केजरीवाल और किरण बेदी, खामियों के बावजूद नया झोंका

29 जनवरी 2015
संपादकीय

दिल्ली के विधानसभा चुनाव एक बड़ी अजीब बात लेकर सामने आए हैं। मुख्यमंत्री पद के दोनों बड़े दावेदार, और संभावित विजेता अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी अभी दो बरस पहले तक, या महीने भर पहले तक राजनीति में नहीं थे। दोनों ही सरकारी नौकरी से निकलकर आए हैं, दोनों ही कांग्रेस और भाजपा की राजनीति के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ सड़क का आंदोलन करते रहे, और दोनों ही कभी किसी राजनीतिक दल के सदस्य नहीं थे। केजरीवाल ने कोई दो बरस पहले आम आदमी पार्टी बनाई, और किरण बेदी एक पैराट्रुपर की तरह भाजपा में आसमान से उतरीं, और दिल्ली भाजपा के आधा दर्जन दिग्गज नेताओं के कंधों पर मुख्यमंत्री-उम्मीदवार बनकर खड़ी हो गईं। अब तक जितने चुनावी सर्वे आए हैं उनके मुताबिक कांग्रेस पार्टी के इस चुनाव के मुखिया, और पिछली कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे अजय माकन की चुनावी नतीजों में कोई जगह नहीं दिख रही है।
देश की सबसे बड़ी पार्टी दिल्ली में भी हाशिए पर चली गई है, और कुछ समय पहले तक देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही भाजपा आज चुनाव के कुछ हफ्ते पहले एक गैरराजनेता को आयात करके मुख्यमंत्री का दावेदार बना रही है। मतलब यह कि दिल्ली की करीब पौन सदी की राजनीति पूरी की पूरी धरी रह गई, दो बड़ी पार्टियां एक भी दावेदार पैदा नहीं कर सकीं, और एक पार्टी राजनीति में विदेशी मूल की किरण बेदी के सहारे चुनावी नदी पार करने पर मजबूर हुई है, और दूसरी पार्टी किसी किनारे पहुंचते दिख नहीं रही है। धूमकेतु की तरह अचानक राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल आज दिल्ली में सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री-प्रत्याशी माने जा रहे हैं, और उन्होंने स्थापित राजनीतिक दलों के स्थापित तौर-तरीकों को दिल्ली में तो चौपट कर ही दिया है।
अब अगर हम बाकी देश की बात सोचें, तो आन्ध्रप्रदेश में जयप्रकाश नाम के एक बुजुर्ग और वरिष्ठ आईएएस अफसर ने ईमानदारी के मुद्दे पर ही एक पार्टी बनाई थी, लेकिन वह चल नहीं पाई। आज अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी दिल्ली से परे भी भारतीय चुनावी राजनीति, भारतीय संसदीय राजनीति, भारतीय लोकतंत्र, और भारतीय जनजीवन में एक नए किस्म की संभावना पेश करते हैं। इनके भीतर भी उसी तरह के कई विरोधाभास हो सकते हैं, और हैं, जैसे कि किसी भी दूसरे नेता में हो सकते हैं, किसी भी दूसरी पार्टी में हो सकते हैं। लेकिन अगर स्थापित पार्टियों के चौथाई-चौथाई सदी से घिस रहे नेताओं से अलग दो नए चेहरे देश की राजधानी में अगर चुनावी मुकाबला कर रहे हैं, तो यह पूरे देश के लिए, राजनीति से नफरत न करने वाले भले लोगों के लिए एक अलग किस्म की संभावना है। यह एक अलग बात है कि बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां दिल्ली में इस तरह की दीवालिया क्यों साबित हो रही हैं कि एक को किरण बेदी नाम के तिनके का सहारा ढूंढना पड़ रहा है, और दूसरी पार्टी को किसी किनारे तक लग जाने के लिए कोई तरीका नहीं सूझ रहा है। दिल्ली में किरण बेदी को सिर पर बिठाकर भाजपा ने यही साबित किया है कि उसका इस राज्य का नेतृत्व, यहां के नेता, पार्टी की यहां की नौबत केजरीवाल नाम के एक नौजवान के मुकाबले खतरे में पड़ी हुई है। और केजरीवाल में सुर्खाब के ऐसे कोई पर नहीं लगे हुए हैं जो कि देश में दूसरी जगहों पर कुछ और लोगों के सिर पर न मिलें।
इसे देखते हुए अलग-अलग प्रदेशों में, लोगों को पंचायत से लेकर वार्ड तक, और विधानसभाओं से लेकर लोकसभाओं तक, चुनावों में बेहतर लोगों को लाने और बढ़ाने का काम करना चाहिए। ऐसा होने पर स्थापित और संगठित पुरानी पार्टियों का एकाधिकार टूटेगा, और उनका चाल-चलन भी सुधरेगा। आज एक अकेले केजरीवाल ने भारतीय राजनीति में कई तरह की चुनौतियां खड़ी की हैं, वे एक व्यक्ति के रूप में नाकामयाब हो सकते हैं, लेकिन एक मिसाल के रूप में उनका योगदान हो सकता है कि जगह-जगह भले लोग हौसला जुटाकर सामने आएं, और जीत-हार की फिक्र किए बिना चुनाव में उतरें। इससे राजनीति की गंदगी दूर होगी, राजनीति के बदन में नया खून आएगा, नई सोच आएगी। और कोई अगर यह सोचे कि कोई पार्टी अपने लोगों को भला बना देगी, तो यह गलत उम्मीद होगी। भले लोग आकर किसी बुरी पार्टी को भी भला बनाने की संभावना रखते हैं। किरण बेदी और केजरीवाल अपनी तमाम खामियों के बाद भी राजनीति में एक नया झोंका हैं, और देश भर में ऐसी छोटी-छोटी कोशिशें होनी चाहिए।

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