संपादकीय
1 दिसम्बर 2017

अमरीकी राष्ट्रपति रह चुके, और अभी दिल्ली एक अखबार के कार्यक्रम में पहुंचे बराक ओबामा ने हिन्दुस्तान के संदर्भ में अपनी राय दी कि यहां के नौजवानों को स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि आने वाले वक्त में उसी से उनका काम चल सकता है। उन्होंने याद दिलाया कि मशीनीकरण और कम्प्यूटरों के ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की वजह से बहुत से रोजगार घट रहे हैं, लेकिन स्किल बढ़ाने से लोगों को दूसरे तरह के काम मिल सकते हैं, कौशल विकास से ही नौजवानों को काम मिलेगा, और उनका भविष्य बेहतर होगा। उन्होंने अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक दूसरी बात भी कही कि सबसे ऊपर के एक फीसदी लोग अधिक धन इक_ा कर लेते हैं, और गरीबों को कुछ नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि इंसान और इंसान में फर्क करना बेहद खतरनाक है। उन्होंने इंसानों के साथ-साथ गरीब और अमीर देशों के बीच के फर्क को घटाने की बात भी कही।
हम इन बातों में से कौशल विकास या अपने हुनर को बेहतर बनाने वाली बात को भारत के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण मानते हैं, और यह मानते हैं कि इस एक अकेली कोशिश से हिन्दुस्तानी नौजवान बाकी पूरी दुनिया में जाकर कामकाज और रोजगार, कारोबार और दूसरे किस्म की पहल कर सकते हैं, अपना भी भला कर सकते हैं, और देश का भी भला कर सकते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम पहले भी कई बार इस बारे में लिख चुके हैं कि भारत में नौजवान पीढ़ी का अधिकांश हिस्सा ऐसा है जो कि मामूली स्कूल-कॉलेज से महत्वहीन किस्म की पढ़ाई करके अपने को पढ़ा-लिखा मान लेने की खुशफहमी में जीता है, और आखिर में जाकर वह परिवार, समाज, और देश पर बोझ बनकर रह जाता है। लोगों के बीच पढ़ाई को रोजगार या कामकाज का एक जरिया मान तो लिया जाता है, लेकिन सरकार से लेकर परिवार तक के बीच यह नहीं सोचा जाता कि इन दो बातों के बीच एक बहुत बड़े पुल की जरूरत होती है, जिसके बिना यह पढ़ाई किसी काम की नहीं रह जाती है। ऐसे में कौशल विकास या अपने हुनर को बेहतर बनाना, नए हुनर सीखना ही एक ऐसा काम है जिसे मशीनें टक्कर नहीं दे सकतीं, और जिसे कम्प्यूटर शिकस्त नहीं दे सकते।
हम आसान शब्दों में इस बात को कहें, तो स्कूल की बुनियादी पढ़ाई के बाद सीधी जरूरत यह है कि लोग अपनी पसंद के ऐसे हुनर को छांटें जिसकी कि दुनिया को जरूरत भी दिख रही हो। यह हुनर जरूरी नहीं है कि सफेद कपड़े पहनकर दफ्तर में कुर्सी पर बैठकर करने वाले काम का हो, हो सकता है कि यह हुनर फिजियोथैरेपी का हो, किसी दुकान में बिक्री करने वालों का हो, कहीं मालिश और कहीं बागवानी करने वालों का हो, तो कहीं ड्राइविंग और घरेलू कामकाज करने वालों का हो। ऐसे ही काम लोगों को पूरी दुनिया में मिल सकते हैं जो कि कम्प्यूटर और मशीनें आसानी से नहीं कर सकते। लोगों को ऐसे हुनर के साथ-साथ कोई न कोई दूसरी जुबान भी सीखना चाहिए, कम्प्यूटर का काम सीखना चाहिए, पहरावे और बातचीत का सलीका सीखना चाहिए। इस तरह से लोगों को अपने आपको एक ऐसा आकर्षक पैकेज बनाना होगा जिसकी जरूरत दुनिया के लोगों को कहीं न कहीं लगती हो। आज विकसित और संपन्न दुनिया लगातार काम के घंटों को घटाते चल रही है। हफ्ते में अब महज चार दिन लोग काम कर रहे हैं, और तीन दिनों का सप्ताहांत मना रहे हैं। ऐसे में उनको घर के कामकाज के अलावा अपने सुख और अपनी सुविधा के लिए भी कामगार लगेंगे। कुछ विकसित देशों में अभी यह सोच भी मंजूर की जा रही है कि हर नागरिक को एक न्यूनतम गुजारा भत्ता दिया जाए, और ऐसा होने पर वहां के लोगों में काम न करके रहने का मिजाज भी बढ़ सकता है, और वहां पर बाहरी कामगारों की जरूरत हो सकती है। इसलिए ओबामा की बात को महत्व देते हुए भारत के लोगों को यह सोचना चाहिए कि कौशल विकास को सरकारी फर्जी आंकड़ों वाली योजना से बाहर निकालकर किस तरह हकीकत में जमीन पर उतारा जा सकता है ताकि भारत में करोड़ों नौजवानों की जो कामगार पीढ़ी है, उसकी उत्पादकता एकदम से बढ़ाई जा सके। आज अगर भारत में कौशल विकास करते हुए पूरी दुनिया में जाकर काम करने की तैयारी नहीं की जाएगी, तो वह योजना शुरू होने के पहले ही दम तोड़ चुकी होगी। इसलिए सरकार की योजना से परे लोगों को अपनी क्षमता बढ़ाने, अपने हुनर को बढ़ाने के बारे में खुद भी सोचना होगा। इसके बाद उनके सामने आसमान भी कोई सीमा नहीं रहेगी। (Daily Chhattisgarh)
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