बेजार जनता के सब्र की आजमाईश

संपादकीय
2 जून 2013
अहमदाबाद में पानी की किल्लत से जूझ रही प्रजा बेखबर, स्विमिंगपूल में नहाने का मजा लेने गए सत्तारूढ़ भाजपा के एक पार्षद को गुस्साई भीड़ ने तैरना छोड़ अपने इलाके में चलने को, अपनी समस्याएं सुनने और उन्हें दूर करने का भरोसा दिलाने पर मजबूर किया। भाजपा और कांग्रेस इस घटना का अपनी-अपनी तरह से राजनीतिकरण कर सकते हंै, लेकिन जनता ने ऐसा करके यह साफ कर दिया कि अगर नेता उनकी अनदेखी करेंगे तो वह क्या कुछ कर सकती है। वोट मांगने जनता के सामने हाथ जोडऩे और वायदे करने के बाद बहुत से नेता उन्हें भूल जाते हैं, बहुत से यह भी भूल जाते हैं कि जिस प्रजा ने उन्हें चुनकर भेजा है उसकी कुछ समस्याएं भी हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो जानते हैं कि तमाम समस्याओं के बावजूद जनता के पास उनके पीछे रोज-रोज भागने का वक्त नहीं है, इसलिए एक-दो वायदे करके लफ्फाजी कर वे अपनी मस्ती में मस्त रह सकते हंै। एक तो भारत के समाज में रोजमर्रा के जीवन में यंू भी संवेदनशीलता की भारी कमी दिखती है। हमारे तौर-तरीकों में, हमारी बोलचाल में, हमारे रस्मो-रिवाज में ऐसी बहुत सी बातें हंै जो गौर करने पर किसी न किसी वर्ग के मर्म पर चोट पहुंचाने लायक संवेदनहीन होती है। ऐसे समाज की परवरिश में थोड़ी बहुत भी सत्ता पाकर दूसरों की तकलीफों, भावनाओं के प्रति संवेदनाहीन हो जाना बहुत से लोगों के लिए बहुत आसान काम होता है। अहमदाबाद में अपने वार्ड के लोगों की दिक्कत से जूझ रहे भाजपा पार्षद शायद इसी जमात के रहे होंगे। हालांकि उनकी गलती के लिए उनके साथी जनता का निशाना बन गए। पानी की किल्लत झेलती जनता को  स्विमिंगपूल में नेता का तैरना नागवार गुजरना बहुत अस्वाभाविक नहीं है।
ऐसे कितने ही किस्से हमने पहले भी देखे हैं। अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं कि सूखे से ग्रस्त महाराष्ट्र के एक मंत्री को एनसीपी प्रमुख ने शादी पर बेहिसाब खर्च करने पर फटकार लगाई थी। कर्नाटक में भयंकर सूखे से ग्रस्त जनता को छोड़कर राज्य के विधायकों के सरकारी खर्च पर विदेश दौरे के चर्चे भी खूब हुए थे। कर्नाटक में ही कुछ साल पहले भयंकर बाढ़ से जूझ रही जनता को छोड़ येदियुरप्पा सरकार गिराने की तिकड़म में जुटे विधायक होटलों और रिसोर्टो में आराम फरमा रहे थे। जब शहरों की, अपने अधिकारों को काफी कुछ खोज खबर रखने वाली जनता के साथ सत्ता पर बैठे लोग ऐसी संवेदनहीनता दिखा सकते हैं, तो अपने अधिकारों से अनजान, रोजमर्रा की दिक्कतों से जूझती दूर-दराज के पिछड़े आदिवासी इलाकों की जनता के साथ दिखाई जा सकने वाली बेपरवाही का अंदाज लगाया जा सकता है। ऐसी असंवेदनशीलता का शिकार हुए लोगों में से कुछ अगर माओवादी आंदोलन के लिए सहानुभूति पाल लें, तो इसमें ताज्जुब क्या हो सकता है? एक तरफ जीवन की छोटी-छोटी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष है, तो दूसरी तरफ उनकी तरफ से सरकार चलाने के लिए तमाम वायदे कर के सत्ता पाने वाले एक बड़े तबके की ऐसी लापरवाही। जनता की छोटी-छोटी रोजमर्रा की जरूरतें, जो थोड़े पैसे खर्च करके, सरकारी तंत्र में थोड़ी चुस्ती लाकर, जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताएं थोड़ी दुरूस्त करके पूरी की जा सकती हैं, वह भी उन्हें न मिले, और उनके लिए काम करने के लिए चुने गए लोग तमाम सुविधाएं भोगकर आराम से जिएं, तो माओवाद जैसी समस्या के लिए आसानी से जमीन तैयार हो जाती है। जैसा कि कहा जाता है, और सही कहा जाता है कि तमाम अच्छी और बुरी बातें ऊपर से नीचे आती हैं, सत्ता में ऊपरी कुर्सियों में बैठे लोगों का यह रवैया निचले स्तर तक के कर्मचारियों तक चला आता है। ऊपर से नीचे तक बहती बेरूखी की इस हवा के गर्म थपेड़े खाती जनता के पास विकल्प बहुत थोड़े होते हैं। ताकतवर रसूखदारों के साथ संघर्ष का मुश्किल विकल्प, या उनसे सहानुभूति दिखाकर उनकी तरफ से लडऩे के लिए हथियार उठाने का दावा करने वालों के साथ हो लेना। अपने प्रतिनिधियों पर से भरोसा खो बैठे लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा उठ जाए तो इसमें अजीब कुछ नहीं।
इस देश में बहुत से पढऩे-लिखने वाले ऐसे हंै जो मानते हंै कि लोकतंत्र गरीबों के लिए नहीं है। यहां गरीब को इंसाफ मिलना मुश्किल है। क्योंकि तमाम हालात उसके खिलाफ हैं और अपनी तमाम कमजोरियों के साथ वे उनके खिलाफ वह नहीं लड़ सकते। लोकतंत्र को जितना खतरा माओवादियों, कट्टरपंथियों से है उससे कम खतरा ऐसे बेदरकार नेताओं और उनके कारण संवेदनहीन बन जाते तंत्र से नहीं है। अफसोस की बात यह है कि यह तबका इस असंतोष का रेला अपने पैरों तले बहकर आने तक नहीं जागता। चौकन्ने रहना, जनता के अधिकारों जरूरतों के लिए सोचना केवल कुर्सी पाने की फिक्र में जूझ रहे विपक्ष का काम नहीं है। सत्ताधारी दल भी अपने नेताओं के कामकाज के मूल्यांकन, उन्हें लोगों के प्रति संवेदनशील बनाने की पहल कर सकता है, और उसे करनी भी चाहिए। वरना आज स्विमिंगपूल से नेता को उठाकर ले जाने वाली जनता आपा खोने पर उसे पूल में डुबो भी सकती है। उपेक्षित, वंचित लोगों के पास जब गंवाने को कुछ नहीं रह जाता तो उनकी हताशा कोई भी सीमा पार कर सकती है। 

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