संपादकीय
17 जनवरी 2018

मोदी सरकार ने हज सब्सिडी खत्म करने का फैसला लिया है। खुद मुस्लिम समाज के बहुत से संगठन इसकी मांग करते आ रहे थे, और ऐसा भी माना जा रहा था कि मुस्लिमों को हज की तीर्थयात्रा के लिए दी जाने वाली यह सब्सिडी मोटे तौर पर घाटे में चलने वाली सरकारी एयरलाईंस, एयर इंडिया को जिंदा रखने के लिए भी दी जाती थी। इसके अलावा शायद इसकी दो वजहें और थीं, एक तो यह कि मुस्लिम वोटों का फायदा पाने की कांग्रेस की उस वक्त की नीयत रही हो जब इसे लागू किया गया था, और दूसरी वजह यह कि मुस्लिमों का यह तीर्थ देश से खासे दूर है, और मुस्लिमों में गरीबों का अनुपात बहुत अधिक है, इसलिए उन्हें अपनी धार्मिक भावनाओं के मुताबिक हज करने के लिए मदद करना सरकार की जिम्मेदारी है।
हम इन वजहों से सहमत नहीं हैं, और हमारा यह मानना है कि धर्मनिरपेक्ष देश होने का मतलब यह नहीं होता कि सरकार हर धर्म को खुश करने की कोशिश करे। सरकार को हर धर्म से दूरी बनाकर चलना चाहिए, और किसी धर्म पर खर्च नहीं करना चाहिए। वैसे हज सब्सिडी से परे कई और किस्म की सब्सिडी दूसरे धर्मों को भी दी जाती रही है, और दी जाती है। हिन्दुओं के कुंभ और अर्धकुंभ के इंतजाम के लिए सैकड़ों करोड़ रूपए सरकारें मंजूर करती हैं जो कि पूरी तरह से एक ही धर्म के आयोजन पर खर्च है। कुंभ के नाम पर ही छत्तीसगढ़ में एक राजिम कुंभ शुरू हुआ, और वह पूरे का पूरा सरकारी पैसों से होने वाला हिन्दू आयोजन है। इस राजिम कुंभ में आने वाले साधुओं को सरकार की तरफ से कुछ नगद रकम या मेहनताना भी दिया जाता है, और उनके सारे खर्च सरकार उठाती है। छत्तीसगढ़ सहित देश के बहुत से राज्य हिन्दुओं के मानसरोवर तीर्थ पर जाने वाले लोगों को सरकारी अनुदान देते हैं, और अभी हाल की खबरों के मुताबिक उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने इस अनुदान को बढ़ाकर हज अनुदान से भी अधिक कर दिया है।
देश में धार्मिक संस्थानों पर सरकार के खर्च को अगर देखें, तो छत्तीसगढ़ में जोगी सरकार ने कुतुबमीनार से भी ऊंचे जैतखंभ को बनाने का फैसला लिया था, और बनाना शुरू किया था जो कि एक सम्प्रदाय का आस्था केन्द्र है। सरकार के लंबे खर्च से यह जैतखंभ बाद में आने वाली भाजपा सरकार ने पूरा किया। इसी तरह कुछ और धर्मों को लेकर सरकार की मिसालों को देखें तो अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में सुबह होने वाले शबद कीर्तन को आकाशवाणी से सीधे प्रसारित किया जाता है, और जो कि अपने किस्म का एक अलग ही विशेष दर्जा है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्य ऐसे हैं जो अपने बुजुर्गों को सरकारी खर्च पर तीर्थयात्राओं पर भेजते हैं।
अब जब सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर हज सब्सिडी खत्म की जा रही है, तो बिना अगली किसी जनहित याचिका के, बिना सुप्रीम कोर्ट के अगले किसी आदेश के, केन्द्र और राज्य सरकारों को धर्म के मामले में अपने खर्च खत्म कर देने चाहिए। कुंभ या किसी उर्स जैसे किसी बड़े आयोजन के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का इंतजाम चाहे सरकार करती रहे, लेकिन किसी भी तरह के निजी तीर्थ के लिए किसी भी व्यक्ति को सब्सिडी देना खत्म होना चाहिए, धार्मिक इमारतों पर सरकारी खर्च खत्म होना चाहिए। लगे हाथों आज पूरे देश को उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट के इस फैसले को भी देखने की जरूरत है कि सारे धर्मस्थानों से लाउडस्पीकर हटाए जाएं। आज धर्म और आध्यात्म से जुड़ी हुई जगहों पर सुबह से रात तक, और कहीं-कहीं पूरी रात भी लाउडस्पीकर बजते हैं, और लोगों का जीना हराम करते हैं। बुजुर्गों, बीमारों, छात्र-छात्राओं को खासी अधिक दिक्कत होती है, लेकिन ऐसे शोरगुल से बाकी लोगों को भी तनाव होता है, उनकी उत्पादकता घटती है, और उनकी सेहत तबाह होती है। इसलिए सभी सरकारों को कड़ाई बरतते हुए धार्मिक कोलाहल को पूरी तरह से खत्म करना चाहिए, इसे लेकर सैकड़ों बरस पहले कबीर जो कह गए हैं, आज उतनी खरी-खरी, और उतनी कड़ी-कड़ी बात कहने की हिम्मत किसी में है नहीं, और न ही लोगों में इतना बर्दाश्त है। आज तो कोई पाखंड के खिलाफ कबीर की सोच को दुहरा भी दे, तो उसे सूली पर चढ़ाने की तैयारी होने लगेगी। ऐसे में अदालत और सरकार को धार्मिक पाखंड और मनमानी को खत्म करना चाहिए, और धर्म पर खर्च करना भी बंद करना चाहिए। अभी हम हज सब्सिडी को लेकर अलग से कोई बात नहीं कह रहे, लेकिन हज के बाद मानसरोवर, और मानसरोवर के बाद वैटिकन, और वैटिकन के बाद जेरूशलम, यह सिलसिला आखिर कहां तक जाएगा? सरकार को धार्मिक आस्था को निजी मानकर उस पर सार्वजनिक खर्च खत्म करना चाहिए।
-सुनील कुमार
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