29 जून 2013
संपादकीय
भारत का मीडिया इन दिनों एक खबर में दिलचस्पी ले रहा है कि फिल्म कलाकार शाहरूख खान और उनकी पत्नी गौरी अपने तीसरे बच्चे के एक किराए की कोख के रास्ते ला रहे हैं। और जांच में इस बच्चे के लड़के या लड़की होने की खबरें चर्चा में आईं, तो किसी ने उनके खिलाफ भू्रण-लिंग परीक्षण करवाने की शिकायत भी कर दी। इस जोड़े के दो बड़े बच्चे पहले से हैं, और यह तीसरा बच्चा, या बच्ची इस तकनीक से वे पा रहे हैं।
आज यहां पर इस जोड़े के बारे में लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, लेकिन भारत जैसे बहुत ही गैरबराबरी वाले समाज में जब बहुत जटिल और महंगी चिकित्सा सुविधा का इस्तेमाल बहुत ताकतवर लोग सरकारी या निजी पैसों से करते हैं, तो इसका एक मतलब यह भी होता है कि देश का चिकित्सा ढांचा ऐसे गिने-चुने लोगों पर खासा खर्च होता है। लोग खूबसूरती के लिए प्लास्टिक सर्जरी करवाते हैं, बदन की चर्बी कम करवाने के लिए कई किस्म के ऑपरेशन करवाते हैं, चेहरों के दाग हटवाते हैं, और जैसा कि इस मामले में हो रहा है, एक महंगी और लंबी मेडिकल तकनीक से वे ऐसे बच्चे पाते हैं। भारत की उदार अर्थव्यवस्था में हर किसी को अपनी मर्जी का खर्च करने की आजादी है। और इसमें खर्च करके मनचाही तकनीक से मनचाहे बच्चे पाने की आजादी भी है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि भारत, या बाकी दुनिया में भी, जहां भूख है, जहां बीमारी है, वहां पर सीमित खाना और सीमित इलाज कहां पर कितना इस्तेमाल हो रहा है? अमरीका में खाने के बाद बचे हुए अनाज से दैत्याकार निजी गाडिय़ों के लिए ईंधन बनाया जाता है, लोग अपने बदन के लिए बहुत किस्म की दवाईयां खाते हैं, जरूरत से अधिक खाकर, फिर जरूरत से अधिक बिजली जलाकर बदन को ठीक रखते हैं, और इसी वक्त दुनिया के बहुत से गरीब हिस्सों में लोग भूखे सोते हैं, उनके बच्चे कुपोषण से मर जाते हैं, और बिना बिजली अंधेरे में जीते हैं।
दुनिया में धरती की दी हुई चीजों का ऐसा अनुपातहीन बंटवारा पूंजीवादी और उदारवादी अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है। एक तरफ भूख, बीमारी, और अंधेरा, दूसरी तरफ मोटापा, खूबसूरती के लिए इलाज, और चर्बी छांटने को एयरकंडीशन व्यायामशालाओं का इस्तेमाल। यह फासला एक गहरी और चौड़ी खाई की तरह पहले तो दुनिया के संपन्न देशों और गरीब देशों के बीच बढ़ता है, फिर अपने-अपने देश के भीतर संपन्न और विपन्न लोगों के बीच बढ़ता है। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक दलों और सरकारों में जनहित और जनकल्याण की अपनी जवाबदारी खत्म कर ली है, और इसके चलते अब ऐसे फासले घटने की कोई गुंजाइश नहीं है। दूसरी तरफ जहां कहीं ऐसा लगता है कि ऐसी असमानता के चलते हिंसक और हथियारबंद संघर्ष होंगे वहां पर सरकार और बाजार मिलकर पूंजीवाद की ऐसी फौज खड़ी कर लेते हैं कि जिनका मुकाबला हक न पाए हुए तबके प्रतीकात्मक हथियारबंद संघर्षों से कर भी नहीं पाते।
भारत की बात करें तो यहां पर एक तरफ तो संपन्न तबका अपने किसी भी तरह के खर्च को, और अपनी कितनी भी खपत को अपना हक बताता है, और दूसरी तरफ जनता के पैसों पर पलने वाली सत्ता पर काबिज हो चुके लोग इसी पैसे से करोड़पतियों और अरबपतियों को टक्कर देने वाले खर्च करते हैं। यही वजह है कि सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की बदहाली है, सरकारी अस्पतालों में कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और जनता के पैसों से सत्ता हांकते लोग अपना इलाज महंगे से महंगे निजी अस्पतालों में करवाते हैं। शाहरूख खान तो अपनी कमाई से किसी भी तरह के अस्पताल की कितनी भी क्षमता का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन जब इसी टक्कर के खर्च इस देश में सत्ता अपने पर करती है, तो सरकारी अस्पतालों की मोहताज जनता पर रहम आता है। शाहरूख खान ने तीसरे बच्चे के लिए जैसी तकनीक का सहारा लिया, या लोग जिस तरह चर्बी और पेट छंटवाते हैं, वैसी तकनीक और चिकित्सा क्षमता से शायद बहुत से बच्चों के कटे हुए होंठ जुड़ सकते हैं, लोगों की दूसरी जानलेवा तकलीफें दूर हो सकती हैं। और ऐसे महंगे इलाज से बच्चा पाने के बजाय एक ऐसी समझ भी देश में विकसित की जा सकती है जिससे कि देश में बिना मां-बाप के रह गए बेसहारा बच्चों को गोद लेना भी हो सके। जब बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोग कोई काम करते हैं तो उसकी मिसाल बहुत से दूसरे लोगों के भी काम आती है। इसलिए लोगों के निजी जिंदगी के फैसलों से परे भी हमको यह लगता है कि एक सामाजिक सरोकार को आगे बढ़ाने का काम भी ऐसे मौकों पर शाहरूख खान जैसे लोग कर सकते थे, कर सकते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें