संपादकीय
7 जनवरी 2018

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू यादव को कल अदालत से जो सजा हुई उसके अलावा उनके लिए और कोई उम्मीद की भी नहीं जा रही थी। पहले से उन्हें मुजरिम करार दिया जा चुका था, और सजा ऐसी हुई कि उन्हें उसी अदालत से तुरंत जमानत न मिल सके। लेकिन लालू को पहले भी इसी तरह के दूसरे मामलों में, चारा घोटाले में, इससे अधिक सजा हो चुकी है, इसलिए यह कोई अटपटी बात नहीं थी। लेकिन यह बात जरूर अटपटी थी कि सीबीआई की विशेष अदालत के जज सजा तय करने में कई दिन लगाते रहे, यह भी कहते रहे कि उन्हें लालू की ओर से लोग सिफारिशी फोन कर रहे हैं, और फैसले से परे कुछ जुबानी जमा खर्च भी करते रहे। अदालत में जब लालू ने कहा कि जेल में उन्हें ठंड बहुत लग रही है, तो जज का कहना था कि तबला बजाईये।
यह बात जाहिर है कि अदालत में एक जज और एक अभियुक्त के बीच, या कि मुजरिम के बीच किसी हंसी-मजाक का रिश्ता नहीं होता है। अदालत में कोई मुजरिम तभी साबित होते हैं जब उनका कोई जुर्म साबित हो जाता है। और जुर्म कोई खुशी मनाने का मौका नहीं रहता। इसलिए एक जज से ऐसे मौके पर जिस गंभीरता की उम्मीद की जाती है, वह इस फैसले के वक्त गायब रही। यह बात महज इसी अदालत के जज के साथ नहीं है, बहुत से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भी समय-समय पर ऐसी नाजायज बातें कहते आए हैं, और भारतीय अदालतों में फैसले से परे की ऐसी जुबानी बातों पर कोई कार्रवाई करने की व्यवस्था है नहीं, इसलिए जज कुछ भी कहकर बच जाते हैं। तबला बजाने की नसीहत का नतीजा यह निकला कि सोशल मीडिया पर इस जज का जमकर मखौल हुआ, और लोगों ने लिखा कि लालू यादव जेल से एक माहिर और काबिल तबला वादक बनकर निकलेंगे।
यह बात तय है कि जज की कही हुई दो-तीन बातें बड़ी नाजायज थीं, लेकिन इसके साथ-साथ नाजयज बातों की दूसरी मिसालों पर भी एक नजर डालनी चाहिए। लालू यादव के समर्थकों का यह मानना और कहना है कि उनके साथ जाति के आधार पर यह भेदभाव हुआ है, और ऊपर की अदालत में जाकर उन्हें इंसाफ मिलेगा। भारत में हर किसी को आखिरी अदालत तक से फैसला पाने, और उसके बाद राज्यपाल या राष्ट्रपति से रहम पाने की अपील का हक रहता है। इसलिए जब तक आखिरी अदालत से लालू यादव का फैसला नहीं हो जाता, उनके बारे में अधिक कुछ कहना ठीक नहीं है, और इस बात को भी हम वजनदार नहीं मानते कि लालू यादव पर यह कार्रवाई उनके पिछड़ी जाति के होने की वजह से हुई है। जब हम जातियों की बात करते हैं, तो भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे दबी-कुचली, और कमजोर जातियों, दलित-आदिवासी को एक अलग दर्जा मिला हुआ है। बाद के बरसों में लालू यादव की ओबीसी को भी पिछड़ेपन का एक दर्जा मिला जो कि दलित-आदिवासी जैसी ज्वलंत जरूरतों पर टिका हुआ नहीं था। हम लालू की पार्टी के नेताओं के बयानों को एक बुनियाद बनाकर एक मुद्दा उठाना चाहते हैं।
