इंसानियत और हैवानियत

23 जून 2013
संपादकीय
उत्तराखंड से आने वाली खबरें दिल दहलाना बंद ही नहीं कर रही हैं। पहले तो कुदरत के नुकसान से लाशों की खबरें, लापता लोगों की खबरें आती रहीं, और बहुत से आस्तिक यह सोचते रहे कि ईश्वर के घर पर जो लोग पहुंचे थे, पहुंचकर लौट रहे थे, या वहां जा रहे थे, उनके साथ ईश्वर ने ऐसा क्यों किया? लेकिन जो नास्तिक थे, वे जानते थे कि ईश्वर को ऐसे हादसों से, ऐसी बेकसूर मौतों से कभी परहेज नहीं रहा, और जिंदगी और मौत में मंदिर-मस्जिद या तीर्थ का कोई दखल नहीं रहता। ऐसे भी कोई सुबूत नहीं है कि ईश्वर के दरबार में पहुंचकर इस तरह जान गंवाने वाले लोग सीधे स्वर्ग जाते हैं। जो मर चुके हैं वे कहां गए हैं इसका अंदाज लगाना तो मुश्किल है, लेकिन उत्तराखंड में जो लोग जिंदा बचे वे वहां के इंसानों के हाथों लूट और बलात्कार के जिस तरह शिकार हो रहे हैं, उससे यह समझ आता है कि ऐसा तीर्थ भी उनको इसी धरती के ऐसे नर्क से नहीं बचा सकता। 
बहुत से लोगों ने चूंकि लूट के बयान दिए हैं, वहां की पुलिस ने लोगों से लूट की रकम और गहने बरामद किए हैं, और ऐसे लुटेरों में वहां के कुछ साधु और कुछ पुजारी भी होने की खबर है। वैसे भी पूरे का पूरा उत्तराखंड तीर्थों से भरा हुआ है, और उससे यह संभावना बनती है कि वहां के लोग आस्तिक अधिक होने चाहिए। पहाड़ों पर लोग आमतौर पर मेजबानी के लिए भी जाने जाते हैं और वहां आने वाले लोगों की खातिर अच्छे से होती है। लेकिन इसके बीच जब वहां धंसे हुए, और फंसे हुए लोगों को लूटने का मौका मिला, तो बहुत से लोगों ने लूटना शुरू कर दिया, भयानक खबरें तो यह भी हैं कि जिंदा लोगों के हाथ काटकर लोगों ने गहने लूटे, दबे हुए लोगों को निकालने के बजाय उनके सामान लूटे और चले गए। जिन लोगों को इंसानियत शब्द से ऐसी खुशफहमी होती है कि इंसानियत सिर्फ अच्छी खूबियों वाली कोई चीज है, और उससे परे की खामियों वाली तस्वीर को हैवानियत कहा जाता है, उनको यह समझ लेना चाहिए कि आज उत्तराखंड में जो हो रहा है वह पूरी तरह से इंसानियत ही है। इंसान अपने भीतर की खामियों को छुपाने के लिए उनके साथ हैवानियत शब्द जोड़ देते हैं, लेकिन हैवान नाम की कोई चीज नहीं होती, और इंसान के भीतर ही उसका एक हिस्सा ऐसी खामियों वाला, ऐसी हिंसा वाला होता है। सच तो यह है कि इंसान कानून के डर से, समाज के डर से, और जवाबी हिंसा के डर से खूबियों वाला बना रहता है, उसका बस चले तो वह अपने मतलब के लिए, अपने फायदे के लिए सारी खामियों पर चलता रहे। 
उत्तराखंड में मरते हुए लोगों के साथ लोग जिस तरह की हिंसा कर रहे हैं, वह इंसानों के भीतर की एक बहुत ही प्राकृतिक, और स्वाभाविक हिंसा है, जिसे लोग बड़ी मुश्किल से दबाकर रखते हैं। जब कभी बिना किसी गवाह अपने फायदे का जुर्म करने का मौका मिलता है, लोग उसमें जुट जाते हैं। इसलिए किसी को भी इंसानों पर ऐसा कोई भरोसा नहीं करना चाहिए, जिसका झांसा इंसानियत शब्द से, मानवीयता शब्द से बनता है। मरते-दम तोड़ते लोगों को लूटने में कुछ भी अटपटा नहीं है। और कोई अगर यह सोचता होगा कि आस्तिक लोग ऐसी हिंसा नहीं कर सकते, तो दुनिया में ऐसे बहुत से सामाजिक शोध हुए हैं जिनमें आस्तिक ही अधिक हिंसक साबित हुए हैं, क्योंकि उनके पास ईश्वर के दरबार में जाकर अपनी आत्मग्लानि को धो लेने की सहूलियत रहती है। उत्तराखंड को तो देवभूमि कहा जाता है, और कहने वाले ऐसी हरकतों को दैत्य या राक्षस की हरकतें कहेंगे, इसका सर्वे होना चाहिए कि ऐसा जुर्म करने वाले लोग आस्तिक हैं, या नास्तिक।

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