संपादकीय
29 जनवरी 2018

छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मियों का आंदोलन पिछले महीनों में लंबा चला, और उस वक्त रायपुर के कलेक्टर-एसपी ने इसी तरह मध्यस्थता करके जेल के भीतर उस हड़ताल को खत्म करवाया था। लेकिन आज फिर शिक्षाकर्मियों का मुद्दा खबरों में आ गया है क्योंकि मध्यप्रदेश ने शिक्षाकर्मियों का संविलियन कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने हड़ताल खत्म होते समय भी यह साफ कर दिया था कि संविलियन नहीं किया जाएगा, और बाकी मांगों पर विचार किया जाएगा। लेकिन राज्य भर में अभी जब लोक सुराज के लिए जनता से मांगों की अर्जियां ली जा रही थीं, तब उसमें संविलियन की बात भी पूछी गई थी, और उससे एक बार फिर बखेड़ा शुरू हुआ। इसके बाद कल भाजपा के एक नेता के बयान पर विवाद शुरू हुआ जिसमें उन्होंने एक टीवी चैनल पर शिक्षाकर्मियों को मजदूर कह दिया। अब तीसरी बात इससे जुड़ी हुई सुप्रीम कोर्ट में सामने आई है जहां पर बिहार सरकार को इसी किस्म के शिक्षकों के मामले में बड़ी फटकार लगाई गई है कि सामान काम के लिए सामान वेतन क्यों नहीं दिया जा रहा?
छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मी हड़ताल खत्म करवाते समय राज्य सरकार ने अपना पक्का इरादा जाहिर कर दिया है कि वह किन शर्तों पर ही बात करेगी। करीब पौने दो लाख शिक्षाकर्मी राज्य की प्राथमिक शालाओं में पढ़ाने के लिए सबसे बड़ी ताकत हैं, और वे बुनियादी रूप से जिला पंचायत के कर्मचारी हैं। उनकी नौकरी भी जिला स्तर की रहती है, और राज्य सरकार उनकी नियोक्ता नहीं है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि निर्वाचित जिला पंचायतों के नियुक्त किए गए शिक्षाकर्मियों की मांगों पर कोई फैसला हो, या कि उन्हें बर्खास्त करने का फैसला हो, राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र कितना है, उसकी जिम्मेदारी कितनी है, और जिला पंचायत का दायरा कितना है। कुछ जानकारों का यह मानना है कि राज्य सरकार इस मामले में कोई दखल नहीं दे सकती है और न ही उसकी कोई जिम्मेदारी बनती है। यह बारीक कानूनी मुद्दा हो सकता है कि बर्खास्तगी के खिलाफ किसी के अदालत जाने पर तय हो, लेकिन फिलहाल तो सरकार ने बैठकें करके और बातचीत करके इसे अपनी जिम्मेदारी मान ही लिया है।
हम अभी पलभर के लिए शर्तों की बारीकियों पर न जाकर सिर्फ यह सोचते हैं कि प्राथमिक शिक्षा को लेकर सरकार का क्या रूख होना चाहिए तो लगता है कि शिक्षा के जिस स्तर पर सबसे अधिक मेहनत होनी चाहिए, वह छत्तीसगढ़ में सबसे उपेक्षित है। पिछले दिनों नीति आयोग के उपाध्यक्ष छत्तीसगढ़ आए थे और उन्होंने शिक्षा और चिकित्सा इन दो मुद्दों पर सबसे अधिक मेहनत की जरूरत बताई थी। अब छत्तीसगढ़ में प्राथमिक शिक्षा का शिक्षा विभाग से भी लेना-देना है, और पंचायत विभाग से भी लेना-देना है। इन दोनों की जिम्मेदारियों को तय करना हमारा मकसद नहीं है, लेकिन हम यह बात जोर देकर कहना चाहते हैं कि प्राथमिक शिक्षा को अधिक महत्व देने की जरूरत है, उस पर शहरीकरण की खूबसूरती से कहीं अधिक खर्च करने की जरूरत है, उस पर सड़कों के ढांचों से अधिक खर्च करने की जरूरत है। अगर सरकार प्राथमिक शिक्षा को राज्य के ढांचे का विकास नहीं मानती है, तो यह गलती होगी। शिक्षाकर्मियों की मांगों से परे भी राज्य की प्राथमिक शिक्षा को भी तरह-तरह के भ्रष्टाचार से बचाने की जरूरत है, क्योंकि कोई ऐसी स्कूल नहीं है जहां पर एक-दो कमरे टूटे-फूटे फर्नीचर से भरे हुए न हों। इसके अलावा भी तरह-तरह की गड़बडिय़ां समय-समय पर सामने आते रहती हैं, यह राज्य शिक्षकों का इंतजाम भी नहीं कर पा रहा है, और उनके लिए जगह-जगह अलग-अलग कई विषयों में आऊटसोर्सिंग से शिक्षक नियुक्त करने जैसी नौबत भी सामने आ चुकी है। छत्तीसगढ़ को अपनी नींव के पत्थर मजबूत करने के लिए प्राथमिक शिक्षा को मजबूत करना होगा। कल स्कूल शिक्षा मंत्री ने शिक्षाकर्मियों को अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की विरासत में दी हुई समस्या बताया है। किसी भी राज्य सरकार के लिए चौदहवें बरस के जश्न के मौके पर डेढ़ दशक पहले की सरकार को कोसना शोभा नहीं देता। छत्तीसगढ़ को बिना देर किए प्राथमिक शिक्षा की हालत सुधारना होगा। (Daily Chhattisgarh)
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