निजी फायदे, निजी अस्तित्व, और राष्ट्रीय जिम्मेदारियां...

संपादकीय
22 जनवरी 2018


दिल्ली में आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों को संसदीय सचिव का दर्जा पाने की वजह से चुनाव आयोग ने विधायकी से अपात्र घोषित कर दिया, और आयोग के इस फैसले को राष्ट्रपति ने मंजूरी भी दे दी। इसलिए फिलहाल जब तक, और अगर, कोई कानूनी राहत नहीं मिलती है, तो आम आदमी पार्टी विधानसभा में बीस सदस्य खो चुकी है। और ऐसे मौके पर दिल्ली की कांग्रेस पार्टी ने आम आदमी पार्टी पर एक हमला भी बोला है। नतीजा यह है कि दिल्ली राज्य की तस्वीर में अब आम आदमी पार्टी एक तरफ है, और कांग्रेस-भाजपा दोनों ही अलग-अलग सही, लेकिन दोनों ही आप के खिलाफ हैं। वैसे तो यह एक राज्य का मामला है, लेकिन इससे देश की राजनीति में कांग्रेस का एक रूख भी उजागर होता है कि उसके सामने आज चुनौती भाजपा को शिकस्त देने के बजाय अपने हस्ती को बनाए रखने की अधिक है।
इस बात को समझने की कोशिश करें तो आज पूरे देश में भाजपा और उसके सहयोगी दल एक तरफ हैं, और बाकी तमाम पार्टियां एक तरफ हैं। एनडीए की बाहर की पार्टियों का साफ मानना है कि देश को भाजपा की नीतियों से बचाना है, लेकिन भाजपा को साम्प्रदायिक कहने वाली इन पार्टियों के बीच आपस में जितने किस्म के तनाव और मतभेद चल रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह बात बहुत आसान नहीं लग रही है कि ये पार्टियां अपने-अपने निजी अस्तित्व को कुछ देर के लिए भूलकर एक व्यापक वैचारिक-सैद्धांतिक गठबंधन के लिए साथ आ पाएंगी। कहने को यह भी कहा जा सकता है कि अभी आम चुनावों में खासा वक्त बाकी है, और ऐसा गठबंधन चुनाव के करीब ही उभर पाता है। लेकिन आज दिल्ली को अगर देखें तो यह बात साफ है कि आम आदमी पार्टी की मुसीबत की इस घड़ी पर अगर कांग्रेस पार्टी उसके ऊपर हमलावर बनी रहेगी, तो आगे जाकर गैरभाजपाई किसी गठबंधन की संभावनाएं कमजोर ही होंगी।
यह कांग्रेस या किसी दूसरी पार्टी की राजनीति में कोई नई या अनोखी बात नहीं है क्योंकि महाराष्ट्र में हम रात-दिन यह देख रहे हैं कि किस तरह सत्ता में भागीदार और एनडीए गठबंधन की हिस्सेदार शिवसेना लगातार भाजपा पर हमलावर बनी रहती है, और दोनों के बीच रिश्ते कई बार टूटते दिखते हैं, और फिर वे टूटते-टूटते बचते भी दिखते हैं। ऐसा ही कांग्रेस के कुछ गठबंधनों के साथ भी हो सकता है, लेकिन आज देश में भाजपा के तेवर ऐसे हैं कि वे दूसरी पार्टियों और दूसरे गठबंधनों में पैदा होने वाले किसी भी तनाव को अपने पक्ष में भुनाने में एक महारथ हासिल कर चुकी है। कई प्रदेशों में उसने ऐसा कर दिखाया है, कहीं नीतीश कुमार लालू को छोड़कर भाजपा के साथ आ गए, तो कहीं कांग्रेस छोड़कर बड़े-बड़े नेता सीधे भाजपा जा रहे हैं। ऐसे माहौल में कांग्रेस को अगर देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के अपने दावे को प्रासंगिक बनाए रखना है, और भारतीय-चुनावी राजनीति में हाशिए पर जाने से बचना है, तो उसे एक राष्ट्रव्यापी और बड़ी पार्टी होने की जिम्मेदारी निभानी होगी। जब एक मुखिया की तरह कोई जिम्मेदारी पूरी करनी रहती है, तो कई बार निजी नुकसान झेलकर भी बिरादरी का मुखिया बनने का जिम्मा पूरा करना पड़ता है। कांग्रेस को आज अगर पूरे देश में भाजपा के खिलाफ, साम्प्रदायिकता के खिलाफ, अलोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ कोई एक व्यापक वैचारिक गठबंधन तैयार करना है, तो उसे छोटी पार्टियों और दूसरे नेताओं की मुसीबत में उनका साथ देने की भी सोचना होगा। हो सकता है कि किसी एक राज्य में कांग्रेस की किसी दूसरी पार्टी से अस्तित्व की लड़ाई चल रही हो, लेकिन जब देश भर में भाजपा-एनडीए के मुकाबले एक विकल्प बनने या बनाने की बात करनी होगी, तो कांग्रेस को तंगदिली और तंगनजरिया छोडऩा होगा। दिल्ली कांग्रेस के नेता अजय माकन का पूरा अस्तित्व आम आदमी पार्टी के विरोध पर जिंदा हो सकता है, लेकिन क्या देश भर में कांग्रेस पार्टी अपने क्षेत्रीय छत्रपों के अस्तित्व का ख्याल रखते हुए अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी कर पाएगी?
हालांकि हम जो बात कह रहे हैं उसके खिलाफ भी बहुत सी मिसालें भारतीय राजनीति में हैं, और इनमें से कुछ तो हाल के बरसों में भाजपा ने ही पेश की हैं कि जब, जहां जीत के लिए जरूरत हो, किसी भी पार्टी या नेता को लाकर, अपने पुराने लोगों को दरकिनार करके एक चुनाव जीत लिया जाए। लेकिन कांग्रेस-यूपीए में न तो आज इस तरह की क्षमता दिख रही है, और न ही ऐसी संभावना फिलहाल बाकी दिख रही है। इसलिए एक विचार के रूप में देश के गैरभाजपाई दलों को हमारी आज की बात पर सोचना चाहिए कि क्या अपने थोड़े-थोड़े निजी फायदों को किनारे धरकर वे एक व्यापक गठबंधन या व्यापक तालमेल बना सकते हैं?  (Daily Chhattisgarh)

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