म्युनिसिपल का हमला किसी बड़े पर नहीं, महज गरीबों पर

संपादकीय
21 जनवरी 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नए पुलिस कप्तान के आने के बाद ट्रैफिक को सुधारने की जोरदार कोशिश शुरू हुई है। इसमें म्युनिसिपल भी हिस्सा ले रही है, और जैसा कि आमतौर पर होता है, सड़कों के किनारे से अवैध कब्जे हटाने के नाम पर जो अभियान चल रहा है, उसका पहला और अकेला हमला उन ठेले-खोमचे वालों पर हो रहा है जिनका पूरा कारोबार महज एक ठेले जितनी जगह पर चल रहा था, और अब मशीनों से उन ठेलों को ले जाकर उनकी रोजी-रोटी खत्म कर दी गई है। दूसरी तरफ बाजार में सड़कों के किनारे बड़ी-बड़ी दुकानों का सामान दूर तक सजाकर रखा जाता है, और ऐसा करने वाले वे कारोबारी हैं जिनके पास खासी बड़ी जगह अपने धंधे के लिए है। इसके बावजूद वे बाहर इतनी जगह घेरकर रखते हैं जितने पर ठेले-खोमचे वाले अपना पूरा रोजगार चलाते हैं। दरअसल यह सोच एक ऐसी अफसरशाही है जो कि जमीन से बिल्कुल ही जुड़ी हुई नहीं है। और जो निर्वाचित नेता म्युनिसिपल में पार्षद हैं, या तो उनकी कुछ चलती नहीं है, या उन्हें भी अब धीरे-धीरे करके, महंगे चुनाव लड़कर, महंगी गाडिय़ों में चलकर बड़े दुकानदारों की ही फिक्र बाकी रह गई है।
एक तरफ तो देश में लोगों को स्वरोजगार के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है, और दूसरी तरफ जो गरीब जरा सी जगह पर बिना किसी कब्जे के रोज का कारोबार करते हैं, उनको बेदखल किया जा रहा है, बिना किसी दूसरे इंतजाम के। अफसरों की यह सोच भयानक है, और दुनिया के किसी भी सभ्य और विकसित देश में म्युनिसिपल अपने स्थानीय लोगों को इस तरह से कुचलते हुए नहीं चलती हैं। सड़कों के किनारे से कब्जे हटाने की शुरूआत जब करनी हो, तो सबसे पहले उनके कब्जे हटाने चाहिए जिनके पास खुद की बाकी जगह है, लेकिन जिनकी नीयत अपने शटर के भीतर तक सीमित नहीं रह पाती। शहर के हर बड़े बाजार, हर व्यस्त सड़क पर बड़ी दुकानों के ऐसे कब्जे आम बात हैं, और उन पर पिछले बरसों में कोई जुर्माना भी हुआ हो, ऐसा पढऩे में नहीं आता।
इसी शहर में बाजार में ऐसे बड़े-बड़े अवैध निर्माण धड़ल्ले से हुए हैं जिनमें सड़क किनारे की जमीन पर कई मंजिलों की इमारत खड़ी कर दी गई हैं। म्युनिसिपल इनको आखिरी नोटिस तक दे चुकी है, लेकिन इसके बाद कार्रवाई उन पर कुछ नहीं होती। ऐसे में रोज कमाकर खाने वाले करीब ठेले-खोमचे वालों पर म्युनिसिपल की मशीनों की ऐसी फौलादी कार्रवाई पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और जनविरोधी है। यह नौबत स्थानीय शासन में निर्वाचित लोगों की भूमिका खत्म हो जाने का एक बड़ा सुबूत भी है चाहे उसे अफसर खत्म कर रहे हों, चाहे उसे निर्वाचित प्रतिनिधि खुद ही छोड़कर फायदे के दूसरे कामों में लग रहे हों। जनकल्याणकारी सरकार में किसी कमाते-खाते मेहनतकश गरीब को बिना दूसरे इंतजाम के बेदखल नहीं करना चाहिए, और बेदखली का सिलसिला उन बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए जिनकी दुकानों के पुतले और सामान सड़कों को दूर तक घेरकर रखते हैं।
ट्रैफिक को सुधारना या सड़कों को चौड़ा खाली रखना दोनों ही अच्छी बातें हैं, लेकिन यह काम बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए, उन गरीब लोगों से नहीं जिनकी कमाई का पूरा जरिया ही सरकारी ट्रकों पर लादकर ले जाकर फेंक दिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि राज्य में प्रदेश स्तर के मंत्रियों या सांसद-विधायकों में भी गरीबों के लिए दर्द अब बाकी नहीं रह गया है, वरना ऐसी बेदखली की तस्वीरें देखकर सरकार लोगों का रोजगार छीनने से परहेज करती। जिस किसी शहर में महज गरीबों को निशाना बनाकर अवैध कब्जा हटाने की बात कही जा रही है, उसका जमकर विरोध होना चाहिए। लोगों को बेरोजगार बनाकर कोई शहर सुविधा-संपन्न या सुंदर नहीं हो सकता। शहर को स्मार्ट बनाने के लिए लोगों की रोजी-रोटी छीनना एक कमअक्ली का काम है, और गरीब जनता आने वाले किसी भी चुनाव में जनप्रतिनिधियों से इसका हिसाब चुकता जरूर करेगी। (Daily Chhattisgarh)

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