संपादकीय
14 जून 2013
आज जब भारत सरकार अमरीका से इस बात की पूछताछ कर रही है कि इंटरनेट-जासूसी में भारत के कौन-कौन से राज अमरीका ने हासिल किए हैं, उसी वक्त मुंबई की खबर आ रही है कि वहां के पुलिस अफसरों के बैंक खातों को कुछ साइबर-मुजरिमों ने हैक कर लिया, और उनकी तनख्वाह के पैसे निकाल लिए। देश के सबसे बड़े शहर के पुलिस के अफसरों से अपने खातों को लेकर बहुत लापरवाही हुई होगी ऐसा नहीं लगता। दूसरी तरफ अमरीका लगातार चीन पर यह आरोप लगा रहा है कि वहां बैठकर हैकर अमरीकी सरकार और सेना के कम्प्यूटरों में घुसपैठ कर रहे हैं और जानकारी चुरा रहे हैं। तीसरी खबर जो सबसे अधिक छाई हुई है, वह है एक अमरीकी कम्प्यूटर-कामगार के जानकारी चुराने की, और अमरीकी सरकार द्वारा नागरिकों की खुफिया निगरानी करने का भांडाफोड़ करने की। इस बीच विकीलीक्स के संस्थापक जूलियस असांज के बयान भी खबरों में हैं जिसमें उन्होंने इस अमरीकी भांडाफोड़ करने वाले को बधाई दी है और यह भी कहा है कि जब वे (जूलियस असांज) भारत में शरण चाहते थे तो भारत सरकार ने उन्हें शरण नहीं दी थी।
इन सारी खबरों से कुल मिलाकर जो तस्वीर बनती है वह यह कि दुनिया भर के कम्प्यूटर, सेनाओं और खुफिया एजेंसियों की जानकारियां, और लोगों के निजी बैंक खाते या ईमेल जैसे अकाउंट, ये सारे के सारे किस कदर नाजुक हैं। इनमें कभी भी घुसपैठ हो सकती है, इनकी जानकारी चोरी हो सकती है, और कम्प्यूटर-इंटरनेट पर टिकी हुई कोई भी व्यवस्था किस तरह से चौपट की जा सकती है। भारत में आज अगर देखें तो इस पर चीन या अमरीका जैसे देश की साइबर-सेना, या दुनिया का कोई साइबर-आतंकी संगठन मामूली सी कोशिश से ऐसा हमला कर सकते हैं जिससे कि इस देश के ट्रेन और प्लेन के सारे रिजर्वेशन, बैंकों के खाते, एटीएम से रूपए निकालना, इंटरनेट और टेलीफोन, एसएमएस और ईमेल, इन सबको पूरी तरह तबाह किया जा सकता है, और उस हालत के लिए यह देश तैयार हो ऐसा नहीं लगता। दूसरी तरफ तबाह करने से परे आज भी भारत के निजी और सरकारी कम्प्यूटर नेटवर्कों में दुनिया भर से कैसी-कैसी घुसपैठ हो रही है, इसकी इस देश में कोई चर्चा नहीं होती, क्योंकि शायद इस देश की सरकार अपनी कमजोर तैयारी और बचाव को उजागर नहीं होने देना चाहती। लेकिन यही ऐसा मौका रहता है जब किसी देश-प्रदेश को, बाजार-कारोबार को, और लोगों को सारे कम्प्यूटर और संचार व्यवस्था के बिना अपनी जिंदगी का एक दिन चलाने की कल्पना करनी चाहिए और देखना चाहिए कि वे कौन-कौन से काम नहीं कर पाएंगे, कौन-कौन से काम कैसे कर पाएंगे।
आज जब सरहदों को लेकर दुनिया भर की सरकारें बड़ी चौकन्ना रहती हैं, और फौजी साज-सामान की खरीददारी पर देश के बजट का खासा बड़ा हिस्सा खर्च किया जाता है, तब इस बात की शायद अनदेखी हो रही है कि देश के भीतर एक साइबर हमला करके किस तरह पूरे देश में बदअमनी, अराजकता फैलाई जा सकती है, रोजाना की जिंदगी ध्वस्त की जा सकती है, जनता का विश्वास सरकार और बैंकों पर से खत्म किया जा सकता है, मुसीबत के वक्त लोगों को फोन से मरहूम किया जा सकता है, और यहां तक कि किसी देश की फौजी तैयारियों वाले कम्प्यूटरों को ध्वस्त करके सरहदों को खतरे में डाला जा सकता है। ऐसे साइबर हमले को किसी देश की सरहद से दूरबीन से, आसमान में टंगे उपग्रह से, और टोही हवाई जहाजों से देखा भी नहीं जा सकेगा। ऐसे हमले बंद कमरों से कब हो जाएंगे, यह पता तभी लगेगा जब सरकारों की और लोगों की निजी, गोपनीय, खुफिया या फौजी तैयारियों की जानकारी उसी तरह इंटरनेट पर बिखरी हुई मिलेगी जिस तरह एक अकेले विकीलीक्स ने अमरीकी दूतावासों की चि_ियों को करोड़ों की संख्या में इंटरनेट पर मुफ्त में बांट दिया है। यह सिलसिला अगर समाज के लोगों की निजी जिंदगी को उजागर करने के लिए एक संगठित अपराध और संगठित सामाजिक हमले के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, तो लोगों के चौकन्ना रहना शुरू करने के पहले-पहले समाज का बड़े पैमाने पर विघटन किया जाना भी हो सकता है। जब लोगों का सरकार पर से भरोसा उठ जाएगा, परिवार के लोगों का परिवार के बाकी लोगों पर से, कारोबारियों का एक-दूसरे से, एक देश का दूसरे देश पर से, तो फिर दुनिया का ढांचा चरमरा जाएगा। हमारा अंदाज यह है कि तीसरा विश्वयुद्ध जमीन पर न लड़ा जाकर इंटरनेट पर लड़ा जाएगा, और हर किस्म की महत्वपूर्ण जानकारी की लाशें चारों तरफ बिखरी दिखेंगी।

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