वे दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था...

संपादकीय
15 जून 2013
भारत में राजनीति के बारे में गालियों की जुबान में बात करने वाले लोग कई बार कहते हैं, कि राजनीति बहुत कुत्ती चीज होती है। एक तो दुनिया की अधिकतर जुबानों में जानवरों के लिए भारी हिकारत है, और कुत्ते-कुतिया का नाम गालियों की तरह इस्तेमाल किया जाता है। उसमें भी मादा जानवर को और अधिक बड़ी गाली के लायक माना जाता है। इसलिए जब भारत में राजनीति को लोग भारी-भरकम गाली देने के लायक मानते हैं, तो बेवफाई के लिए मशहूर इंसानी कौम सबसे वफादार समझे जाने वाले प्राणी का नाम गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। और आज पटना से लेकर दिल्ली तक वफा और बेवफा पर जितने किस्म की शेर-शायरी चल रही है, वह इंसानों के असली मिजाज को बता रही है। सत्रह बरस पुराने रिश्ते जब टूट रहे हैं, तो भाजपा और जदयू के बीच मीडिया के कैमरों के सामने जिस तरह की जुबान में बात हो रही है, उसे सुनकर इंसानों से परे के वफादार नस्ल के सारे नर और मादा मुस्कुरा रहे होंगे। 
दरअसल जब रिश्ते टूटते हैं, और दिल फटते हैं, राहें अलग होती हैं, तो बीते बरस या बीती पूरी जिंदगी की बातें लोगों को नई तल्खी के साथ सूझती हैं। जदयू के शिवानंद तिवारी आमतौर पर समझदारी की बात करते सुनाई पड़ते हैं, लेकिन आज उनका बयान आता है कि इस तरह भाजपा अछूत थी, और जदयू के साथ आने की वजह से अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन पाए थे। अब डेढ़ दशक पहले के अछूतोद्धार के एहसान को आज गिनाकर तिवारीजी अपने ही कद को कम कर रहे हैं। यह मामला कुछ उसी तरह का है कि जब कोई बहू दहेज प्रताडऩा की रिपोर्ट लिखाती है, तो ससुराल के लोगों को वह बदचलन लगने लगती है, जब कोई नौकर नौकरी छोड़ता है, तो मालिक को वह चोर लगने लगता है, जब मालिक किसी नौकर को निकालता है, तो नौकर को मालिक लूटने वाला लगने लगता है। जब शादीशुदा आदमी और औरत के बीच तलाक होने लगता है, तो पसीने की गंध खटकने लगती है, छोटी-छोटी बातें बड़ी-बड़ी शिकायत बनकर सामने आने लगती हैं। 
 आज भाजपा और जदयू के बीच वही हाल चल रहा है। जो नीतीश कुमार आज भाजपा के नरेन्द्र मोदी को साम्प्रदायिकता का पिशाच करार दे रहे हैं, वही नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए हजारों मुसलमानों के कत्लेआम के लिए गुनहगार ठहराए जा रहे थे, तब नीतीश कुमार बहुत मजे में दिल्ली में बैठे उसी एनडीए की सरकार के मातहत रेलगाड़ी चला रहे थे। उस वक्त वे उसी केन्द्रीय मंत्रिडल के सदस्य थे, जिस पर देश के किसी राज्य में सत्ता की मेहरबानी से ऐसा भयानक साम्प्रदायिक मानवसंहार होने पर वहां की सरकार को बर्खास्त करने की जिम्मेदारी भी थी। उस वक्त नीतीश कुमार कुर्सी पर बने रहे, सरकार में बने रहे, और एनडीए की पूरी सरकार हार जाने तक बने रहे। आज वे साम्प्रदायिक नरेन्द्र मोदी के मुद्दे पर अपने हाथों तिलक लगाकर शहीद का दर्जा पा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी उस वक्त की एनडीए के मातहत मुख्यमंत्री के रूप में जदयू को मंजूर थे, अब प्रधानमंत्री के रूप में मंजूर नहीं हैं? तो क्या उस वक्त गुजरात में जला और काट दिए गए हजारों मुसलमानों के प्रति नीतीश कुमार वाले केन्द्रीय मंत्रिमंडल की जिम्मेदारी कुछ कम थी? और आज एनडीए के भागीदार के रूप में वह जिम्मेदारी बढ़ गई है? मोदी लहू सने सीएम के रूप में मंजूर था, और आज दस बरस बाद बिना किसी नए जुर्म के वह भावी पीएम-प्रत्याशी के रूप में नामंजूर है? शायद राजनीति के ऐसे ही विरोधाभासों और ऐसी ही विसंगतियों के चलते उसे तरह-तरह की गालियां दी जाती हैं, और वफादार जानवरों को नाहक ही बदनाम किया जाता है। जानवरों में से भला कौन ऐसे रहते हैं जो कि अपने गिरोह में दूसरों को शामिल करने के लिए मंत्री पदों का चारा दिखाते हों, या बोटियां दिखाते हों? ये सारी हरकतें तो इंसान ही करते हैं, और आए दिन करते हैं। 
फिलहाल हम बड़ी दिलचस्पी से यह देख रहे हैं कि नीतीश कुमार या उनके दूसरे साथियों को 2002 के गुजरात दंगों की याद अब और कितनी आती है, मोदी के हाथों पर उनको कितना लहू दिखता है। बरसों से हमबिस्तर चले आ रहे भाजपा और जनता दल यूनाइटेड को एक-दूसरे की देह की कौन-कौन सी बरसों पुरानी गंध अब खटकती है, यह देखना दिलचस्प होगा। ऐसे ही मौके के लिए किसी ने कभी लिखा था- वे दिन हवा हुए, जब पसीना गुलाब था...।

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