28 जून 2013
संपादकीय
उत्तराखंड त्रासदी पर लोग अलग-अलग तरीके से अपनी राय जाहिर कर रहे हंै। कोई इसके लिए बिना सोचे-समझे किए गए विकास को दोष दे रहा है, तो कोई सरकार के ढीलेपन को, तो कोई किस्मत को। दर्दनाक कहानियां, मुसीबत में फंसे लोगों को बचाने में लगे दलों के सदस्यों की जांबाजी के किस्से, और कुछ नेताओं की हल्की राजनीति की खबरों के बीच, आज देश के एक प्रमुख अखबार की पहल पर समाज की निचली पायदान पर रहते लोगों के लिए हमदर्दी दिखाने के लिए 'कम्पेशन डेÓ से जुडऩे की अपील की जा रही है। एक ऐसे देश में जहां का दुनिया के अरबपतियों से भरा कार्पोरेट जगत देश की ऐतिहासिक आपदा के समय चुपचाप हाथ बांधे, मुंह सिले बैठा है, अखबार जनता से अपील कर रहा है कि वह अपने लिए छोटे-मोटे काम करने वालों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कोई कदम उठाए, उनका बैंक में खाता खुलवाए, उन्हें अपना बीमा करवाने में मदद करे, उनकी डॉक्टरी जांच करवाए। अब जब उत्तराखंड में कुदरत के कहर के शिकार लोगों की लाचारी का फायदा उठाकर दस बीस गुने ज्यादा दाम वसूलने, जीने की जद्दोजहद में अधमरे हो रहे लोगों को लूटने, उन्हें कत्ल करने, उनकी औरतों की इज्जत लूटने, और लाशों से रुपये-पैसे, गहने लूटने की खबरें देखकर मन खिन्न हो रहा है, तब देश में कुछ अच्छा करने के लिए पहल करने, नेतागिरी दिखाने की यह अपील, बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है।
सबसे पहली बात तो नेतागिरी दिखाने की ही है। नेतागिरी शब्द बरसों से बहुत नकारात्मक अर्थों में देखा जाता रहा है। 'नेतागिरी करनाÓ समाज में अर्से से एक न करने जैसे काम के रूप में देखा जाता है। पिछले कुछ बरसों से कारपोरेट जगत की दया से नेतागिरी शब्द को कुछ इज्जत मिली है, लेकिन घर में, स्कूल-कॉलेज में, दफ्तर में, अक्सर नेतागिरी को एक ना करने लायक काम के रूप में ही प्रचारित किया जाता है- जिससे बड़े पदों पर बैठे लोग नाराज होते हंै, अनुशासन खराब होता है, और इंसान अपने मकसद से भटक जाता है। अपने बच्चों में, छात्रों में नेतागिरी के गुण पनपाने, उन्हें बढ़ावा देने की सोची-समझी मेहनत घर या स्कूल में शायद ही कहीं होते दिखती है। समाजशास्त्री मानते हंै, ताकतवर तबके ने अपनी ताकत के लिए चुनौतियों की गुंजाईश खत्म करने के लिए ऐसा माहौल खड़ा किया हुआ है। शायद यह बहुत हद तक सच भी हो, लेकिन यह गौर करने लायक बात है कि क्या हमारे किसी मातहत में एक नेता के गुण पनप जाना इतना डरावना है, कि उसे सोच-समझकर, चालें चलकर ऐसा करने से रोका जाए? ऐसा करने के फायदे कितने हैं और ऐसा करने का नुकसान किसे सबसे ज्यादा है?
