और आसमान पर उसका दाम चुकाते हैं। कहीं आसमान पर ओजोन की सतह का छेद धरती के लिए खतरा खड़ा करता है, तो कहीं धरती के भीतर गहरे भूकंप आते हैं, और लाखों लोग मारे जाते हैं। कुदरत के साथ हो रही ज्यादती को खत्म करने की एक बड़ी जरूरत, एक बड़ी बहस का अलग मुद्दा है, उसको हम यहां अभी नहीं छू रहे। यहां अभी सिर्फ उन बातों पर चर्चा कर रहे हैं जो कि सतह पर दिख रही हैं, और जिनको मामूली तैयारी से सुधारा जा सकता है। इसमें आपदा प्रबंधन जैसी कागजी तैयारी से लेकर पर्यटन केन्द्रों के ढांचों, शहरी बसाहट की योजना, और पर्यटन सुविधाओं की बात है।
भारत के पर्यटन केन्द्रों के ढांचों को देखें तो उनमें गैरकानूनी बसाहट इस कदर बढ़ती चली गई है, कि एक तरफ वह कानून तोडऩे वाले लोगों को थोड़ी सी अधिक कमाई का मौका देती है, लेकिन दूसरी तरफ भारत की पर्यटन संभावनाओं को ऐसे गैरकानूनी निर्माण धीरे-धीरे करके खत्म भी कर रहे हैं, क्योंकि संपन्न दुनिया से आने वाले पर्यटक इस तरह की बदहवास बसाहट को किसी शौक की मजबूरी में ही झेलते हैं, ऐसी बेतरतीबी उनकी पसंद नहीं होती। विकसित और साफ-सुथरी दुनिया को अगर देखें, तो उनके मुकाबले भारतीय तीर्थ और पर्यटन केन्द्र रोजाना की बाजारू कमाई के हमलों से जख्मी कर दिए गए हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को सभी तीर्थ और पर्यटन केन्द्रों को अवैध कब्जों, अवैध निर्माण और अवैध बसाहट से आजाद करना चाहिए, और इन जगहों को कानून का सम्मान करने वाले शहर-कस्बों में बदलना चाहिए। इसके साथ-साथ जो महत्वपूर्ण दर्शनीय जगहें हैं, उनको तबाह करने का काम भी रफ्तार से और बेदर्दी से देशभर में होता है। देश के सबसे बड़े तिरूपति मंदिर में मंदिर के सामने से मुख्य ढांचे को पूरा देखा भी नहीं जा सकता क्योंकि उसके ठीक सामने बड़ी बेअक्ली से लोहे का एक नया शेड खड़ा कर दिया गया है। ऐसा ही हाल बहुत से दूसरे पर्यटन केन्द्रों का हो रहा है, जहां पर तीर्थों, और स्मारकों पर कहीं आस्था के सिंदूर पोते जा रहे हैं, तो कहीं बाजार उनको खासे दूर तक घेर ले रहा है, और कहीं नेता-अफसर-ठेकेदार मिलकर उन जगहों पर बड़े-बड़े निर्माण कर दे रहे हैं। पर्यटन केन्द्रों, स्मारकों, आस्था केन्द्रों को सरकार और समाज ने मक्खियां बनकर घेर लिया है, और परजीवी की तरह उन पर अपना रोजगार टिका दिया है। इस सिलसिले में एक बहुत बड़े फर्क की जरूरत है, वरना हर दिन कुछ दर्जन नए लोग एक छोटे से रोजगार की तलाश में पर्यटन को और अधिक निचोडऩे में लग ही जाते हैं।
दूसरी तरफ पर्यटन सुविधाओं के ढांचे को अगर देखें, तो विदेशी सैलानियों के हिसाब से ही नहीं, भारत की भाषा बोलने वालों के हिसाब से भी, हर पर्यटन केन्द्र लुटेरों की बस्ती लगता है, जिस पर किसी का कोई काबू नहीं है। स्थानीय रोजगार के नाम पर ऐसी स्थानीय लूट को प्रशासन बढ़ावा देता है, बचाता है, जिससे कि लोग एक हिकारत भरे तजुर्बे के साथ वहां से लौटते हैं। होटलों से लेकर टैक्सी-बसों और खच्चरों तक, पंडे-पुजारियों से लेकर गाईड तक, और हस्तशिल्प के सामानों से लेकर खानपान की दुकानों तक, भीड़भरे पर्यटन केन्द्रों और तीर्थों को शासन-प्रशासन ने पूरे देश में ही बाजार के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। जबकि सरकार का काम अपनी जगहों को आने वाले पर्यटकों की मेहमाननवाजी के हिसाब से नियम-कायदों से चलाने का रहना चाहिए। आज हालत यह है कि हिन्दुस्तान की अधिकतर जगहों पर जाते हुए लोग पूरे वक्त एक शक से घिरे रहते हैं कि वे सही दाम और सही रेट दे रहे हैं, या किसी लूट का शिकार हो रहे हैं? वे लौटने तक लूटपाट या जुर्म से बचे रहेंगे, या बुरी यादें लेकर आएंगे। खाते हुए पूरे वक्त लगता है कि साफ खाना-पानी मिल रहा है, या कि गंदगी से कोई बीमारी पा जाएंगे। इक्कीसवीं सदी और अंतरिक्ष में पहुंचा हुआ भारत जब अपने देश के सबसे बड़े पर्यटन केन्द्रों और तीर्थों को गंदगी और घूरों से आजाद नहीं कर पाता, तो वह अपनी एक साख को खोता भी है। सैकड़ों या हजारों बरस पहले जिन लोगों ने इस देश में ऐसी जगहें बनाई थीं जिनको देखने दुनियाभर से लोग आते हैं, या कुदरत ने ऐसी जगहें दी हैं जिन पर पहुंचकर लोगों को लगता है कि धरती का जन्नत यहीं पर हैं, उन जगहों को बर्बाद करने में सरकार भी बाजार की तरह का ही बर्ताव करती है। पर्यटन के ढांचे को बेहतर और दोस्ताना, संगठित और योजनाबद्ध बनाने की जरूरत है, और यह उन जगहों पर भी जरूरी है जहां पर उत्तराखंड की तरह की प्राकृतिक विपदाएं नहीं आतीं।
अब बात रह जाती है आपदा प्रबंधन की तैयारियों की। जहां पर आने वाले खतरे इंसानी काबू के बाहर के होते हैं, वहां पर ऐसी तैयारियों की जरूरत है कि मुसीबत आए, तो उसका नुकसान कम से कम हो, बचाव तेज रफ्तार हो, और मरम्मत जल्द हो सके। अभी हमारे पास ऐसी कोई वजहें नहीं हैं कि उत्तराखंड में चल रहे बचाव को हम खामियों से भरा गिनें, लेकिन देश के बाकी बहुत से हिस्सों में समय-समय पर यह बात सामने आती है कि भगदड़ में होने वाली थोक मौतों से लेकर दूसरे किस्म के हादसों तक, सरकारों की तैयारियां बहुत कमजोर रहती हैं। इस मौके पर हर प्रदेश को आपदा प्रबंधन की अपनी तैयारी को बेहतर बनाना चाहिए, और अगर हो सके तो उत्तराखंड जैसे मौकों पर, अपने आपदा प्रबंधन के कुछ अफसरों को चुपचाप देखकर कुछ सीखने के लिए भेजना भी चाहिए।
यह मामला एक और अधिक लंबी बातचीत का है, लेकिन इसके कुछ पहलुओं को छूकर हम इसे और लोगों की चर्चा के लिए यहीं छोड़ रहे हैं।

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