संपादकीय
3 दिसम्बर 2017

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हफ्ते भर से अधिक हो गया है कि शिक्षाकर्मी सड़क पर हैं, और पिछले तीन दिनों से यहां की पुलिस ने मानो और कोई काम किया ही नहीं है। फिर आए दिन इस शहर में नेताओं और बड़े लोगों के आने पर तरह-तरह से इंतजाम में पुलिस झोंक दी जाती है, और उसका बुनियादी काम धरे रह जाता है। सड़कों पर कोई हादसा न दिखे, किसी का पुतला न जले, किसी बंगले के गेट तक भीड़ न पहुंचे, इसी सब इंतजाम में पुलिस की पूरी ताकत लगी रहती है, और छोटे-बड़े कई किस्म के जुर्म की जांच नहीं हो पाती, जांच हुई रहती है तो कार्रवाई नहीं होती। यह सिलसिला थमना चाहिए। लोकतंत्र में आंदोलनों को तो नहीं रोका जा सकता, लेकिन जो लोग आंदोलन करते हैं, उनके और बाकी जनता के पैसों से ही पुलिस का इंतजाम होता है, और कुल मिलाकर यह सिलसिला जनता की जेब पर भारी पड़ रहा है।
भारत के कुछ और शहरों में पुलिस को दो हिस्सों में बांट दिया जाता है जिनमें से एक का काम सिर्फ जुर्म की जांच होता है, और दूसरे का काम कानून व्यवस्था का इंतजाम। छत्तीसगढ़ में ऐसी जरूरत अब आ ही गई है कि जांच के लिए पर्याप्त पुलिस अलग कर दी जाए, ताकि मुजरिमों को आगे और जुर्म करते चलने का मौका न मिले, और जनता का भी पुलिस पर यह भरोसा रहे कि उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई हो रही है। इसके साथ-साथ पुलिस के खुफिया विभाग को इस बात के लिए तैयार किया जाना चाहिए कि वह कई किस्म के आर्थिक अपराध, धोखाधड़ी होने के पहले ही उन पर निगरानी रखे, और हजारों शिकायतें खड़ी हो जाने के पहले उनको रोक सके। हम पहले भी यह बात लिख चुके हैं कि राज्य में जिस तरह नक्सल इंटेलीजेंस है, बाकी बातों के लिए इंटेलीजेंस है जिसे कि मोटे तौर पर राजनीतिक इंटेलीजेंस भी कह दिया जाता है, उससे परे एक आर्थिक अपराध इंटेलीजेंस और होना चाहिए। बड़े पैमाने पर कोई भी संगठित अपराध न तो रातों-रात होते, और न ही बंद कमरे में होते। कहीं न कहीं कंपनियां खुलती हैं, हजारों एजेंट बनाए जाते हैं, दफ्तर खुलते हैं, कतारें लगती हैं, बड़े-बड़े हॉल में कार्यक्रम होते हैं, और तब कहीं जाकर धोखाधड़ी के लिए एक उपजाऊ जमीन तैयार होती है। ऐसे में अगर समय रहते निगरानी रखी जाए, तो हजारों-लाखों लोग लुटने के पहले ही बच सकेंगे, और बैंक खातों से पैसे निकल जाने के पहले मुजरिम पकड़े जा सकेंगे।
भारत के बाकी अधिकतर हिस्से की तरह छत्तीसगढ़ में भी पुलिस का ढांचा, उसकी ट्रेनिंग, और उसकी सोच, ये सब कुछ अंग्रेजों के समय से चली आ रही परंपरा के मुताबिक ही जारी है, जबकि अपराध के तौर-तरीके बदल चुके हैं, लोकतंत्र में आंदोलनों के पैमाने बड़े हो चुके हैं, और मुजरिमों की ताकत बहुत अधिक बढ़ चुकी है। ऐसे में राज्य को एक नई के साथ पुलिस की क्षमता को न सिर्फ बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए, बल्कि उसे आज की जरूरत के मुताबिक अधिक हुनरमंद भी बनाना चाहिए। पुलिस की मौजूदा पीढिय़ां आज की नई चुनौतियों के लायक नहीं रह गई हैं, और दूसरी बात यह भी है कि सामाजिक-राजनीतिक दबाव पुलिस पर इतना अधिक होता है, मीडिया का दबाव इतना अधिक होता है, कि उसकी सोच इन सबके तले दब जाती है। यह सिलसिला बदलना जरूरी है वरना जनता की उम्मीदें पूरी नहीं हो सकेंगी, और लोकतंत्र पर से उसका भरोसा भी कम होने लगेगा। हम पुलिस से जुड़ी कुछ घिसी-पिटी और पुरानी बातों को यहां दुहराना नहीं चाहते क्योंकि उन पर बहुत बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन पुलिस को अधिक पेशेवर बनाने के लिए पूरी तरह से एक नई सोच चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें