संपादकीय
7 दिसम्बर 2017

सोशल मीडिया की वजह से बहुत से ऐसे सरकारी फैसले पल भर में ही दुनिया के सामने आ जाते हैं जो कि पहले लोगों को नजर ही नहीं आते थे। भारत सरकार की एक मंत्री सुषमा स्वराज का ट्विटर अकाऊंट रोज ऐसी खबर लेकर आता है जिससे सरहद के दोनों तरफ बसे हुए जंगखोरों की तमाम साजिशें हार जाती हैं। पाकिस्तान के लोगों में से बहुतों को भारत में जान बचाने वाली सर्जरी या इलाज की जरूरत होती है, और ऐसे लोग वीजा पाने के लिए ट्विटर पर सुषमा स्वराज से अपील करते हैं, और रात-दिन के किसी भी वक्त उनकी तरफ से जवाब भी पोस्ट हो जाता है कि जाकर भारतीय उच्चायोग से वीजा ले लें। वे बात की बात में ऐसे इलाज-वीजा मंजूर करती हैं, और तकरीबन हर दिन ऐसा कोई न कोई मामला सामने आता है जिसे लेकर यह भरोसा बढ़ता है कि इन दोनों देशों की तमाम सोच सरहद नहीं है, इंसान भी हैं।
दो देशों के बीच चाहे कितनी ही फौजी तनातनी हो, उसके बीच भी आमतौर पर बातचीत का रिश्ता बने रहता है, और यह बातचीत दोनों देशों के प्रमुख नेताओं के बीच मेज पर बैठकर औपचारिक बातचीत ही नहीं होती, वह कभी खिलाडिय़ों की शक्ल में सामने आती है, कभी जेल में बंद किसी कैदी को रिहा करने की शक्ल में सामने आती है, और इन दिनों हम लगातार देख रहे हैं कि किस तरह भारत में इलाज के लिए आने वाले लोगों को सुषमा स्वराज तुरंत ही वीजा देकर एक नए किस्म का रिश्ता आगे बढ़ा रही हैं, मजबूत कर रही हैं। दोनों देशों में बहुत से ऐसे आतंकी लोग हैं, धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोग हैं, जंगखोर और नफरतजीवी लोग हैं जो कि एक-दूसरे पर हमले की भड़काऊ बातें करते रहते हैं। इसके बीच में सुषमा स्वराज की यह छोटी सी पहल, और उसका सोशल मीडिया पर इस तरह लगातार दिखना, इससे दोनों देशों के बीच इंसानी रिश्ते मजबूत हो रहे हैं, और ऐसी ही मजबूती से सरकारों की जिद कमजोर भी होगी।
सोशल मीडिया पर ऐसी बातों को बढ़ावा मिलने से जो माहौल बनता है, वह बताता है कि अच्छा काम न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि वह दिखना भी चाहिए। यही काम हो सकता है कि पिछली सरकारें भी करती आई हों, लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार में सोशल मीडिया की समझ नहीं थी। ऐसे में लोगों के बीच भावनाओं को बदलने के लिए इस नए औजार की ताकत को पहचानना होगा। हमारा यह मानना है कि पाकिस्तान में भी जो लोग भारत को नापसंद करते होंगे, वे भी जब यह देखेंगे कि किस तरह भारतीय विदेश मंत्री कुछ घंटों में ही पाकिस्तानियों को इलाज के लिए भारतीय वीजा देती हैं, तो उनकी सोच भी इससे बदलेगी। फिर इसके अलावा हमारा यह भी मानना है कि देशों के बीच तनातनी कितनी भी रहे किसी कुदरती मुसीबत के वक्त, या कि इलाज जैसी जरूरत के लिए देशों को अपने दरवाजे हमेशा खुले रखने चाहिए। भारत एक बड़ा देश है, इसलिए इसे पड़ोस के छोटे देशों के साथ नरमी भी बरतनी चाहिए क्योंकि उन देशों में इलाज की उतनी सहूलियतें नहीं हैं।
डिप्लोमेसी कई किस्म की होती हैं, कई सरकारों में भारत और पाकिस्तान के कुछ बड़े अखबारनवीसों ने भी बातचीत के रिश्ते जारी रखवाए थे। अभी भी सुनाई पड़ता है कि भारत के एक बड़े कारखानेदार का पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ के कुनबे से दो पीढिय़ों का कारोबारी रिश्ता रहा है, दोस्ताना रिश्ता रहा है, और नवाज शरीफ और नरेन्द्र मोदी को करीब लाने में इस हिन्दुस्तानी कारखानेदार का खासा हाथ रहा है। यह बुरा हुआ कि इन दोनों नेताओं के बीच बढ़ती हुई दोस्ती कायम नहीं रह पाई, और दोनों देश बातचीत तोड़कर घर बैठे हुए हैं, लेकिन इस किस्म की दूसरी कोशिशें भी जारी रहनी चाहिए। हमारा मानना है कि सरहद के दोनों तरफ कम ही लोग ऐसे हैं जो कि दूसरे देश की तबाही चाहते हैं, अधिकतर लोग तो ऐसे हैं जो कि अमन-चैन चाहते हैं, ऐसे लोगों के बीच से भलमनसाहत की मिसालें उठनी चाहिए, आगे बढऩे चाहिए, और ऐसी मिसालें ही सरकारों को मजबूर करेंगी कि वे मिल-बैठकर बात करें। अभी चार दिन पहले ही पाकिस्तान से किसी ने सुषमा स्वराज को ट्वीट किया है कि किस तरह बोल-सुन न सकने वाला एक पाकिस्तानी बच्चा भारत की एक जेल में कैद है, और उसे छोडऩा चाहिए। इस पर सार्वजनिक रूप से ही सुषमा ने इस मामले की जानकारी मांगी, और हो सकता है कि जल्द ही यह बच्चा रिहा होकर अपने वतन लौट भी पाए। फिलहाल पाकिस्तान के लोगों की सेहत ठीक रखने में हिन्दुस्तान की अस्पताली ताकतें जो कुछ कर सकती हैं, वह जरूर करना चाहिए, इंसानियत सरहद से बहुत ऊपर रहती है। (Daily Chhattisgarh)
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