संपादकीय
30 जनवरी 2015
मनमोहन सरकार में पर्यावरण मंत्री रहीं जयंती नटराजन ने एक विस्फोट किया है, और राहुल गांधी पर सरकारी कामकाज में दखल का आरोप लगाते हुए कांग्रेस पार्टी छोड़ दी है। उन्होंने दर्जन भर दूसरे आरोप भी लगाए हैं कि किस तरह राहुल गांधी का दफ्तर उनको (जयंती) को बदनाम करने का काम करता था, सोनिया और राहुल उनकी बातों का जवाब नहीं देते थे, मिलने का वक्त नहीं देते थे। देश के बड़े-बड़े कारखानेदारों के लिए कांग्रेस और सोनिया-राहुल की पसंद-नापसंद से जयंती नटराजन को कैसे हुक्म मिलते थे, और किस तरह उन्हें देश के उद्योगों के बीच एक खलनायिका की तरह पेश किया गया था। आज सुबह से ही टीवी पर ऐसी खबरें आ रही थीं कि जयंती नटराजन ने सोनिया गांधी को एक चि_ी लिखी है जिसमें राहुल गांधी पर दखल के आरोप लगाए हैं। और उसी वक्त से ये खबरें भी आ रही थीं कि दोपहर वे एक प्रेस कांफ्रेंस लेकर कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे सकती हैं।
कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा सदमा और झटका है क्योंकि इस बार आरोप सीधे राहुल गांधी पर है, सोनिया गांधी पर है, और देश के बड़े-बड़े कारखानेदारों के मामले में अपनी पसंद या नापसंद सरकार पर थोपने के आरोप हैं। जयंती नटराजन की बातों को लेकर लोगों का ऐसा सोचना अब जायज है कि कांग्रेस के मालिकान सरकारी कुर्सियों से दूर रहते हुए भी सरकार को अपनी मर्जी से हांकते थे। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि राहुल गांधी के काम के तौर-तरीकों के चलते कांग्रेस जिस रफ्तार से गड्ढे में जा रही है, उसे देखते हुए राहुल के खिलाफ एक बगावत अब टल नहीं सकती, और जयंती ने एक किस्म से एक शुरुआत की है, जो कि आगे बढ़ेगी।
यूपीए सरकार के वक्त सरकार के बाहर के किसी भी व्यक्ति, चाहे राहुल गांधी ही सही, के कहे हुए अगर सरकार के मंत्रियों ने कोई फैसला प्रभावित किया है, तो इसके लिए वे मंत्री ही जिम्मेदार हैं। आज मोदी सरकार के सबसे बड़े मंत्रियों में से एक अरूण जेटली ने जयंती नटराजन के इस बयान के बाद तुरंत ही यूपीए सरकार के पर्यावरण-फैसलों को फिर से परखने की घोषणा की है। वह एक अलग मुद्दा है, लेकिन आज कांग्रेस को अपने संगठन, अपने नेता, अपने भविष्य, और अगर इनके बाद उसके पास वक्त बचता है तो देश के बारे में सोचना चाहिए। पिछले दस बरस मनमोहन सिंह की सरकार के चलते सोनिया-राहुल पर किसी तरह की आंच नहीं आ पाई, और मौनी बाबा होने की तोहमत झेलते हुए भी मनमोहन सिंह ने किसी बात की जिम्मेदारी सोनिया-राहुल पर नहीं डाली। लेकिन आज जब कांग्रेस कुएं में गिरे हुए हाथी की तरह हो गई है, तो तमाम नाराज लोगों को यह मौका मिल रहा है कि वे कूद-कूदकर लात मारें।
हम इस बात को आज पहली बार नहीं लिख रहे हैं कि कांग्रेस को अगर अपने भविष्य को देखना है, तो उसे सोनिया-राहुल से परे एक लीडरशिप के बारे में सोचना होगा। आज हाल यह दिखता है कि सोनिया-राहुल की लीडरशिप के एकाधिकार को बचाते हुए कांग्रेस के चापलूस नेता पूरी पार्टी को ही खत्म हो जाने दे रहे हैं। राहुल गांधी में लीडरशिप की संभावनाएं सीमित दिखती हैं, और जिस भाजपा से उसका मुकाबला है, उसके मुकाबले राहुल की लीडरशिप कहीं नहीं टिक पा रही है। बाजार के व्यापारी के तराजू की जुबान में बात करें, तो मोदी के मुकाबले राहुल पासंग पर भी नहीं बैठते हैं। और यही वजह रही कि जैसे-जैसे पिछले आम चुनाव में इन दो लोगों को एक-दूसरे के मुकाबले खड़ा किया गया, पाया गया, वैसे-वैसे कांग्रेस की संभावनाएं खत्म होती चली गईं। यह हो सकता है कि जिस तरह संजय गांधी की दुर्घटना-मौत के बाद अचानक राजीव गांधी को अपनी घरेलू पार्टी की लीडरशिप सम्हालनी पड़ी थी, और इंदिराजी की हत्या के बाद सरकार को सम्हालना पड़ा था, उसी तरह राहुल गांधी को अपनी घरेलू पार्टी को सम्हालना पड़ा है। उनकी क्षमता और उनकी सोच इस जिम्मेदारी के लायक दिखती नहीं है, और इसके साथ-साथ सोनिया-राहुल की सक्रिय राजनीति में दिलचस्पी भी बहुत सीमित दिखती है। एक काबिल मैनेजर रखकर उन्होंने दस बरस यूपीए सरकार तो चलवा ली, लेकिन खुरदुरी जमीन की चुनावी राजनीति मैनेजरों से नहीं चलती, लीडरों से चलती है। देश के आम चुनाव में जिन नेताओं के नाम और चेहरे पर वोट मांगे जाते हैं, वे कार की पिछली सीट पर बैठकर जुबानी हुक्म से कार चलवाने वाले नहीं हो सकते। इसलिए हम आने वाले बहुत से बरस तक आज के सोनिया-राहुल को मोदी-भाजपा के मुकाबले कहीं कामयाब होते नहीं देखते हैं।
यह कांग्रेस पार्टी का अंदरूनी मामला है कि वह किसे अपना अध्यक्ष बनाए, लेकिन देश के लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष जरूरी है, और कांग्रेस के गड्ढे में जाने से लोकतंत्र का एक बड़ा नुकसान हो रहा है। इस पार्टी की फिक्र किए बिना, महज लोकतंत्र की फिक्र करते हुए हम इस बात को आज फिर दुहराते हैं कि कांग्रेस को राहुल गांधी से परे सोचना होगा, वरना राहुल की संभावनाओं को बचाते-बचाते यह पार्टी अपनी खुद की संभावनाओं को डुबा बैठेगी।

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