संपादकीय
15 जनवरी 2018

हरियाणा से लगातार गैंगरेप की ऐसी तीन खबरें मिली हैं जिनमें नाबालिग बच्चियों से बलात्कार किए गए, और उनमें से दो बच्चियों की हत्या भी कर दी गई। इनमें से कम से कम एक बच्ची एक दलित समाज की है जो कि हरियाणा में खास निशाने पर रहता है। और महज हरियाणा में ही नहीं, मध्यप्रदेश में भी दलितों पर अत्याचार कई किस्म से जारी है। अड़तालीस घंटों के भीतर ऐसी तीन वारदातों से हरियाणा हिला हुआ है, क्योंकि कम से कम एक वारदात में बलात्कार की शिकार बच्ची के बदन से बलात्कार के अलावा कई और किस्म की हैवानियत भी की गई है।
हमको खुद यह समझ नहीं आता है कि बलात्कार के मुद्दे पर कितना लिखें, और कितना न लिखें? अभी दो-चार दिन पहले ही पाकिस्तान में एक बच्ची से बलात्कार और उसके कत्ल के बाद पूरे देश में फैले तनाव पर लिखते हुए हमने भारत का भी जिक्र किया था कि निर्भया कांड के बरसों बाद भी आज इस देश, हिन्दुस्तान, में कुछ भी नहीं बदला है। उसमें यह भी लिखा था कि अदालतों में बलात्कार के मामलों में सजा को बढ़ाते चलने से बलात्कार नहीं रूकेंगे, बल्कि ऐसे मामलों की ईमानदार और संवेदनशील पुलिस जांच तेजी से करके, महिला हिंसा पर अलग से अदालतें बनाकर तेजी से फैसले अगर नहीं लिए जाएंगे, तो अधिक कड़े कानून का भी कोई असर होगा नहीं। अब कुछ और पहलुओं को समझने की जरूरत है जो कि पुलिस से परे भी समाज में असर रखते हैं, और जिनकी वजह से बलात्कार इतने अधिक होते हैं, हो रहे हैं, कि अमरीका ने अभी चार दिन पहले ही भारत आने वाली अपनी महिला नागरिकों को भारत के बलात्कारों को लेकर चेतावनी जारी की है।
भारतीय समाज में लड़की या महिला की जगह हिकारत और कुचलने की है। उन्हें जन्म से पहले ही मार डालने की जो सोच है, जन्म के बाद अफीम चटाकर या गला घोंटकर मार डालने की जो हिंसक और हत्यारी सोच है, लड़की को घर में कम खाना देने, उसका इलाज न कराने, उसे कम पढ़ाने की जो सोच है, उससे एक लड़की को हिंसा करने के लायक सामान मान लिया जाता है। कम उम्र में कम पढ़ी लड़की को भी हाथ पीले करके हिन्दू लोग बिदा कर देते हैं, और मुस्लिमों में छोटी उम्र की लड़की को बूढ़े मरणासन्न शेखों के हाथ हैदराबाद में जिस तरह से बेच देते हैं, उससे लड़कियों पर बलात्कार को हिन्दुस्तानी समाज की मर्दाना सोच अपना हक मान लेती है। इसके अलावा एक दूसरी बात यह कि अगर कोई लड़की दलित या आदिवासी है, तो वह तो सवर्ण समाज के बलात्कार के लिए ही मानो पैदा हुई है। एक तो लड़की, ऊपर से दलित, उसे तो मानो ईश्वर ने सोच-समझकर सवर्ण मर्दों की सेक्स-सेवा के लिए ही बनाया है। इसलिए उसके साथ ऐसा गैंगरेप करके, उसके बदन में लोहे की छड़ें घुसाकर उसे मार डाला जाता है।
ऐसी वारदातों के बाद यह लगता है कि दलित-आदिवासी नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप करने वाले लोगों को रासायनिक तरीके से बधिया बनाकर सजा देना क्या कुछ बुरा होगा? क्यों न उन्हें ऐसे बदन के साथ जीने के लिए छोड़ दिया जाए जो कि आगे किसी बलात्कार के लायक रह न जाए? एक सोच मध्यप्रदेश में सामने आई है जहां सरकार ने यह कानून बनाया है कि नाबालिग लड़की से इस तरह के बलात्कार वालों को मौत की सजा दी जाए। उस पर सोचते हुए कभी तो हमें यह भी लगता है कि मौत की सजा के बाद लड़की की हत्या को बलात्कारी बेहतर और सुरक्षित मानेंगे क्योंकि अगर शिनाख्त हो गई तो फांसी होनी है, और हत्या के बाद भी उससे बड़ी सजा तो मिल नहीं सकती। लेकिन कभी यह भी लगता है कि बलात्कारियों के ऐसे गिरोह को आखिर क्या सजा दी जाए जिसमें कई लड़के या आदमी मिलकर एक बेबस बच्ची के साथ गैंगरेप करते हैं?
भारत में कई अलग-अलग पहलुओं से कार्रवाई और कोशिश करने की जरूरत है। समाज का नजरिया बदलना होगा, जांच एजेंसी में बुनियादी फेरबदल करना होगा ताकि बलात्कार की जांच करते हुए पुलिस उसी से और अधिक बलात्कार न करती रहे। इसके बाद अदालत में सजा दिलवाने के सिलसिले को तेज रफ्तार और मजबूत करना होगा। हम इन बातों को न तो पहली बार लिख रहे हैं, और न ही आखिरी बार। यह सिलसिला तो चलते ही रहेगा, लेकिन हरियाणा में जब एक के बाद एक ऐसे मामले होते हैं, तो वहां के मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की महिलाओं के खिलाफ, उनकी आजादी के खिलाफ, बराबरी के उनके हक के खिलाफ कही गई नाजायज और अलोकतांत्रिक बातें याद पड़ती हैं। यह भी याद पड़ता है कि किस तरह हरियाणा की खाप पंचायतों की महिलाओं के खिलाफ हिंसक सोच का एक-एक करके सभी पार्टियां साथ देती हैं। ऐसे तमाम पहलुओं पर सोचे-विचारे बिना हिन्दुस्तान की बेकसूर और मासूम बच्चियां इसी तरह बलात्कार का शिकार होती रहेंगी। (Daily Chhattisgarh)
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