ओबामा का भारत आना, दोनों देशों की जरूरत

25 जनवरी 2015
संपादकीय 

भारत के गणतंत्र दिवस पर पहली बार अमरीकी राष्ट्रपति का आना हो रहा है। बराक ओबामा के आने का समाचार-महत्व इसलिए भी अधिक है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस ओहदे पर आने के पहले तक लगातार अमरीकी वीजा मनाही झेलते रहे थे और यह अहमियत इसलिए भी अधिक है, क्योंकि बराक ओबामा और नरेन्द्र मोदी दोनों के बचपन एक ही किस्म की गरीबी, एक ही किस्म के अभाव वाले रहे, और इन दोनों की ऐसी तुलना भी आम लोगों का ध्यान खींचती है। 
वैसे तो भारत और अमरीका के रिश्ते मोदी के आने के पहले मनमोहन सिंह के 10 वर्षों में सबसे अधिक गहरे रहे। यह गहराई झूठ की हद तक चली गई थी, जब दुनिया के सबसे बड़े हमलावर जॉर्ज बुश से भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत की जनता उनको बहुत प्यार करती है। हकीकत तो यह है कि भारत की एक फीसदी से भी कम जनता का अमरीका से कोई सीधा वास्ता पड़ता है, और वैसे सम्पन्न तबके को छोड़ दें, तो अधिकतर आबादी का अमरीका से कोई लेना-देना नहीं है। भारत की आबादी में 10 फीसदी से अधिक मुस्लिमों के पास अमरीका से नफरत करने की ठोस वजहें हैं, और भारत के समझदार तबके में भी अमरीका की नीतियों के खिलाफ भारी हिकारत है। इसीलिए मनमोहन सिंह पूरी तरह झूठा एक सर्टिफिकेट भारतीय जनता की तरफ से अमरीकी राष्ट्रपति को दे आए थे, और तब और अब में फर्क महज यही है कि मनमोहन सिंह के गंभीर व्यक्तित्व के मुकाबले मोदी का दमदार व्यक्तित्व सिर चढ़कर बोलता है। 
खैर, अमरीका दुनिया की एक हकीकत है, और दुनिया का आने वाला कल अमरीका के और अधिक कब्जे में रहना भी तय है। भारत की सरहदों पर जो खतरे हैं, उनको देखते हुए अमरीका से गहरे रिश्तों की जरूरत को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। इसके अलावा भारत की अर्थव्यवस्था, भारत का परमाणु कार्यक्रम, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जरूरतें, ऐसी अनगिनत बातें हैं, जिनकी वजह से अमरीकी राष्ट्रपति भारत के लिए दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। ऐसे में मोदी और ओबामा के बीच सुर्खियों में छाई हुई एक अलग दर्जे की दोस्ती की चर्चा हकीकत से कुछ अधिक होती है। इसकी एक वजह भी है। गुजरात दंगों के बाद से मोदी को अमरीकी वीजा न देकर अमरीका ने उनके लिए जो रूख दिखाया था, वह मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस ओहदे की वजह से अपने आप ही बदल गया, और बरसों से इन दो देशों के बीच टंगा हुआ यह तनाव खत्म हुआ, तो एकदम गले मिलने में तब्दील हो गया। 
नरेन्द्र मोदी की सरकार की आर्थिक नीतियां, भारत की आज की कारोबारी जरूरतें, इनकी वजह से ही बराक ओबामा का भारत आना बहुत महत्व रखता है। और इन दो देशों के नेताओं के बीच व्यक्तिगत पसंद से, या की दोनों देशों के आपसी मजबूरियों के चलते, जिस वजह से भी रिश्ते गहरे हैं, वे अच्छी बात ही हैं। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस रफ्तार से विदेशी संबंधों के मोर्चे पर सरगर्मी दिखाई, वह पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाली बात थी। गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के अलावा नरेन्द्र मोदी का केंद्र सरकार के कामकाज से, अंतरराष्ट्रीय संबंधों से कभी कोई लेना-देना नहीं था। ऐसेे में मोदी ने जिस तरह दुनिया के देशों और नेताओं के बीच भारतीय प्रधानमंत्री और भारत की एक नई तस्वीर बनाई है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय कानूनों का एक नर्म और रंगीन गुलदस्ता पेश किया है, उसके चलते मोदी इन महीनों में दुनिया के चहेते प्रधानमंत्री भी बने हैं, और यही वजह है कि ओबामा सहित दूसरे बहुत से विश्व नेता उनको गंभीरता से ले रहे हैं, उनके बारे में अच्छी बातें कह रहे हैं। फिर हिंद महासागर के इस इलाके में चीन के पड़ोस में, पाकिस्तान के पड़ोस में, दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश होने की वजह से, अमरीकी बाजार का एक सबसे बड़ा ग्राहक होने की वजह से, अमरीका के लिए भी भारत की बड़ी अहमियत है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अगर अमरीका को आतंक पर हमला बोलना है, तो पड़ोस के भारत से अच्छे रिश्ते बताकर ही वह पाकिस्तान पर एक दबाव बना सकता है। अंतरराष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय संबंधों में ऐसा बहुत सा शक्ति संतुलन चलता है, और भारत के लिए अमरीका का सकारात्मक रूख उसकी ऐसी जरूरतों पर भी टिका हुआ है। 
आने वाले दो-चार दिन ओबामा की भारत यात्रा को लेकर बहुत सी खबरों के रहेंगे, और उनके बारे में फिर लिखने का मौका रहेगा। आज हम सिर्फ ओबामा के इस प्रवास के इस संदर्भ पर बात पूरी कर रहे हैं। 
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