संपादकीय
8 जनवरी 2018

आधार कार्ड की जानकारी बाजार में बिकने को लेकर बनाई गई एक रिपोर्ट पर एक अखबार की संवाददाता और उसके अखबार के खिलाफ आधार कार्ड बनाने वाली संस्था यूआईडीएआई ने रिपोर्ट दर्ज कराई है। यह बात देश में मीडिया के खिलाफ एक नए किस्म की सरकारी कार्रवाई का संकेत है कि एक बहुत ही गंभीर मुद्दे पर, गंभीर अखबार की गंभीरता से तैयार की गई रिपोर्ट पर इस तरह की कानूनी कार्रवाई शुरू की जा रही है। दूसरी तरफ न सिर्फ इस मामले में, बल्कि इसके पहले भी सैकड़ों दूसरे मामलों में यह जाहिर और साबित हो चुका है कि कैसे अलग-अलग सरकारें, अलग-अलग बैंक, या मोबाइल कंपनियां आधार कार्ड का बेजा इस्तेमाल कर रही हैं, अपनी वेबसाइटों पर लोगों की पहचान के साथ उनके आधार कार्ड डाल रही हैं। इन सब पर तो सरकार की की हुई कोई कार्रवाई जनता के सामने रखी नहीं गई है, दूसरी तरफ मीडिया पर इस तरह की रिपोर्ट दर्ज कराना एक भयानक सोच है। इस देश में मीडिया की किसी गलती, या उसके गलत काम पर कार्रवाई के लिए आम जनता के सामने भी प्रेस कौंसिल एक पहला फोरम रहता है। वहां सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अगुवाई में मीडिया के खिलाफ शिकायतें सुनी जाती हैं, और एक न्यायिक व्यवस्था सरीखी सुनवाई के बाद कौंसिल का फैसला भी सार्वजनिक किया जाता है। अभी कुछ ही समय पहले देश के अखबारों की एक लंबी लिस्ट सामने आई थी जिसमें प्रेस कौंसिल के फैसलों के आधार पर केन्द्र सरकार ने उन अखबारों के विज्ञापन ही बंद कर दिए गए थे। इसमें देश के कुछ बड़े प्रमुख अखबार भी शामिल थे। भारत की संवैधानिक व्यवस्था में मीडिया से जुड़े मामलों के लिए बनाई गई प्रेस परिषद को अनदेखा करके केन्द्र सरकार ने, या उसकी यूआईडीएआई एजेंसी ने जो रिपोर्ट दर्ज कराई है वह एक बिल्कुल ही अनोखी कार्रवाई है, और सदमा पहुंचाने वाली भी है। जैसी कि उम्मीद की जाती थी इस एजेंसी की इस कार्रवाई के बाद मीडिया से जुड़े हुए संगठन इसके खिलाफ खुलकर सामने आए हैं, और चंडीगढ़ के इस प्रमुख अखबार ट्रिब्यून के संपादक ने अपनी रिपोर्ट और रिपोर्टर दोनों को सही करार देते हुए इस सरकारी कार्रवाई का जमकर विरोध किया है।
ऐसा लगता है कि आज देश में अधिक आसान और आसानी से मौजूद संवैधानिक विकल्पों को छोड़कर इस तरह से असहिष्णुता जाहिर करने की एक सोच सरकार से लेकर सड़क तक चल रही है। जब हिंसक और हमलावर संगठन ऐसी सोच को लेकर सड़कों पर कत्ल करते हैं, तब तो बात समझ में आती है। लेकिन जब सरकार इस रफ्तार से अपनी बर्दाश्त खोती है, तो यह हैरानी होती है कि देश में लोकतांत्रिक परंपराओं को क्या सचमुच ही इस तरह, और इस हद तक तोडऩे की नौबत आ चुकी है? ऐसी कोई जरूरत आ खड़ी हुई है? आमतौर पर मीडिया में कोई मामला उजागर होने पर सरकारों को अपनी चूक को सुधारने का मौका भी मिलता है। अगर देश के बड़े-बड़े घोटालों के बारे में समय रहते मीडिया की खबरों पर सरकारों ने ध्यान दिया होता, तो वे मामले अदालतों में जाकर बड़े-बड़े नेताओं को जेल नहीं पहुंचा पाए होते। लेकिन सावधान करने वाले मीडिया को दुश्मन मानकर इस तरह की कार्रवाई करना खुद सरकार के हितों के खिलाफ है, लोकतंत्र के खिलाफ तो है ही। भारतीय जनता पार्टी, जिसकी अगुवाई वाली केन्द्र सरकार आज देश पर राज कर रही है, वह अपने जनसंघ के दिनों में आपातकाल, और मीडिया पर सेंसरशिप का नतीजा देखने वाली पार्टी है। उसके नेताओं को तो आपातकाल के उस दौर के सबक याद भी रहना चाहिए। भारत का मीडिया अगर कोई गलती करता है तो उसके खिलाफ अदालतों का रास्ता भी खुला रहता है। लेकिन आज जिस रफ्तार से रिपोर्ट दर्ज कराई गई है उससे केन्द्र सरकार मीडिया के उस तबके में भी हमदर्दी खो बैठेगी जो तबका अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से, या कि दूसरे कारणों से केन्द्र सरकार का हिमायती बना हुआ है। यह फैसला अलोकतांत्रिक है, गलत है, और आगे-पीछे सरकार को इसे वापिस लेना पड़ सकता है। किसी गलती को गलत काम में बदलने से रोकने की रफ्तार केन्द्र सरकार को दिखानी चाहिए, और इसे एक चूक या गलती मानकर वापिस लेना चाहिए। अगर अखबार की रिपोर्ट में गलतियां हैं, तो उन्हें उजागर करके सरकार वैसे भी अखबार की साख पर खतरा खड़ा कर सकती है। (Daily Chhattisgarh)
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