अमरीका पर हमले की गलत खबर से सीखने की जरूरत

संपादकीय
14 जनवरी 2018


अमरीका के हवाई द्वीप पर एक बहुत बड़ा हंगामा हुआ, वहां सरकार की ओर से लोगों को यह संदेश भेजा गया कि हवाई की तरफ बैलेस्टिक मिसाइल आ रहा है, तुरंत बचाव की किसी जगह पर जाएं, और यह कोई सुरक्षा ड्रिल नहीं है। इस खबर के बाद वहां के 14 लाख से अधिक लोग घंटे भर दहशत में रहे क्योंकि अमरीका का यह टापू उत्तर कोरिया की मिसाइल की मारक-सीमा में आता है, और उत्तर कोरिया बार-बार अमरीका पर परमाणु हथियार से हमले की धमकी देते रहता है। ऐसे में सरकारी अफसरों की गलती से यह संदेश चले गया, और पूरा टापू दहशत में डूब गया। अमरीकी राष्ट्रपति को भी इसकी खबर दी गई। अगर सचमुच ही ऐसा मिसाइल उत्तर कोरिया से निकलकर हवाई की तरफ आता, तो उसे पहुंचने में महज 15-20 मिनट लगते। इस हड़बड़ी में लोगों ने अपने बच्चों को गटर के गड्ढों में भी उतारना शुरू कर दिया था।
अब जब अमरीकी जमीन पर इस तरह की चूक हो सकती है, तो यह जाहिर है कि यह दुनिया में किसी और कम चौकन्ने देश में तो हो ही सकती है। ऐसी नौबत में आज दुनिया के जो देश एक-दूसरे को दुश्मन मानकर चलते हैं, वहां पर किसी चूक से या किसी बदनीयत से ऐसी झूठी खबर परमाणु हथियारों की रवानगी कर सकती है। किस्से-कहानियों में और अमरीकी फिल्मों में बार-बार ऐसी नौबत की चर्चा होती है, लेकिन आज हवाई में सचमुच यह मान लिया गया था कि उस पर हमला हो चुका है। इस पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि कल भारत के थल सेनाध्यक्ष ने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव, खतरों, और भारत की फौजी तैयारी को लेकर एक अवांछित बयान दिया कि भारतीय फौजें इस बात को लेकर डरती नहीं है कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार है, और भारतीय फौज कभी भी सरहद पार करने का हुक्म मिलने पर उसके लिए तैयार है। आज उसके जवाब में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा है कि हिन्दुस्तानी आर्मी चीफ का यह बयान परमाणु युद्ध के न्यौता है।
भारत और पाकिस्तान के बीच इस तरह की बकवास पता नहीं किस रणनीति का हिस्सा रहती है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में भी दूसरे देश के साथ संबंध या तनाव पर इस देश के विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री खुद बोलने के बजाय अपने देश के फौजी अफसरों को बोलने देते हैं, जो कि एक बहुत ही खराब और अलोकतांत्रिक सिलसिला है। जिस तरह आज अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच धमकियों और जवाबी धमकियों का मुकाबला चल रहा है, वैसी हिंसक बातें हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच शुरू करना ही नाजायज है, और एक बार शुरू होने पर उसका जवाब तो सरहद के पार से आएगा-जाएगा ही। हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि किसी दूसरे देश के साथ रिश्तों को लेकर किसी लोकतांत्रिक देश की फौज को बकवास नहीं करनी चाहिए। ऐसा करना बताता है कि देश की सरकार फौज को सरकारी और राजनीतिक मामलों में घुसने की इजाजत दे रही है, और यह एक खतरनाक सिलसिला है।
पिछले बरसों में यह पहला मौका नहीं है जब भारत की ओर से फौजी अफसरों ने ऐसे बयान दिए हैं। पाकिस्तान के फौजी अफसर अगर ऐसा कहें और करें, तो वह तो वहां के हालात को देखते हुए समझ पड़ता है क्योंकि वहां सरकार के काम में सेना का दखल रहता है। लेकिन हिन्दुस्तान में सेना निर्वाचित-लोकतांत्रिक सरकार के मातहत काम करती है, और उसे जंग के फतवे देने के काम में लगाना लोकतांत्रिक-समझदारी बिल्कुल नहीं कही जा सकती। हिन्दुस्तान को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार हमेशा वहां की सरकार के हाथ में ही रहेंगे। वहां का तो इतिहास है कि कई बार देश की सरकार पर फौज ने कब्जा कर लिया, और निर्वाचित प्रधानमंत्री को एक बार फांसी भी दे दी गई। इसलिए कब वहां कौन बददिमाग फौजी, कब कोई धर्मांध आतंकी परमाणु हथियारों तक पहुंच बना लें, और फिर चाहे आत्मघाती हमले की तरह ही क्यों न हों, भारत पर दाग दें, तो वह इन देशों की तबाही की वजह होगा। भारत चूंकि एक कामयाब लोकतंत्र है, एक बड़ी ताकत है, इसलिए उसे जंग की भड़काऊ बातों में नहीं उलझना चाहिए, और फौजी अफसरों को ऐसी बकवास में लगाना पूरी तरह नाजायज और अलोकतांत्रिक है। निर्वाचित लोकतंत्र में ऐसी तमाम बातें सरकारों को करनी चाहिए, फौजों को नहीं। (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें