शहीदों और फौजियों के गांव की दर्दभरी कहानी

संपादकीय
16 जनवरी 2018


कल पन्द्रह जनवरी को देश भर में आर्मी डे मनाया गया। देश की हिफाजत में थलसेना की योगदान को याद करने के लिए हर बरस इस दिन आर्मी डे मनाया जाता है, इसी दिन 1949 में फील्ड मार्शल केएम करियप्पा ने ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बूचर से सेना की कमान सम्हाली थी तब से इसी दिन यह जलसा होता है। लेकिन इस जलसे के दिन भी राजस्थान के झुंझनू जिले के एक गांव धनूरी में यादें तो बहुत ताजा हुईं, लेकिन जिंदगी की दिक्कतें कायम रहीं। आर्मी डे के सिलसिले में इस गांव का जिक्र इसलिए जरूरी है कि मुस्लिम आबादी वाला यह गांव राजस्थान में सबसे अधिक सैनिक शहादत देने वाला गांव है। प्रथम विश्व युद्ध से लेकर अभी हाल तक इस गांव के लोग बढ़-चढ़कर हिन्दुस्तानी फौज में जाते रहे, और अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए शहीद भी होते रहे। गांव का शायद ही ऐसा कोई घर हो जहां से कोई न कोई सेना में न हो। और सेना से परे भी कुछ वक्त पहले छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सल हमले में शहीद सीआरपीएफ जवान बन्नाराम भी इसी गांव के पास के इलाके के थे। देश की आज की फौज में राजस्थान के इस शेखावाटी इलाके के सीकर-झुंझनू जिले के सबसे अधिक लोग किसी भी एक गांव से आए हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि आज हिन्दुस्तानी सेना में इस गांव के 270 जवान हैं, करीब 450 रिटायर्ड जवान यहां बसे हैं, और गांव से 17 शहीद हुए हैं, सारे के सारे मुस्लिम। इस गांव की कहानी देखें तो तमाम मुस्लिम परिवारों के साथ वहां के हिन्दू परिवार सुख-दुख में जुड़े हुए हैं, किसी को किसी से शिकायत नहीं है, और शहीद के परिवार का साथ देने के लिए सारे लोग खड़े हो जाते हैं, हालांकि अब वहां गौरक्षक बने कुछ लोग हमलावर भी हो चले हैं। इस गांव और इस इलाके में शहीद की पत्नी को वीरांगना कहा जाता है, और सम्मान का यह दर्जा सभी तरफ नजरों में भी दिखता है।
लेकिन इस बारे में लिखने की जरूरत आज इसलिए है कि इस गांव में भी लोगों को, शहीदों के कुनबों को छोटी-छोटी बातों के लिए सरकारी दफ्तरों के खूब चक्कर लगाने पड़ते हैं, और किसी को यह परवाह नहीं रहती कि वहां पहुंचा मामला शहीद की पत्नी या उसके बच्चों का है। शहीद के बच्चों के लिए स्कॉलरशिप पाने को पत्नी बीमार हालत मेें दफ्तरों के चक्कर काटती है, और कोई सुनवाई नहीं होती। वहां के रिटायर्ड फौजी बताते हैं कि सरहद से बड़ी जंग देश में फाईलों पर लडऩी पड़ती है और उनका अफसोस है कि वहां तो पता होता है कि दुश्मन कौन है, लेकिन यहां तो अपने ही लोग हैं। जिस गांव के हर घर में फौज को एक-एक औलाद दी है, वहां पर हायर सेकेंडरी स्कूल खोलने को भी राजस्थान सरकार को फुर्सत नहीं है। जो छोटी स्कूल है उसकी बरसों से मरम्मत नहीं हुई है। और तो और ऐसे और इस गांव के स्कूल में एनसीसी थी जिसमें बच्चों को पारिवारिक परंपरा के मुताबिक दिलचस्पी रहती थी, लेकिन उसे भी यहां से हटाकर दूर के एक निजी स्कूलों में भेज दिया है। फौजियों का दर्द है कि घायल सैनिक को नियमों के मुताबिक जमीन से लेकर बाकी चीजों के लिए बिना रिश्वत कोई रास्ता नहीं है।
जो गांव शहादत की मिसाल है, वहां का यह सरकारी हाल भाजपा की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राज में है। अब यह अलग बात है कि वसुंधरा का माता-पिता का सिंधिया परिवार अंग्रेजों का साथ देने के लिए जाना जाता है। भाजपा पूरे देश में सैनिकों को लेकर राष्ट्रवाद चलाती है, और सेना की किसी गड़बड़ी पर भी सवाल उठाने को देश के साथ गद्दारी मानती है। अब शहीदों के इस गांव में शहीदों के परिवारों के साथ  सरकारी सुलूक अगर यह है तो बाकी देश में इक्का-दुक्का बिखरे हुए सैनिक-परिवारों के साथ क्या होता होगा? दरअसल जिस तरह की भावनाएं और जैसा राष्ट्रवाद गायों को लेकर है, और भावनाओं से परे हकीकत यह है कि उन्हें घूरों पर चरने और मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, ठीक वैसा ही हाल रिटायर्ड सैनिकों, शहीदों के परिवारों, और मौजूदा सैनिकों के साथ भी होता है कि जब उनके परिवार को सरकार से कोई काम पड़ता है, तो राष्ट्रवादी सरकारें भी रिश्वत लिए बिना काम नहीं करतीं। राष्ट्रवाद और देशभक्ति के फतवे किसी काम के नहीं हैं, अगर उन पर चलती सरकारों में भी बिना रिश्वत शहीद परिवार को न इलाज मिले, न स्कॉलरशिप, और न ही हक की जमीन। इसलिए सेना की बहुत बात करने वालों को नारों से परे अपना चाल-चलन देखना चाहिए कि असल जिंदगी में क्या अपने को देशभक्त साबित करने, और दूसरों को देशद्रोही साबित करने की बदनीयत से परे, क्या सचमुच उनके मन में सेना और सैनिकों के लिए कुछ करने की हसरत है? राजस्थान का यह गांव सुबूत है जहां के हर मुस्लिम परिवार का कोई न कोई सैनिक है या शहीद है, और फिर भी मुस्लिमों को देश भर में यह हलफनामा टांगकर घूमना होता है कि वे देशभक्त हैं!(Daily Chhattisgarh)

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