आस्था से सवाल का मौका

संपादकीय
27 जून 2013
केदारनाथ में फंसे तीर्थयात्रियों को बचाने के लिए सबसे पहले वहां पहुंचने वाले बचाव दल के लोग ही मारे गए। भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्टर में वहां पहुंचे वायुसैनिक, आईटी बीपी के जवान और एनडीआरएफ के जवान हफ्ते भर चौबीसों घंटे वहां लगे रहे, घायलों को बचाते रहे, लाशों के आस-पास सोते रहे। मंदिर से लाशें हटाईं और कीचड़ साफ किया। इस टीम ने शायद सबसे अधिक बीस हजार लोगों को बचाने में हिस्सा बंटाया। और केदारनाथ से बचाव पूरा हो जाने पर इसे लौटने की छुट्टी मिली। लौटते हुए हेलिकॉप्टर दुर्घटना में ये सारे लोग खत्म हो गए।
आज यह मुद्दा और यह मौका यह सोचने का है कि यह दुनिया जिस ईश्वर की बनाई बताई जाती है, जिसका पत्ता भी उसकी मर्जी के खिलाफ नहीं हिलता, उसका हकीकत में दुनिया में क्या दखल है? यह सोचना और समझना जरूरी इसलिए है क्योंकि दुनिया आस्थावानों, आस्तिकों से भरी हुई है और वे अपने तन-मन के बाहर भी इस आस्था को दूसरों पर भारी इस्तेमाल करते हैं। ईश्वर की धारणा और उस पर आस्था लोगों को पिछले जन्म और अगले जन्म से जोड़ती है, स्वर्ग और नर्क बताती है, पाप और पुण्य की फेहरिस्त टांगे रखती है। नतीजा यह होता है कि भारत जैसे देश में शायद तीन-चौथाई आबादी ईश्वर की किसी-न-किसी धारणा के साथ जाती है। यह सोच लोगों को कई किस्म के लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण संघर्षों से रोकती है। धर्म की आड़ में बड़े-बड़े मुजरिम दानदाता कहे जाते हैं और धर्मगुरूओं के इर्द-गिर्द मुजरिमों का जमावड़ा रहता है। प्रायश्चित की सहूलियत धर्म उपलब्ध कराता है, और ईश्वर के नाम को धर्म ही चलाता है, पापियों को भी।
ऐसे में आज यह तो सोचें कि कीचड़ में डूबी ईश्वर की प्रतिमा को साफ करने से लेकर उसके दसियों हजार भक्तों को बचाने तक के काम के हफ्ते भर तक रात-दिन करने वालों को ऐसी मौत इस ईश्वर ने क्यों दी? क्या इसका कोई जवाब आस्थावानों के पास हो सकता है? जो हजारों लोग इस तीर्थ को आते-जाते मर गए या लापता हैं, उनको सक्रिय-आस्थावान होने के बाद भी क्यों ऐसी सजा पा रहे हैं? सिर्फ बद्री-केदार नहीं, हज जाने वाले भी भगदड़ में एक बार में सैकड़ों, कई-कई बार मारे जा चुके हैं। ऐसे भी ईश्वर की दखल कहा जाता है? और अगर उसकी कोई दखल है ही नहीं, तो फिर, उसका नाम लेकर दुनिया की जिंदगी में इतनी बड़ी और इतनी हिंसक दखल क्यों दी जाती है? वैटिकन को एक देश का दर्ज क्यों दिया जाता है? धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने के नाम पर सजा क्यों दी जाती है? ईशनिंदा पर मौत की सजा का इंतजाम क्यों है? क्यों एक धर्म की धारणा और मान्यता दूसरे धर्म का खून रात-दिन बहाती हैं?
ऐसे अनगिनत सवालों के किसी जवाब के बिना लोकतंत्र के कानून में भी धर्मों को, उनकी मान्यताओं को दूसरों के बुनियादी हकों ऊपर दर्जा मिलता है। धर्म लोगों की जिंदगी को रौंदते हुए अपनी मान्यताओं से हत्याएं करते हैं, और उनके ईश्वर उसी तरह चुपचाप सब देखते रहते हैं जैसा कि अभी उत्तराखंड की पहाडिय़ों के ऊपर का ईश्वर देखता रहा। दरअसल ईश्वर को लेकर हमारे मन में कोई दुविधा नहीं है। समाज के ताकतवर लोगों ने कमजोर तबकों का शोषण करने के लिए, उन पर राज करने के लिए, ईश्वर और धर्म की धारणा खड़ी की, और फिर उसे हर दौर के शासक अपनी सहूलियत के लिए इस्तेमाल करते रहे। ईश्वर की इस धारणा ने कमजोर लोगों को इस जन्म में अपनी तकलीफों के लिए, उनके साथ होती आर्थिक-सामाजिक बेइंसाफी के लिए, पिछले जन्म में किए पापों पर निर्भर रहने को मजबूर कर दिया। और मजा यह रहा कि इस मजबूरी का आस्तिक लोग मजा भी लेते हैं। 
आस्था लोगों के मन के भीतर रहती तो भी कोई दिक्कत नहीं हुई होती। इस दुनिया का इतिहास बताता है कि तमाम जंग मिलकर भी जितने कत्ल नहीं कर पाईं, उससे अधिक कत्ल धर्म ने करवाए हैं। समाज में ईश्वर की धारणा की हकीकत समझने की जरूरत है। आस्थावान लोग इस तबाही और इन मौतों पर सोचें, और फिर अपनी जिंदगी के सड़क-पुल खुद बनाएं। 

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