संपादकीय
27 जनवरी 2015
हाल के महीनों में भारत का साम्प्रदायिक सद्भाव किस कदर बिगड़ा है, और नफरत किस तरह सिर चढ़कर बोल रही है इसकी एक मिसाल कल सामने आई जब भारतीय राष्ट्रपति गणतंत्र दिवस पर सलामी ले रहे थे, और उनके बगले में खड़े हुए उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी शांत खड़े थे। उन्होंने सलामी के लिए हाथ नहीं उठाया, तो साम्प्रदायिक लोगों ने ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइटों पर उन्हें देशद्रोही, दगाबाज, और पता नहीं क्या-क्या लिखना शुरू कर दिया। कुछ जानकार समाचार वेबसाइटों ने ऐसी हमलावर बातों के जवाब में यह साफ किया कि नियमों और परंपराओं के तहत गणतंत्र दिवस पर सिर्फ राष्ट्रपति ही सलामी लेते हैं, और सलामी का जवाब देते हैं। इसलिए उपराष्ट्रपति एकदम सही थे कि वे सलामी गारद का जवाब न देकर चुप खड़े थे। साम्प्रदायिक ताकतों ने उनके मुस्लिम होने से जोड़कर अपनी तमाम नफरत निकाल दी। हामिद अंसारी एक बहुत ही जानकार, विद्वान, और सम्माननीय व्यक्ति हैं, और वे सतही और ओछी राजनीति से हमेशा ही परे रहते आए हैं। ऐसे व्यक्ति को जब साम्प्रदायिक और नफरतजीवी ताकतों के ऐसे हिंसक हमले झेलने पड़ते हैं, तो इसकी तोहमत सिर्फ इन लोगों पर नहीं मढ़ी जा सकती, बल्कि देश के माहौल को गंदा करने में जिन लोगों ने भी हाथ बंटाया है, वे तमाम लोग ऐसी नफरत के जिम्मेदार हैं।
एक तरफ तो तीन दिन के लिए भारत के दौरे पर आए हुए अमरीकी राष्ट्रपति ने बहुत सी सकारात्मक बातें कीं। उन्होंने ऐसा समाज बनाने की बात कही, जहां लिंग, जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं हो। ओबामा ने कहा कि समाज में महिलाओं का विशिष्ट स्थान होने पर ही तरक्की निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि धर्म की आड़ लेकर भी महिलाओं के साथ भेदभाव होता है। और ओबामा का यह भाषण आज सुबह चल ही रहा था और हामिद अंसारी के खिलाफ नफरत का अभियान भी जोरों पर था। भारत में आज यह एक दिक्कत खड़ी हुई है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया की अर्थव्यवस्था के बीच भारत को आगे बढ़ाने के लिए मेक इन इंडिया की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनकी पार्टी और उनके सहयोगियों के आसपास के बहुत से लोगों का अभियान आक्रामक हिंदुत्व को बढ़ावा देने का चल रहा है, और इससे देश की उत्पादकता पीछे धकेल दी जा रही है, देश की संभावनाएं गड्ढे में गिरा दी जा रही हैं, और इस देश को एक बहुत ही धर्मान्ध और कट्टरपंथी लबादा पहना दिया जा रहा है। आर्थिक प्रगति और इस परले दर्जे की अभूतपूर्व धर्मान्धता एक साथ नहीं चल सकते।
अमरीका की मेजबानी करके नरेन्द्र मोदी ने जो सुर्खियां बंटोरी हैं, उनके साथ-साथ उन्हें ऐसी सुर्खियों को भी देखना होगा जो कि देश की एक बहुत ही तंगदिल और आक्रामक विचारधारा रात-दिन पा रही है। बीच-बीच में मोदी के एक सबसे करीबी मंत्री अरूण जेटली जैसे कुछ लोग सार्वजनिक बयानों में भी यह बात मानते हैं कि हिन्दुत्व के नाम पर जो साम्प्रदायिक-आक्रामकता फैलाई जा रही है, उसकी वजह से सरकार के अच्छे काम भी खबरों में नहीं आ पा रहे, और सरकार का नुकसान हो रहा है। लेकिन नफरत फैलाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। भारत को यह भी याद रखना चाहिए कि धर्मान्धता पर खड़ी हुई नफरत ने पड़ोस के पाकिस्तान का क्या नुकसान किया है। भारत के बहुत से मामलों में उसकी पहली तुलना पाकिस्तान के साथ होती है, और इस एक मामले में भी भारत को कट्टरता बढऩे से होने वाले नुकसान का ध्यान रखना पड़ेगा।
हम एक बार फिर हामिद अंसारी पर लौटें, तो हिन्दुस्तान किसी एक धर्म के लोगों की जागीर नहीं है। यहां बसे हुए हर धर्म के लोग इस जमीन और देश के लिए वफादार हैं, और जहां तक देशद्रोही और गद्दार होने की बात है, तो वह इस देश में गोडसे से लेकर आज तक बहुत से धर्मों के लोग रहते आए हैं, और गद्दारी पर किसी धर्म का एकाधिकार नहीं है। इसलिए धर्म के आधार पर जो लोग इस देश में देशप्रेम तय कर रहे हैं, वे लोग तो सबसे पहले देशद्रोही हैं ही।

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