संपादकीय
19 जनवरी 2018

पाकिस्तान में बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने के काम लगीं मां-बेटी को आतंकियों ने गोली मारकर मार डाला। इसके पहले भी इस्लामी आतंकी इस अभियान में लगे हुए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को कई बार मार चुके हैं। उनका तर्क है कि पोलियो के टीके से मुस्लिम बच्चों की प्रजनन शक्ति खत्म हो जाएगी, और यह एक पश्चिमी साजिश है जिसे वे पूरा नहीं होने देंगे। जाहिर है कि धर्म के आधार पर जो आतंक चलता है, उसका विज्ञान या अक्ल से कोई लेना-देना तो हो नहीं सकता। लेकिन हम सबसे पहले इस मां-बेटी के हौसले को सलाम करना चाहेंगे जो कि पोलियो-कार्यकर्ताओं की आतंकी-हिंसा के लंबे पाकिस्तानी इतिहास के बावजूद इस काम में लगी हुई थीं। अड़तीस बरस की सकीना, और सोलह बरस की रिजवाना इन दोनों को मारकर पाकिस्तान के इस्लामी-आतंकियों ने अपने देश के लाखों बच्चों को पोलियो के खतरे के हवाले कर दिया है। इसके बाद लोगों के बीच न तो पोलियो ड्रॉप्स देने की हिम्मत आसानी से आएगी, और न ही मां-बाप अपने बच्चों को ऐसा टीका दिलवाने की हिम्मत आसानी से कर पाएंगे।
पाकिस्तान दुनिया के उन तीन देशों में से एक है जिसने पोलियो को रोकने में कामयाबी नहीं पाई है। अफ्रीका का नाइजीरिया, पाकिस्तान के पड़ोस का अफगानिस्तान, और खुद पाकिस्तान। इन्हीं तीन देशों में पोलियो बाकी है, और यहां से अड़ोस-पड़ोस के देशों तक इसका जाने का खतरा भी बने रहता है। कल की इस हिंसा के सिलसिले में यह भी याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान में जनवरी 2015 में एक टीकाकरण केन्द्र में आत्मघाती बमबारी से पन्द्रह लोगों को मार डाला गया था, और पाकिस्तानी तालिबानी ऐसे कई हमलों की जिम्मेदारी ले चुके हैं। लेकिन पाकिस्तान के सिलसिले में हम एक दूसरी बात को भी याद करना चाहेंगे कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में पाकिस्तान में ओसामा-बिन-लादेन की तलाश करने के लिए सीआईए ने टीकाकरण कर्मचारियों की शक्ल में जासूसी करवाई थी, और उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि ऐसा करना टीकाकरण जैसे जरूरी स्वास्थ्य कार्यक्रम की साख को चौपट करना है, और यह एक अंतरराष्ट्रीय जुर्म से कम कुछ नहीं है। खैर, वह बात तो आई-गई हो गई, लेकिन हमारा अभी भी यह मानना है कि जिस तरह किसी युद्ध के बीच भी एम्बुलेंस का फौजी-इस्तेमाल एक युद्ध अपराध माना जाता है, और पूरी दुनिया के सभ्य देशों के बीच ऐसा समझौता भी है कि रेडक्रॉस की एम्बुलेंस पर कोई भी फौज हमला नहीं करेगी, उसी तरह यह भी एक घोषित समझौता होना चाहिए कि टीकाकरण कार्यक्रम का कोई इस्तेमाल सेहत से परे के किसी काम के लिए नहीं किया जाएगा।
अब हम इस मुद्दे पर आएं कि किसी धर्म से जुड़े हुए आतंकी संगठनों को बढ़ावा देने का क्या नतीजा होता है। यह बात महज पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, हिन्दुस्तान में भी कई धर्मों से जुड़े हुए लोग अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग जगहों पर आतंक से भी जुड़े रहे हैं, और आतंक का पता नहीं कोई धर्म होता है या नहीं, किसी धर्म का कोई विज्ञान तो बिल्कुल नहीं होता। और जिस धर्म के लोग अपने बच्चों को टीकाकरण जैसी जरूरी चीज से दूर रख रहे हैं, वे लोग कुल मिलाकर अपने ही धर्म का बड़ा नुकसान भी कर रहे हैं। जहां कहीं भी धर्म को लेकर कट्टरता, उन्माद, धार्मिक नफरत, और पाखंड को बढ़ावा दिया जाता है, वहां पर वैज्ञानिकता पूरी तरह खत्म हो जाती है, और आज हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के बीच भी अंधविश्वास को विज्ञान के विकल्प की तरह फैलाया और बढ़ाया जा रहा है। जब टीवी चैनलों पर बहस के दौरान भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा जैसे विज्ञान पढ़े हुए लोग यह कहते हैं कि गोमूत्र से सोना निकाला जाता है, तो वे इस देश में गाय से जुड़े हुए लोगों की भावनाओं का शोषण करते हुए इस देश की वैज्ञानिक सोच को खत्म करने का काम भी करते हैं। संबित पात्रा खुद तो डॉक्टरी पढ़े हुए इंसान हैं, लेकिन लोगों के बीच में वैज्ञानिकता खत्म करने के काम में लगे हुए हैं। उनकी मास्टर ऑफ सर्जरी ऐसी ही काम आ रही है। लेकिन यह महज एक मिसाल है, हमने विज्ञान को छोड़कर धर्मान्धता और कट्टरता को फैलाते हुए और भी बहुत से लोगों को देखा है। आज खबरों में बने हुए डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा पेशे से कैंसर सर्जन हैं, लेकिन देश में पूरे वक्त वे साम्प्रदायिकता के कैंसर को फैलाने में लगे हुए दिखते हैं। इसलिए धर्म और आतंक को जोडऩे का क्या नतीजा होता है यह पाकिस्तान में कल सामने आया है, और हिन्दुस्तान को भी इससे सबक लेना होगा। (Daily Chhattisgarh)

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