नेपाल में वामपंथी बहुमत से हिन्दुस्तान को सबक

संपादकीय
11 दिसम्बर 2017


दुनिया के इतिहास में इन दिनों जिस तरह की उथल-पुथल दर्ज हो रही है, वह हैरान भी करती है, और एक उम्मीद भी बंधाती है। जहां पश्चिम के कुछ देशों में कट्टरतावादी और साम्प्रदायिक ताकतें जीतकर आ रही हैं, वहीं फ्रांस जैसी कुछ मिसालें भी सामने हैं जहां पर उदारवादी लोग भी सत्ता पर आ रहे हैं जो कि खाड़ी के देशों से आ रहे अल्पसंख्यकों के साथ हमदर्दी रखते हैं। कुछ ऐसा ही कनाडा में भी देखने मिलता है जहां के नौजवान प्रधानमंत्री धार्मिक-अल्पसंख्यकों, शरणार्थियों, और समलैंगिकों जैसे अल्पसंख्यकों के साथ बराबरी का बर्ताव करते हैं।
लेकिन आज इस मौके पर लिखने की एक दूसरी वजह है कि नेपाल में अभी संसदीय चुनाव के नतीजे आ रहे हैं, और अब तक घोषित 113 सीटों में से 88 सीटों पर वामपंथी गठबंधन ने जीत दर्ज की है। यह लगभग तय माना जा रहा है कि यही गठबंधन सरकार बनाएगा। यह याद रखने की बात है कि नेपाल दुनिया का अकेला हिन्दू राष्ट्र है, और वहां पर अभी हाल के बरसों तक राजशाही भी बहुत मजबूत थी, लेकिन पिछले एक-दो चुनावों में माओवादियों ने, वामपंथियों ने जिस तरह से हिस्सा लिया, और संसद तक पहुंचे, उसने हिन्द महासागर के इस इलाके में लोगों को चौंका भी दिया। नेपाल के एक तरफ के चीन में अपने किस्म का वामपंथ है, लेकिन उससे परे और कहीं कोई वामपंथ नेपाल को छूता नहीं है। इसलिए यहां पर संसदीय मूलधारा में कल के नक्सलियों या माओवादियों का शामिल होना, और फिर संसद से होते हुए सरकार तक पहुंचना एक बहुत ही दिलचस्प राजनीतिक विकास है जिस पर भारत को भी गौर करना चाहिए, और हमारी सलाह है कि भारत के भी माओवादियों को इस बारे मेें सोचना चाहिए।
भारत में माओवादी आंदोलन देश की सबसे बड़ी आंतरिक समस्या बना हुआ है, और पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा भी करार दिया था। हम जिस छत्तीसगढ़ में बैठे हैं, वहां के विकास को सबसे बड़ी चुनौती माओवादी नक्सलियों की तरफ से है, और प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री तक कई लोग नक्सलियों से यह अपील कर चुके हैं कि उन्हें हथियार छोड़कर चुनाव में उतरना चाहिए, और संसदीय लोकतंत्र में भागीदार बनकर उन इलाकों के विकास में भागीदारी निभाना चाहिए जिनके लिए वे अपना आंदोलन बताते हैं। भारत में माओवादियों का आंदोलन कई तरह की विचारधाराओं से गुजरते हुए कहीं हथियार थामते रहा है, तो कहीं हथियार छोड़ते भी रहा है। आज ऐसा लगता है कि देश के बहुत से धर्मनिरपेक्ष दलों, गरीबों के हिमायती दलों, और नक्सलियों के मुद्दों में कुछ बातें एक सरीखी हैं। उनके बीच हथियारबंद लड़ाई और संसदीय लोकतंत्र जैसा बहुत बड़ा बुनियादी फर्क तो है, लेकिन दोनों की सोच उन तबकों के भलाई की है जो कि सबसे अधिक शोषित और कुचले हुए हैं। इसलिए हमको ऐसा लगता है कि आज देश के वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, और गरीबों के हिमायती दलों की यह जिम्मेदारी है कि वे हिंसक आंदोलन में लगे नक्सलियों को धीरे-धीरे समझाकर लोकतंत्र की मूलधारा में लाने की कोशिश करें।
किसी भी मामले में किसी दूसरी मिसाल का इस्तेमाल इसलिए खतरनाक हो जाता है कि उन दोनों में लोग फर्क गिनाने लगते हैं। लेकिन फिर भी हम नेपाल में वामपंथियों की जीत को यहां पर इसलिए गिनाना चाहते हैं क्योंकि राजशाही से थका हुआ एक हिन्दू राष्ट्र किस तरह वामपंथियों की सरकार को बना रहा है, यह भारत के लिए एक दिलचस्प मॉडल तो है ही। भारत के हथियारबंद नक्सलियों को लोकतंत्र में आना चाहिए, और आज जिन तबकों का वे भला करना चाहते हैं, उनका भला संसदीय लोकतंत्र के रास्ते ही हो सकता है। हमारा यह भी ख्याल है कि स्वामी अग्निवेश जैसे जो लोग भी नक्सलियों से बातचीत का रिश्ता रखते हैं, उनको भी यह कोशिश करनी चाहिए। देश और प्रदेश की सरकारों को भी यह कोशिश करनी चाहिए क्योंकि दुनिया ने यह देखा है कि उत्तरी आयरलैंड सहित किसी भी जगह पर बातचीत के बिना हथियारबंद आंदोलन खत्म नहीं हुए हैं। इसलिए भारत की तमाम सरकारों को, और लोकतांत्रिक ताकतों को हिंसक और हथियारबंद नक्सल-आंदोलन को सहमत कराकर लोकतांत्रिक चुनावों में शामिल करने की कोशिश जरूर करनी चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

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