अगर घर के बच्चों में नेतागिरी के गुणों को बढ़ावा दिया जाए, तो उनमें फैसले लेने की कूबत बढ़ेगी। ऐसा करने पर वह अपने अच्छे-बुरे, फायदे-नुकसान के बारे में सोचना शुरू करेंगे। शायद इसके कुछ खतरे हो सकते हों, लेकिन उन पर लगातार नजर रखकर उन्हें बचाया जा सकता है। उन्हें सही दिशा दी जा सकती है। बात-बात पर उनकी तरफ से फैसला लेने की जहमत से माता-पिता, बड़ों को निजात मिल सकती है, और जिंदगीभर उनकी जिम्मेदारी ढोने से वह बच भी सकते हैं। सही, संतुलित और जिम्मेदार सोच के साथ बड़े हुए बच्चे, फैसला लेने के नाकाबिल, अपनी खुद की किसी सोच के बगैर, जिम्मेदारी उठाने की आदत के बिना बड़े हुए बच्चों के मुकाबले अपने और परिवार दोनों के भविष्य के लिए बेहतर हैं। यही बात मातहतों और उनके ऊपरी अधिकारियों के बारे में कही जा सकती है। इस पूरे काम में बस थोड़ी निगरानी , समूची ईमानदारी और पारदर्शिता की जरूरत होती है, लेकिन हम देखते हंै कि ईमानदारी, जिम्मेदारी और पारदर्शिता ही वे बातें हंै जिनसे आज हर कोई मुंह चुराना चाहता है, लेकिन यह एक अलग बहस का मुद्दा है, आज बात नेतागिरी की हो रही है।
उत्तराखंड की त्रासदी में हजारों यात्री फंसे, लेकिन अपना दुख भूलकर दूसरों की मदद करने वाली नंदिनी जैसे गिने चुने ही थे। ऐसा इसलिए है कि दूसरों की मदद करने को, किसी मामले में पहल करने को ऐसा गुण मान लिया गया है, जो हर एक में नहीं हो सकता, जिसके लिए बहुत हौसले, बड़ी दौलत, जमा पूंजी, रसूख की जरूरत है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। सन् 90 के दशक में जब सरकार के गरीबी दूर करने के कार्यक्रमों के समीक्षा की गई, तो उसमें से एक बात यह भी निकली कि जरूरतमंदों को दरअसल जो चाहिए, वह सब्सिडी, रियायत, मुफ्त सरकारी मदद नहीं, बल्कि फैसला करने का अधिकार, उसकी काबीलियत है, जिसके अभाव में वह किसी मदद के सहारे भी गरीबी से उबर नहीं सकते, क्योंकि गरीबी दूसरी बातों के अलावा जिंदगी में लिए गए उनके गलत फैसलों के कारण भी काफी हद तक है। इसके बाद देश भर में समाजसेवी संस्थाओं ने गरीबों में, खासकर औरतों में फैसला लेने की काबीलियत पैदा करने के लिए कोशिशें शुरू कीं, जिसके लिए उनमें नेतृत्व के गुणों को बढ़ावा देने की कोशिशें हुर्इं, जिनके बहुत अच्छे नतीजे देखे गए। जो नेता, अफसर प्रजा में नेतागिरी पनपने से खौफ खाते थे, उन्होंने देखा कि नेतगिरी के गुणों से लैस उनकी प्रजा, उनके मतदाता सरकारी योजनाओं का बेहतर लाभ उठाते हंै और इससे उनकी कामयाबी दिखती है, उनका मताधार मजबूत होता है। यह इन कोशिशों का ही एक दूरगामी नतीजा है कि हम देखते हंै कि आज राजनीति में विकास का मुद्दा इतना अहम हो चुका है, हालांकि इसमें नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि मोदी उस गुजरात राज्य के नेता हंै जहां मजदूर आंदोलनों और समाजसेवी संगठनों का, सहकारिता का पुराना इतिहास रहा है। मोदी के प्रतिद्वन्द्वियों के यह दावे गलत नहीं हंै कि उन्हें पहले से विकास के रास्ते पर चल रहा राज्य मिला है, इसमें गुजराती जनता में अर्से से बढ़ावा पा रहे नेतृत्व के गुण का भी योगदान है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
बात वापस अगर अपने आसपास के निचले तबके या कमजोर लोगों को मजबूत बनाने की पहल पर लाएं, तो हम देखेंगे कि हमारे लिए काम करने वालों में, आर्थिक और सेहत की दृष्टि से मजबूत व्यक्ति, इस लिहाज से कमज़ोर व्यक्ति के मुकाबले हमारे लिए कहीं बेहतर है। उसकी मजबूती से असुरक्षा महसूस किए बिना उसे मजबूत बनाने में, उसकी तरक्की में भागीदारी निभाने में हमें एक अच्छा काम करने का संतोष तो मिलता ही है, हम अपना आनेवाला वक्त भी सुधार रहे होते हंै। नेतागिरी का बीड़ा उठाने के लिए देश के लोगों से अपील कर रहा अखबार 28 जून को कम्पेशन डे, यानि करुणा या दया दिवस के रूप में मनाने की अपील कर रहा है; लेकिन गौर से देखें तो अपने लिए काम करने वाले को मजबूत बनाकर हम कोई दया , करुणा नहीं दिखाते। विकास के रास्ते पर यह एक शुद्ध लेनदेन है, जिससे उन्हें कुछ आज नजर आने वाले फायदे मिल रहे हंै और हमें दिली खुशी, समाज में इज़्जत जैसे मानसिक-सामाजिक फायदों के साथ आने वाले दिनों में अपने लिए बेहतर काम करने वाले भी मिल रहे हैं। इस सोच को घर से लेकर दफ्तर और सामाजिक दायरे तक सब कही फैलाने में सबसे ज्यादा हमारा ही फायदा है। हर बात को नफे-नुकसान के तराजू में तौलना ठीक नहीं, लेकिन व्यवहारिकता के लिहाज से सोचकर किया गया काम ही टिकाऊ होता है। और व्यवहारिकता का तकाजा यही है कि हम अपने घर, दफ्तर, समाज में कमजोरों को मजबूत करें। इसके लिए जरूरी नेतागिरी के गुण खुद में, अपने बच्चों में दूसरों में विकसित करें। अपने स्वार्थ और डर से उबरकर अगर हम यह कर सकें, तो आने वाले समय में खुद पर हम, और हम पर हमारा समाज फख्र कर सकेगा।

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