जो लोग भी यह मानते हैं कि लालू यादव के खिलाफ इस फैसले के पीछे उनका पिछड़े वर्ग का होना है, उनकी समझ कुछ नहीं, खासी कमजोर है। जो परिवार सैकड़ों या हजारों करोड़ की अनुपातहीन दौलत के मामलों को झेल रहा है, जो परिवार बिहार की विधानसभा से लेकर देश की संसद तक, और चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड अपनी पार्टी तक पर महज अपने कुनबे को थोप देने की आजादी रखता हो, वह भला किस किस्म का पिछड़ा हो सकता है? जन्म की जाति कुछ लोगों के आड़े आ सकती है, बहुत लोगों के आड़े आ सकती है, लेकिन जो लोग सामाजिक, राजनीतिक, सरकारी, या आर्थिक ताकत पाकर उससे उबर जाते हैं, उनकी जाति उनके लिए किस तरह की बाधा बन सकती है? और पिछड़े वर्ग की जातियों के साथ तो दलितों की तरह का कोई सामाजिक भेदभाव भी नहीं है कि लोग उन्हें छूने से इंकार करें, उनके साए से बचकर चलें, या कि उन्हें प्रताडि़त करें। लालू यादव जिस उत्तर भारत के एक सबसे बड़े नेता हैं, उस उत्तर भारत में तो पिछड़ी जातियों का राज है, ये जातियां वहां पर अनंतकाल से सत्तारूढ़ हैं, प्रदेश सरकार में भी, और सामाजिक-राजनीतिक ताकत वाले दूसरे सत्ता-संगठनों में भी। इसलिए लालू यादव की हिमायत करते हुए पिछड़ी जाति का तर्क देना पूरी तरह नाजायज बात है, ठीक उसी तरह जिस तरह की फिक्सिंग में फंसने के बाद मोहम्मद अजहरुद्दीन ने अपने मुस्लिम होने की वजह से फंसा दिए जाने का तर्क दिया था, और अपने मजहब को अपने गलत कामों की ढाल बनाने की कोशिश की थी।
चूंकि लालू यादव पर बात हो ही रही है, इसलिए यह चर्चा भी जरूरी है कि जो भी आरक्षित तबके हैं, उनमें जो-जो लालू यादव हैं, ऐसे लोग जो कि दलित-आदिवासी, या दूसरे आरक्षित तबके के भीतर सांसद हैं, विधायक हैं, जज हैं, या एक ओहदे से ऊपर के अफसर हैं, जिनकी दौलत या कमाई एक सीमा से ऊपर है, वैसे तमाम लोगों को अपने आरक्षित तबकों के भीतर किसी भी तरह के फायदे से बाहर कर देना चाहिए। जो लालू कुनबा आज सैकड़ों या हजारों करोड़ की जायज या नाजायज दौलत का मालिक साबित है, उस कुनबे को किसी भी आरक्षण का फायदा मिलने का मतलब यह होगा कि उस आरक्षित तबके के उनसे कमजोर लोगों के लिए रखे गए हक तक उन्हें पहुंचने से रोकना। भारत में क्रीमीलेयर को खत्म करने की बात बहुत होती है, लेकिन इन तबकों के भीतर जो सबसे ताकतवर लेयर है, उसे पार करके कोई भी फायदा नीचे के सचमुच के जरूरतमंद और कमजोर लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता। यह कुछ उसी किस्म की बात है कि संसद और विधानसभाओं के दवाखानों से सांसद-विधायक हजारों रूपए दाम वाले प्रोटीन के पौष्टिक बिस्किट पाते रहें, और उनकी जनता कुपोषण की शिकार रहे।
लालू पर चर्चा के बहाने एक चर्चा यह छेड़ी जानी चाहिए कि आरक्षित तबकों के भीतर आरक्षण का फायदा पाने के हकदार लोगों की गिनती कैसे घटाई जाए। उन तबकों का आरक्षण तो बना रहे, लेकिन मां-बाप अगर आईएएस हो चुके हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण के फायदे से बाहर रखना चाहिए। आरक्षण को एक कैलकुलेटर के मशीनी नजरिए से तय नहीं करना चाहिए, बल्कि सामाजिक न्याय के नजरिए से उसे बार-बार तय करने की जरूरत होती है। अगर क्रीमीलेयर को लगातार तय किया जाता रहता, और आर्थिक संपन्नता के आधार पर भी सभी आरक्षित वर्गों में सबसे ताकतवर हो चुके लोगों को बाहर किया जाता रहता, तो भारत में सबसे दबे-कुचले लोग आज सचमुच आगे बढ़े रहते। लेकिन आरक्षित संभावनाओं पर गिने-चुने अनुपातहीन-ताकतवर लोगों का एकाधिकार हो चुका है, जिसे खत्म करने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

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