28 जनवरी 2015
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में एक आदिवासी कन्या छात्रावास की नाबालिग लड़की अपने ही करीबी रिश्तेदार से संबंधों के चलते गर्भवती हो गई, और उसे इसका अहसास ही नहीं हुआ। छात्रावास के पखाने में जब उसे एक बच्ची हुई, तो उसे मालूम पड़ा, और वह बच्ची तुरंत चल भी बसी। इसके बाद इस सरकारी छात्रावास की अधीक्षिका ने अपने पति के साथ मिलकर एंबुलेंस से इस छात्रा को रातों-रात उसके गांव, घर पहुंचाया, और अपनी उसकी मौजूदगी में ही परिवार के लोगों ने मिलकर नवजात शिशु की लाश को दफन किया।
यह पूरा सिलसिला बहुत तकलीफदेह है, क्योंकि आदिवासी इलाकों में गांव की, गरीब परिवार की छात्रा किसी तरह पढऩे पहुंचती है, और नासमझी में ऐसे असुरक्षित देह-संबंध बना बैठती है जो कि उसे मां बनाकर छोड़ता है। इसके बाद देह की समझ उसकी इतनी सीमित है कि वह गर्भ को नहीं समझ पाती, और जन्म के बाद अपने बच्चे को नहीं बचा पाती। इसके बाद इस हादसे को छुपाते हुए सरकारी कर्मचारी भी कफन-दफन में शामिल हो जाते हैं, और जनचर्चा के फैलते-फैलते सरकार मजबूरी में इसकी जांच कराती है, और अब परिवार के कई लोगों सहित ये कर्मचारी पुलिस मामले में फंस गए हैं।
हम इस पूरे हादसे की शिकार इस नाबालिग लड़की के बारे में सोचते हैं, तो लगता है कि न सिर्फ जंगल के बीच गांव और हॉस्टल की इस लड़की की सेक्स और सेहत की समझ बहुत सीमित थी, बल्कि अपनी जान पर आए खतरे से बचने की समझ भी उसे नहीं थी। भारत के बहुत से इलाकों में एक धार्मिक और सांस्कृतिक शुद्धता नाम के पाखंड का झंडा उठाकर चल रहे लोग स्कूलों में किशारोवस्था के लोगों को भी स्वास्थ्य शिक्षा देने के खिलाफ हैं। यहां तक कि जब लड़कियों के स्कूल में सेनेटरी नैपकिन्स की जानकारी दी जाती है, तो भी ऐसे सांस्कृतिक गुंडे उसके खिलाफ प्रदर्शन करने लगते हैं। दूसरी तरफ इसी देश की संस्कृति को बचाने के नाम पर जब बड़े-बड़े धार्मिक और राजनीतिक नेता एक-एक हिंदू औरत को दस-दस बच्चे पैदा करने के लिए उकसाते हैं, तो यह जाहिर है कि ऐसे लोगों की नजर में महिला को किसी सेक्स शिक्षा का कोई हक होना भी नहीं चाहिए।
यह पूरा का पूरा मामला अपने शरीर और सेक्स के प्रति जानकारी न होने का मामला है। और वह बढ़ते-बढ़ते एक ऐसे अपराध में तब्दील हो गया जिसमें शायद आधा दर्जन लोग बरसों तक अदालत में धक्के खाएंगे, और शायद उनके कई बरस जेल में गुजरेंगे। हम इतने से लोगों की फिक्र में इस मुद्दे पर नहीं लिख रहे हैं। लेकिन पूरे छत्तीसगढ़ में जगह-जगह आदिवासी इलाकों में लड़कियों के हॉस्टल में जिस तरह से उनका देहशोषण हो रहा है, उसे देखते हुए यह जरूरी है कि सभी बच्चों को यौनशोषण के खिलाफ जागरूक किया जाए। एक पाखंडी संस्कृति का नाम लेकर बच्चों को अज्ञान में डुबाकर रखना एक जुर्म है, और ऐसे लोगों के दबाव में राज्य या केंद्र की सरकार को नहीं आना चाहिए। किशोरावस्था शुरू होने के साथ-साथ बच्चों को उनके शरीर को लेकर हर किस्म की जानकारी दी जानी चाहिए, और उन्हें दूसरों से कैसे खतरे हो सकते हैं, इस बारे में उनको चौकन्ना भी करना चाहिए। इस न्यूनतम सामाजिक जिम्मेदारी का विरोध करने वाले लोग उसी तरह के हैं, जिस तरह के लोग पाकिस्तान में पोलियो ड्रॉप्स का विरोध करते हुए सरकारी कर्मचारियों का कत्ल कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को तुरंत ही प्रदेश के तमाम किशोरों की जागरूकता का अभियान छेडऩा चाहिए।

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