16 जून 2013
संपादकीय
बिहार के आज के माहौल को लेकर पिछले दो दिनों से एक मुद्दा यह भी उठ रहा है कि अगर गठबंधन के तहत कोई चुनाव लड़ा गया था, तो उसकी सरकार में से किसी एक पार्टी के बाहर होने पर, दुबारा चुनाव के लिए जाना चाहिए, या फिर जो पार्टी सत्ता में बची है उसे काम जारी रखने का नैतिक अधिकार होना चाहिए। दरअसल भारतीय चुनावी लोकतंत्र में इस किस्म की बहुत सी स्थितियों पर तीन अलग-अलग बातें लागू होती हैं, नैतिकता, संवैधानिकता और राजनीति। इनमें से नैतिकता की जगह अब राजनीति से निकलकर शब्दकोश में चली गई है। संवैधानिकता लोगों को और पार्टियों को इस बात की इजाजत देती है कि वे थोक में दलबदल करके सरकार गिरा दें, या बचा लें। संवैधानिकता इस बात की इजाजत भी देती है कि पकड़ में आए बिना सांसदों या विधायकों को खरीदकर सरकार बचा ली जाए, या बना ली जाए। संविधान को ऐसी किसी नौबत से परहेज नहीं है। इसलिए नीतीश कुमार के सामने ऐसी कोई अड़चन नहीं है कि वे अल्पमत की सरकार न चला सकें, या फिर कांगे्रस की बाहरी या भीतरी मदद लेकर सरकार को न बचा सकें। जहां तक नैतिकता की बात है, तो उस बिना पर अगर सरकारें आती-जाती रहें, और नए चुनाव होते रहें, तो पांच बरस के हर दिन चुनाव आचार संहिता लागू रहेगी। इसलिए नैतिकता सस्ती नहीं आती, और खासे महंगे चुनाव लेकर आती है, और भारत जैसा लोकतंत्र उतनी नैतिकता बर्दाश्त नहीं कर सकता। और अब आखिरी बात रह जाती है राजनीति की, तो उसके बारे में दुनिया का इतिहास यह लिखते आया है कि राजनीति बड़े नामुमकिन किस्म के हमबिस्तर एक कर देती है। कब कौन इसके साथ हो लेते हैं, और कब कौन अलग हो लेते हैं, इस पर कोई नीति-सिद्धांत लागू नहीं होते। इसलिए बिहार की जनता के चुने हुए गठबंधन को खत्म करने पर नीतीश कुमार जनता के साथ ऐसी कोई गद्दारी नहीं कर रहे हैं, जो पूरे देश में, हर प्रदेश में अधिकतर पार्टियां, अधिकतर समय नहीं करती रहतीं।
कल कांगे्रस पार्टी की तरफ से एक बड़े बयान में यह कहा गया था कि नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्ष रहते हुए एक गलत पार्टी में थे। लोगों को याद होगा कि अटलबिहारी वाजपेयी के बारे में भी समय-समय पर राजनीति के जानकार एक नारे की तरह यह लिखते थे कि वे एक बुरी पार्टी में एक भले आदमी थे। कुछ लोग उन्हें एक कट्टरवादी पार्टी में उदारवादी नेता मानते थे, और कुछ लोग उन्हें भाजपा का मुखौटा भी लिखते थे। इन तमाम बातों का कोई मतलब इसलिए नहीं रहता कि भारतीय राजनीति की जमीनी हकीकत ऐसे सारे मुखौटों को समय-समय पर उतार देती है, और बता देती है कि 2002 में मोदी को किस-किसने बर्दाश्त किया था। उस लिस्ट में वाजपेयी का नाम भी था, अडवानी का नाम भी था, और नीतीश कुमार का नाम भी था। आज लालू यादव यह बात ठीक याद दिला रहे हैं, कि उस वक्त एनडीए सरकार को जिस तरह रामविलास पासवान ने गुजरात के मानवसंहार के मुद्दे पर छोड़ा था, उस वक्त तो नीतीश कुमार सरकार के मंत्री ही बने रहे थे। इसलिए आज नैतिकता की दुहाई बोगस है। नीतीश कुमार की आज की धर्मनिरपेक्षता भेड़ की खाल की तरह की है, जिसे लोग अपनी सहूलियत से जुटा लेते हैं, और इस्तेमाल कर लेते हैं। और आज एनडीए को टूटते हुए देखने के लिए कांगे्रस को अचानक नीतीश कुमार गलत गठबंधन में फंसे हुए सही धर्मनिरपेक्ष लगने लगे हैं।
जिन लोगों को भारतीय राजनीति में नैतिकता और सिद्धांतों को देखना हो, उनके लिए सिर्फ एक पार्टी बचती है, वामपंथी पार्टियां। इससे परे दूसरी पार्टियों और गठबंधनों में भेड़ की खाल को तैयार रखा जाता है, रामलीला सरीखे मुखौटों को तैयार रखा जाता है, और रोज सुबह उनका इस्तेमाल तय किया जाता है। बिहार के आने वाले दिन कांगे्रस और नीतीश कुमार की गलबहियां देख सकते हैं, और लालू यादव नीतीश कुमार के सारे विरोधाभासों को उजागर करते रह सकते हैं।

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