संपादकीय
17 जून 2013
आज जिस वक्त हम ये लाइनें लिख रहे हैं, दिल्ली में यूपीए सरकार का मंत्रिमंडल बदलने को है, और कांग्रेस संगठन में कल एक बड़ा फेरबदल हुआ है। लोकसभा चुनाव को तो वैसे करीब एक बरस बाकी है, लेकिन कुछ राज्यों के चुनाव कुछ महीने बाद ही होने हैं, और यह फेरबदल इन दोनों के हिसाब से काफी लेट हुआ है, जिसका असर पता नहीं विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में पड़ सकेगा या नहीं।
इस पर लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि कांग्रेस पार्टी अपने संगठन के भीतर, और अपनी अगुवाई वाली यूपीए सरकार में समय रहते फेरबदल नहीं कर पाई, और पूरे नौ बरस इसी तरह की लेटलतीफी का शिकार हुए। बहुत से मंत्रालय खाली पड़े रहे, और उनका काम दूसरे मंत्रियों की जेब में टंगी एक और कलम की तरह उन पर टांग दिया गया। नतीजा यह हुआ कि वक्त पर फैसले नहीं हुए, फैसलों पर अमल नहीं हुआ, और अमल हुआ तो उसके नतीजे सामने नहीं आए। और तो और यूपीए सरकार ने पिछले नौ बरसों में प्रदेशों के राजभवनों में भी वक्त पर राज्यपाल मनोनीत नहीं किए, जबकि पिछले राज्यपाल कई जगहों पर एनडीए सरकार के बनाए हुए थे और उनके कार्यकाल खत्म होने के बाद भी एक-एक बरस से ज्यादा वक्त तक वे काबिज रहे। छत्तीसगढ़ ऐसे राज्यों में से एक रहा जिसमें के.एम. सेठ कार्यकाल पूरा होने के बाद डेढ़ बरस तक राज्यपाल बने रहे। यह एक ऐसा दीवालियापन था जिसमें देश की सबसे बड़ी कांग्रेस पार्टी के नेताओं और उसके पसंदीदा लोगों में से कोई नाम तक यूपीए सरकार को नहीं सूझा।
आज शाम यूपीए मंत्रिमंडल में फेरबदल के नाम आएंगे, इसलिए उनके बारे में अभी से अधिक कुछ कहना ठीक नहीं है, लेकिन बड़े-बड़े मंत्रालय कभी यूपीए के भागीदारों के जेल जाने से, सरकार छोडऩे से खाली पड़े रहे, और अभी फिर वही हाल दिख रहा है। सरकार चलाने या गठबंधन और पार्टी चलाने का यह तरीका इस गठबंधन को चाहे जैसा पड़ा हो, देश को तो भारी पड़ा है, और इसका नतीजा अगले चुनाव में यूपीए को देखने मिल सकता है। दूसरी बात यह कि कांग्रेस पार्टी ने अलग-अलग प्रदेशों में अपने जिन नेताओं को जिम्मा दिया है, उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो कि अपना खुद का राज्य खो चुके हैं, अपनी पिछली जिम्मेदारियों के राज्य खो चुके हैं, और अब उनको नए राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है। न सिर्फ कांग्रेस के सामने, बल्कि भाजपा के सामने भी यह दिक्कत दिखती है कि राज्यों में हार चुके अपने खाली बैठे नेताओं को कहीं न कहीं फिट करने के लिए उनको दूसरे राज्यों में चुनाव जितवाने का जिम्मा दिया जाता है। और इसका नतीजा आमतौर पर वैसे राज्यों की अपनी संभावनाओं के खिलाफ जाता है। इसकी एक मिसाल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी रहे, जिन्होंने महाराष्ट्र खोया, और उसके बाद उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, और फिर वे तकरीबन सारे ही राज्य अपनी अगुवाई में हारते चले गए। कुछ ऐसा ही दिग्विजय सिंह का रहा, जो मध्यप्रदेश को खोने के बाद उत्तरप्रदेश गए, और वहां पार्टी लगातार बुरे हाल में रही, और अब उनको आन्ध्र सहित कुछ और राज्यों का प्रभारी बनाया गया है। कहीं-कहीं ऐसे नेताओं की अगुवाई में कोई राज्य अगर जीता भी जाता है, तो वहां पर हो सकता है कि स्थानीय मुद्दे भी जीतने में मदद करते हों। छत्तीसगढ़ में एक समय की बात है कि यहां कांग्रेस के प्रभारी सचिव के लिए दिल्ली से मिर्जा इरशाद बेग को रखा गया था, जो गुजरात में खुद अपने सारे चुनाव हारे हुए थे।
एक सरकार, खासकर गठबंधन सरकार, और एक संगठन, खासकर पूरे देश में फैला हुआ सौ बरस से पुराना संगठन, बहुत सी बेबसियों वाले होते हैं, लेकिन एक नजर में हमको लगता है कि यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी इन दोनों के भीतर फैसले लेने में अंधाधुंध देर की गई, और फिर इतने समझौतों वाले फैसले लिए गए कि पार्टी ने, और गठबंधन ने अपनी संभावनाएं खो दीं। आने वाले महीनों में कांग्रेस और यूपीए का काम लोग बारीकी से देखेंगे और उनका चुनाव पर बहुत अधिक असर पड़ेगा।

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